मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-दो

  • 2016-11-03 12:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-दो

इस श्लोक में एक मर्यादा है कि सदा सत्य बोलो पर ऐसा सत्य बोलो जो दूसरों को कड़वा न लगकर मीठा लगे। प्रिय लगे। इस प्रकार के आचरण से व्यक्ति अच्छी सूझबूझ वाला बनता है। समाज के कितने ही वाद-विवाद केवल इसलिए होते हैं कि लोग अपनी वाणी पर नियंत्रण न रख पाते और अनावश्यक दूसरों से पंगा मोल लेते रहते हैं।

इससे अगले श्लोक में मनु महाराज भद्र व्यवहार करते हुए सदा भद्र अर्थात सबके हितकारी वचन बोलने की मर्यादा की सीमा रेखा निर्धारित करते हैं। मनु आगे कहते हैं :-
''कम अंगों वाले या अपंगों पर अधिक अंगों वाले मूर्ख पर आयु में बड़े पर, रूप और धन से हीन व्यक्ति पर, अपने से निम्न वर्ण वाले व्यक्ति पर कभी व्यंग्य या मजाक में कोई आक्षेप न करें।''
इसका अभिप्राय है कि शूद्र के प्रति सारे ही वर्णों को सम्मान का भाव रखना चाहिए।

वृद्घों का स्वागत एवं अभिवादन करना हर व्यक्ति का धर्म है। मनु कहते हैं कि ''सदा विद्यावृद्घों और वयोवृद्घों को नमस्ते (अभिवादन) अर्थात उनका मान्य किया करें। जब वे अपने समीप आवें तब उठकर मान्यपूर्वक अपने आसन पर बैठावें और हाथ जोडक़े आप समीप बैठें जब जाने लगें तो थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर नमस्ते कर विदा करें।'' (सं.वि. 179)
यह शिष्टाचार है। एक सामाजिक मर्यादा है जिसके पालन करने से सामाजिक समरसता उत्पन्न होती है। आज भी सयाने लोग इस मर्यादा का पालन करते हैं। वे सारे के सारे मनुवादी समाज में शिष्ट कहे जाते हैं, और किसी भी गैर मनुवादी को सींग नही मारते। इसके विपरीत अपनी विनम्रता से दूसरों को अपना बना लेते हैं।

मनु जी द्वितीय अध्याय के 190 वें श्लोक में कहते हैं कि एकांत में अपनी माता बहन व पुत्री के साथ भी पुरूषों को नही रहना चाहिए। क्योंकि इंद्रियां पाप करा सकती हैं। यह स्त्री जाति के सम्मान के लिए पुरूष जाति के लिए स्थापित की गयी एक मर्यादा है जो स्पष्ट करती है कि मनु की राजयव्यवस्था में नारी का सम्मान सर्वोपरि था। यदि वह नारी के विरोधी होते तो पुरूष वर्ग को सलाह देते कि सभी नारियां एक समान हैं और उनके साथ एकांतसेवन पूर्णत: उचित हैं।

श्लोक संख्या 191 में मनु युवक शिष्यों को परामर्श देते हैं कि वे जवान गुरू पत्नियों का चरण स्पर्श न करें। अपितु भूमि पर झुककर ही उनके लिए अभिवादन कर लें।
अध्याय 2 के श्लोक 198 (2/223) में कहते हैं कि यदि स्वाश्रित स्त्री या शूद्र भी कोई श्रेष्ठ कार्य करें तो उनसे शिक्षा लेकर उस पर आचरण करना चाहिए। अथवा जिस शास्त्रोक्त कर्म में इसका मन रमे उस श्रेष्ठ कार्य को करता रहे। कहने का अर्थ है कि स्त्री या शुद्र को भी श्रेष्ठ कार्य करने पर प्रोत्साहित करना ही उचित और नीति संगत है।
मनु शूद्र के विषय में एक मर्यादा स्थापित करते हैं कि शूद्र होता कौन है? इस पर वह बताते हैं-''परमेश्वर ने जो विद्याहीन जिसको पढऩे से भी विद्या न आवे, शरीर से पुष्ट, सेवा में कुशल, उस शूद्र के लिए इन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों की निंदा से रहित प्रीति से सेवा करना, यही एक कर्म करने की आज्ञा दी है।''
(सं.वि. 177)

मनु की इस व्यवस्था से स्पष्ट है कि शूद्र वह है जो पढऩे से भी विद्या न सीख पाए। मनु ने शूद्र के लिए विद्या ग्रहण करने का द्वार बंद नहीं किया अपितु कहा है कि जो पढऩे का प्रयास तो करता है और समाज उसे पढऩे का अवसर भी देता है पर उसे विद्या प्राप्त नही हो पाती, वह व्यक्ति शूद्र है। ''शूद्र वह व्यक्ति है जो अपने अज्ञान के कारण किसी प्रकार की उन्नत स्थिति को प्राप्त नही कर पाया और जिसे अपनी निम्न स्थिति होने की तथा उसे उन्नत करने की सदैव चिंता बनी रहती है अथवा स्वामी के द्वारा जिसके भरण पोषण की चिंता की जाती है ऐसा सेवक मनुष्य शूद्र होता है।
जिन लोगों ने मनु की इस व्यवस्था से अलग जाकर शूद्र को अपना दास बनाया या उनके साथ ऐसा करने का प्रयास किया और मनु को इसके लिए दोषी बनाया उन लोगों ने शूद्रों के साथ अपमान जनक व्यवहार करके न केवल मानवता का अपमान किया है अपितु स्वयं मनु के साथ भी अन्याय किया है।
मनु शूद्र के लिए स्पष्ट करते हैं-''वह उत्तम कर्मों से उच्चवर्ण को भी प्राप्त कर सकता है।''
(9/335 /10 /65)
'विशुद्घ मनुस्मृति' के लेखक प्रो. सुरेन्द्र कुमार लिखते हैं-''अपने धर्म कर्मों को पालन न करने पर कोई भी व्यक्ति शूद्र बन जाता है, ऐसा मनु का मत है। यथा (अ) वेद न पढऩे पर द्विज शूद्रता को प्राप्त करता है (योअनधीज्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरूते श्रमय। स जीवन्नेव शूद्रत्व माशु गच्छति सान्वय: ।। 2/168) (आ) सन्ध्योपासना न करने वाला व्यक्ति शूद्रवत (बहिष्कार्य) होता है। (न तिष्ठति तु य: पूर्वांनोपास्तेयश्च परिश्चयाम्। स शूद्रवत् बहिष्कार्य: सर्वस्मात द्विजकर्मण: 2/103)। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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