राजधर्म और महाभारत, भाग-5

  • 2016-10-17 08:30:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजधर्म और महाभारत, भाग-5

आज हम देखते हैं कि अधिकतर लोग अपने पास पड़े उधारे ज्ञान-विज्ञान के आधार पर ही एक दूसरे से भिड़ते रहते हैं। उनकी चर्चाओं में कोई तर्क नही होता, कोई प्रमाण नहीं होता, टी.वी. चैनलों पर होने वाली नीरस बहस पर पहुंचने वाले पूर्वाग्रही और दुराग्रही लोगों को बहस करते हम अक्सर देखते रहते हैं, जो टी.वी. के दर्शकों का अमूल्य समय नष्ट करने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यह सब होता रहता है। जिससे लोगों की ऊर्जा का, समय का और धन का अपव्यय होता है। इसलिए राजा के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वह लोगों का समय नष्ट करने वाला न होकर तर्कशास्त्री और शब्दशास्त्री होना चाहिए। ऐसे राजा को किसी उचित निष्कर्ष पर पहुंचकर न्यायपूर्ण निर्णय लेने में सुविधा होती है।


कितना पवित्र राजधर्म है-महाभारतकार का? वह इतने पर ही नहीं रूक जाता है, आगे भी कहता है कि ''राजा तुम्हें प्रतिदिन ब्राह्मण ग्रंथ इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओं के चरित्र का श्रवण करना चाहिए।''
(148, 149, अ. 104)

ऐसा करने से राजा को अपने राजकार्यों को जनापेक्षाओं के अनुरूप न्यायसंगत ढंग से चलाने में सुविधा मिलती है। जब कोई राजा अपने आप महापुरूषों के जीवन चरित्र का प्रतिदिन अध्ययन करने का अभ्यासी होता है तो उनके सत्कार्यों को अपने जीवन में धारण करने की प्रेरणा मिलती है। महापुरूषों के जीवन उनके बाद की पीढिय़ों के लिए आदर्श बन जाया करते हैं, जिन्हें पढ़ व समझकर वे लोग प्रेरणा लेते हैं और यदि कहीं कोई शंका होती है, या उन्हें किसी संकटकाल में किसी उचित निर्णय को लेने में कहीं कोई संकोच हो रहा है तो उस संकोच का निवारण हो सकता है। इसी प्रकार राजा को महाभारतकार ने एक और मर्यादा से बांधा है। वह कहता है :-
तस्यराज्ञ:परोधर्मोदम: स्वाध्याय एव च।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दोदानाध्ययनमेव च ।।
(149, अ. 141)
राजा का परमधर्म है-इंद्रिय संयम्, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान और अध्यापन।

इंन्द्रिय संयम का अर्थ उसका तपस्वी होना भी है, जिससे राजा से हर स्थिति परिस्थिति में न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण रहने की अपेक्षा की जाती है। हम पूर्व में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि आत्म विजयी ही विश्व विजयी हो सकता है। अपना गुरू (स्वाध्याय प्रेमी अर्थात अपना अध्ययन अपने गुणावगुण पर शुद्घ चिंतन करके उसे मानने वाला) ही विश्वगुरू बन सकता है। अग्निहोत्र कर्म से ईश्वर की निकटता का बोध होता है, उसकी कृपा के हम पात्र बनते हैं और हर संकट का सामना पूर्ण मनोयोग से करने में सफल हो पाते हैं।
इसी प्रकार दानशीलता भी राजा के लिए परम आवश्यक है, पता नहीं किस आफत का मारा कौन व्यक्ति कब उसके दरवाजे पर आ पहुंचे? उसे हर दीन-हीन की सहायता करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। पर यह स्मरण रखना चाहिए कि दान किसी वास्तविक पात्र व्यक्ति को ही मिलना चाहिए। राजा के पास जो धन होता है-वह उसका अपना नहीं होता, अपितु वह जनता का होता है। यह उसके लिए गौरव की बात होती है कि प्रजा उस पर विश्वास करके अपने कोष का स्वामित्व उसे सौंप देती है, इसलिए राजा को चाहिए कि वह प्रजा के कोष का दुरूपयोग कदापि न करे।

जिन राजाओं ने अपने मनोरंजन के लिए दरबारों में वैश्याओं को नचाया और अपने चाटुकारों पर प्रजा के धन को लुटाया उन्हें भारतीय राजधर्म की परंपरा का राजा कभी नहीं माना जा सकता। निश्चय ही उन्होंने राजधर्म का उल्लंघन किया और उसी का परिणाम है कि आज हम ऐसे राजाओं का कहीं कोई अता-पता नही लगा सकते। वे कालातीत नहीं बन पाये-काल उन्हें खा गये। उन पर भर्तृहरि का यह कथन सत्य घटित होता है कि-'कालो न यातो वयमेव यातुं'। ऐसी पतन की अवस्था से बचने के लिए ही महाभारतकार ने राजा को अध्ययनशील अर्थात सद्ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए निर्देश दिया है। उसके लिए व्यवस्था दी है कि नित्य अध्ययन करो, जिससे कि तुम प्रजा के साथ और उसके कोष के साथ अथवा उसके विश्वास के साथ कोई घात न कर सको।
महाभारतकार राजा से यह भी अपेक्षा करता है कि-''उसे यज्ञोपवीत धारण करना चाहिए, ब्रह्मयज्ञ, प्रभुभक्ति या ईश्वर की आराधना अवश्य करनी चाहिए, पोष्यवर्ग का भरण पोषण, तथा आरंभ किये हुए कार्य को सफल बनाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। जिससे कि उक्त (कथनी) और कृति (करनी) में साम्यता बनी रहे।'' (50 अध्याय 141)
''राजा को चाहिए कि अपराध के अनुसार उचित दण्ड दे, वेद द्वारा क्षत्रिय के लिए उपदिष्ट कर्मों का अनुष्ठान करना, व्यवहार में न्याय की रक्षा करना और सत्यभाषण में अनुरक्त होना, चाहिए-ये सभी कर्म शासक के लिए धर्म ही है।'' (51-अ 141)
''शासक सर्वप्रथम अपने आपको विनयशील बनाये, तत्पश्चात अपने सेवकों और प्रजाओं को विनय की शिक्षा दे, यही विनय का क्रम है।''
(अ. 145 पृष्ठ 5948)
महेश्वर जी उमा से कहते हैं-''देवि! इसके पश्चात शासक को अपनी इंद्रियों पर विजय पाना चाहिए-यह बात बतायी गयी। इंद्रियों को काबू में न करने से जो महान कष्ट होता है वह शासक को नीचे गिरा देता है।''
(अ. 145 पृष्ठ 5948)
इन श्लोकों में जो कुछ कहा गया है, उस पर पूर्व में ही प्रकाश डाला जा चुका है, पुन: उसी बात को कहने से यह विस्तार देने से कोई लाभ नहीं है। परंतु पाठकों के लिए प्रमाण स्वरूप हमने महाभारत के इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद यहां दिया है। आशा है पाठक लाभान्वित होंगे।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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