मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-एक

  • 2016-11-02 09:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-एक

जब कोई विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूर्ण करके अपने विद्यालय अथवा गुरूकुल से निकलता था तो उसका आचार्य उसे दीक्षांत शिक्षाएं प्रदान करता था। ये शिक्षाएं उसे एक महान विचारों का धनी भद्रपुरूष बनाने में सहायता करती थीं। आचार्य दीनानाथ सिद्घांतालंकार 'प्राचीन भारत की नीतियां' नामक अपनी पुस्तक में आचार्य के दीक्षांत भाषण पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं :-
''सत्य बोलना। धर्म का आचरण करना। स्वाध्याय से प्रमाद न करना। आचार्य को जो प्रिय हो, वह दक्षिणा रूप भेंट कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना और प्रजा के सूत्र को मत तोडऩा। सत्य व्यवहार से प्रमाद न करना। धर्म के आचरण से प्रमाद न करना। जिस साधन से कल्याण प्राप्त हो उससे प्रमाद मत करना। अपनी उन्नति करने में प्रमाद न करना। स्वाध्याय और प्रवचन से प्रमाद न करना। संसार में जो 'देव' गुणों में और पितर आयु में तुमसे बड़े हैं उनके प्रति अपने कत्र्तव्य पालन में प्रमाद न करना। माता का आदर करना। पिता, आचार्य अतिथि-इन्हें देव मानते हुए इनका आदर करना। हमारे जो निन्दाहीन कर्म हैं, उन्हीं का सेवन करना, दूसरों का नहीं। जो हमारे श्रेष्ठ कर्म हैं उन्हीं को अपनाना। हमसे श्रेष्ठ विद्वान जहां भी हों, उनके उपदेश को ध्यान से सुनना, वाद-विवाद में मत पडऩा। श्रद्घा से देना अश्रद्घा से भी देना। अपनी बढ़ती श्री में से देना। श्री न बढ़ रही हो, तब भी लोक लज्जा से देना। भय से देना। प्रेम से देना।

तुम्हारी जीवन यात्रा में अगर किसी कार्य में संदेह उपस्थित हो, धर्माचार क्या है, किसी स्थिति में लोकाचार क्या है? कैसा बरतना है-ऐसा संदेह हो तो वश प्रवृत्त, आरूक्ष स्वभाव के सब पहलुओं पर विचार करने वाले विद्वान ब्राह्मण जैसा व्यवहार करें उसी के अनुसार करना। विवाद और संदेह की स्थिति में युक्त, आयुक्त, अरूक्ष, धर्मकाम, समदर्शी विद्वानों (ब्राह्मण) के पीछे ही चलना। यही आदेश है यही उपदेश है यही वेद और उपनिषद का सार है। यही हमारा अनुशासन है। ऐसा ही आचरण करना। ऐसा ही अनुष्ठान करना।''

हम देखते हैं कि आचार्यश्री के मुखारबिन्दु से निकलने वाले इन पवित्र शब्दों में हर कदम पर व्यक्ति को प्रतिबंधित या निषिद्घ सा किया गया है कि ऐसा मत करना, वैसा मत करना। इसे देखने से लगता है कि जैसे युवा अर्थात वयस्क या बालिग की स्वतंत्रता को ही हमने बाधित कर दिया है। इससे कुछ लोग यह कहने में भी देर नहीं करेंगे कि प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली तो क्रूर थी जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करती थी और उसके खुलेपन पर अपना पहरा बैठाती थी। जबकि आज की शिक्षा उसे खुलापन देती है वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान करती है और कहती है कि अब तुम बालिग हो, जो चाहो सो करो। हमारे बालिग भी यही सुनना चाहते हैं कि अब हम जो चाहें सो करें। इस पर सारी राज्य व्यवस्था मौन है। न्यायालय एक अजीब से दबाव में है और समाज में माता-पिता या बड़े बुजुर्ग बहुत ही कुंठित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। राज्यव्यवस्था वोट की राजनीति के कारण मौन है, वह युवावर्ग को नशे में पड़े रहने देखना चाहती है, उसे विलासी बनाये रखना चाहती है क्योंकि उसे ज्ञात है कि यदि इस देश का युवा सही मार्ग पर आ गया तो तुम्हारी खाट खड़ी कर देगा।

भारत मेें युवा को आचार्य टोकता है, रोकता है, और अपने दायित्व का निर्वाह अंतिम समय (दीक्षांत समारोह के समय) में भी करता है। जिन्हें वह मर्यादा के रूप में स्थापित करता है कि समाज में जा तो रहे हो बेटे-लेकिन कुछ मर्यादाएं हैंं जो तुम्हें वहां जाकर पालनी होंगी। यदि इन मर्यादाओं के पालन में प्रमाद किया तो समाज में अराजकता आ जाएगी और न तो तुम्हारी स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी और ना समाज के अन्य लोगों की ही रहेगी। आचार्य के इस नैतिक साहस को बल प्रदान करती थी- उस समय की राज्य व्यवस्था। जो पूर्णत: अपने आचार्य के साथ खड़ी होती थी।

पूरी न्यायव्यवस्था भी अपने आचार्य के साथ होती थी। पर आज की राज्यव्यवस्था और न्याय व्यवस्था अपने आचार्य के साथ खड़ी नही दिखती। इसलिए अराजकता की स्थिति पैदा हो गयी है।
वास्तव में मर्यादाएं इसीलिए स्थापित की जाती ैंहैं, कि वे हमें एक दूसरे के प्रति उदार और सहनशील बनाएंगी। मर्यादा पालन से स्वतंत्रता की रक्षा होती है न कि उसका हनन होता है। मनु ने ऐसी अनेकों मर्यादाएं खींची हैं जिनका उल्लंघन उन्होंने दण्डनीय अपराध माना है। यदि आज का समाज भी मनु प्रतिपादित उन मर्यादाओं का पालन करना सीख ले तो सबकी स्वतंत्रता की अपने आप ही रक्षा होनी आरंभ हो जाएगी। मनु एक मर्यादा खींचते हैं :-
सत्यं ब्रूयात्प्रियंब्रूयान ब्रूयात्सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्म: सनातन:।। 38।।

''मनुष्य सदैव सत्य बोले और दूसरे का कल्याण कारक उपदेश कर काणे को काणा, मूर्ख को मूर्ख आदि अप्रिय वचन उनके सम्मुख कभी न बोले और जिस मिथ्या भाषण से दूसरा प्रसन्न होता हो उसको भी न बोले यह सनातन धर्म है।'' (सं.वि. 178)
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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