मनु की राज्य व्यवस्था और रामभरत संवाद भाग-1

  • 2016-12-30 06:30:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की राज्य व्यवस्था और रामभरत संवाद भाग-1

आचार्य प्रेम भिक्षुजी ने 'शुद्घ रामायण' में लिखा है जब तक संसार में वैदिक धर्म का डंका बजता रहा सारा संसार तब तक एक चक्रवर्ती सांस्कृतिक साम्राज्य की छत्रछाया में सुख चैन की वंशी बजाता रहा। मानव स्वभाव की विचित्रता से जब कभी कहीं वर्णाश्रम धर्म को लोप करने का उपक्रम किया गया इस सांस्कृतिक (आत्मिक) साम्राज्य का छिन्न भिन्न करने का दुस्साहस किया गया, ब्राह्मणों ने अपने शास्त्रबल से तथा क्षत्रियों ने अपने शस्त्र बल से उस अनार्षशक्ति का दमन किया और पुन: वैदिक सांस्कृतिक साम्राज्य की स्थापना कर दानवता का मूर्ख मर्दन कर मानवता को अभयदान दिया। रामायण की कथा या राम रावण युद्घ की यही पृष्ठभूमि है।

भारत के आर्ष साहित्य की और ऋषियों के चिंतन की यह अनूठी विशेषता है कि उन्होंने संसार की विभिन्नताओं को किसी एक शक्ति से शासित माना। विभिन्नताओं को हमने सम्मान दिया परंतु प्राथमिकता नही दी। प्राथमिकता तो सदा एकता को दी गयी। एक को विभिन्नताओं में बांटने का दुष्परिणाम ही तो है कि देश बहु देवतावादी हने गया, जिससे एक धर्म के बहुत से धर्म हो गये। इस प्रकार एक टूटता गया और अनेक बनते गये। राष्ट्र टूटता गया और अनेक देश बनते गये। आर्यवत्र्तीय ऋषियों का चिंतन था कि एक टूटे नही इसलिए सारी शक्ति एक पर ही लगाओ। एक से दो की ओर चलते ही अनेकता के भंवर जाल में जा फंसने के सामान होगा। जिससे वैचारिक मतभेद और सामाजिक विसंगतियां उत्पन्न होंगी और मानव मानव के बीच मतभेद बढ़ते मनभेद तक और मनभेद से विश्व युद्घ में परिवर्तित हो जाएंगे। परिणाम होगा-सर्वनाश।
विभिन्नताओं के उपासकों ने अतार्किक प्रयास किया कि गीत विभिन्नताओं के गाओ और एकता की बात करते रहो। इससे बात नही बनी। विश्व में सैकड़ों देश बन गये और अभी भी कई देशों के टूटने की स्थितियां बन रही हैं।
हमारे महान ऋषियों ने एक संस्कृति एक राष्ट्र एक राज्य व्यवस्था एक विचार और एक लक्ष्य को मानव समाज का सामूहिक उद्देश्य घोषित किया। हम पूर्व पृष्ठों में कह आये हैं कि हमारे राजाओं ने चक्रवर्ती राज्य की स्थापना का अपना उद्देश्य भी इसी एक की साधना के लिए नियत किया था। विश्व शांति के इस अमोघ अस्त्र को महर्षि मनु ने अपनी मनुस्मृति में स्थान दिया। भारतीय परंपरा के अनुसार मनु ने करोड़ों वर्ष पूर्व यह व्यवस्था स्थापित की थी। रामायण काल में रामचंद्रजी चित्रकूट में अपने भाई को जब राजनीति का उपदेश देते हैं तो एक प्रकार से वह मनु की व्यवस्था को ही अपने शब्दों में दोहरा देते हैं। जिससे पता चलता है कि उनके काल तक मनु की राज्य व्यवस्था या मनु के संविधान के प्राविधान कितने अच्छे ढंग से लोगों को स्मरण थे कि राजनीति का पाठ भी उन प्राविधानों का हवाला देकर ही पढ़ाया जाता था। रामचंद्रजी अपने भाई भरत से कहते हैं-हे तात! भला तुम गुरू वशिष्ठ की सेवा तो करते हो? भला कौशल्या, कैकेयी और समितात्रा तो प्रसन्न हैं? देखिये! राम को पता है कि भरत इस समय अयोध्या का राजा है और यह राज उसने अपनी माता कैकेयी द्वारा रची गयी योजना के अंतर्गत छल से लिया है, तो भी राम अपने भाई भरत से कोई घृणा अथवा द्वेषभाव प्रदर्शित नही कर रहे हैं।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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