मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-तीन

  • 2016-11-04 13:00:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-तीन

(इ) यथोक्त आयु सीमा तक उपनयन में दीक्षित न होने पर द्विज बनने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति व्रात्य संज्ञक शूद्र कहलाते हैं। (2/37-40) (ई) नीचों की संगति से (नीच कर्म करने पर) ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त करता है उत्तमानुत्तमान्गच्छनहीनान हृीनॉश्च वर्जयन्। ब्राह्मण: श्रेष्ठतामेद्वि प्रत्यवायेन शूद्रताम्।। (4/225) इन प्रमाणों से यह सिद्घ होता है कि न तो मनु ने व्यक्ति को जन्म से ही श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ माना है और न जन्मना आधार पर वर्ण व्यवस्था मानी है, यदि जन्मना इनका निर्धारण होता तो उक्तरूप से वे निम्न न बनते।

इसके साथ ही शूद्रता को प्राप्त व्यक्ति यदि अपने कर्मों को सुधार लेता है और त्रुटियों के लिए प्रायश्चित कर लेता है, तो वह पुन: अपने वर्ण का हो सकता है। मनु ने यह मान्यता 'व्रात्य' संज्ञक शूद्रों के लिए और वर्णविरूद्घ कार्यों के कारण ब्राह्मण वर्ण से बहिष्कृत ब्राह्मणों के लिए विहित प्रायश्चितों में प्रकट की है। (11/191/196)

नारियों के विषय में मनु की मर्यादाएं
महर्षि मनु पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे नारी जाति के विरोधी थे। पर वास्तव में यह आरोप भी निराधार है। मनु नारी को पूरा सम्मान देते थे। उनके नाम पर जिन लोगों ने मनुस्मृति के साथ छेड़छाड़ करके नारी के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां की हैं वह भी भारी पाप के दोषी हैं। अन्यथा मनु की तो स्पष्ट घोषणा है कि-
यत्र नार्यंस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।
यत्रैतास्तु न पूज्यंते सर्वास्तत्राफला: क्रिया।।

इस श्लोक में महर्षि मनु ने मर्यादा स्थापित की है कि नारी जहां सम्मानित होती है वहां देवताओं का वास होता है और दिव्य लाभों की प्राप्ति होती है। नारी के पूजन का अर्थ है नारी सुलभ गुणों यथा उसकी ममता, कोमलता, विनम्रता, सुशीलता, संतान की जननी होना आदि गुणों का सम्मान करना और यह मानना कि परिवार में यदि ये गुण हैं और बच्चे इन गुणों को अपना रहे हैं तो इसमें एक नारी (उनकी माता) का विशेष योगदान है। इसीलिए मनु यह भी मर्यादा स्थापित करते हैं कि-
पितृभि: भ्रातृभिश्चैता...पूज्याभूषयितप्याश्च। (3/55)
अर्थात नारी को उसके पिता, भाई, पति आदि के द्वारा सम्मान मिलना चाहिए। आज जब 'नारी सशक्तिकरण' की बातें की जा रही हैं तो इस विषय में महर्षि मनु हमारी राज्यव्यवस्था के लिए आदर्श हो सकते हैं।

मनु कहते हैं कि-
तस्मादेता: सदा पूज्या: भूषणाच्छादनाशनै:।। (3/59)
''नारी को वस्त्रों व आभूषणों से सदा ही आदृत किया जाए। अच्छे वस्त्र और आभूषण नारी को स्वाभाविक रूप से अच्छे लगते हैं। मनु ने नारी के इस गुण को पहचाना और उन्हें प्रसन्न करने के लिए यह मर्यादा स्थापित की।'' क्योंकि-
संतुष्टोभार्यया भत्र्ता भत्र्ता भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वैध्रवम्।।
(3/61)

व्यवस्था है कि यदि नारी अपने पति से और परिजनों से सम्मानित होती है और संतुष्ट रहती है तो ऐसे कुल का कल्याण होता है। जहां नारी शोक ग्रस्त रहती है, वहां क्या होता है? बताया है :-
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्पाशु तत्कुलम्।
न शोचन्तितु यत्रैता वर्धते तद्वि सर्वदा।।
(3/57)

अर्थात जहां नारियों पर अत्याचार होते हैं और वे अपने साथ होने वाले अत्याचारों के कारण या किसी भी कारण से शोकग्रस्त रहती हैं वहां विनाश हो जाता है। इसलिए परिवार के लोगों की यह मर्यादा है कि वे नारियों को शोकग्र्रस्त न होने दें, उससे उन्हें उबारें और उन्हें मानसिक रूप से हौंसला देते रहें, घर की हर जिम्मेदारी में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है, यह उन्हें हर कदम पर अनुभव कराते रहें। कहने का अभिप्राय है कि जो लोग अपने पुरूष होने के कारण घर की शांति में और उन्नति में नारी की भूमिका नकारते हैं-उन्हें अपनी आदतें बदलनी चाहिएं। जो लोग इस व्यवस्था के पहले से ही समर्थक हैं और इसे अपना कत्र्तव्य मानकर निभा रहे हैं, वास्तविक 'मनुवादी' वही हैं। इसी मनुवाद को स्थापित करने के लिए मनु विरोधी शोर मचाते हैं, तब उन्हें स्वयं के विषय में ही पता नहीं होता कि वे मनु की मर्यादा का पालन कराने के लिए ही यह शोर क्यों मचा रहे हैं?
क्योंकि मनु कहते हैं :-
प्रजनार्थ महाभागा: पूजार्हा गृहदीप्तय:।
स्त्रिय: श्रियश्च गेहेषुन् विशेषोअस्तिकश्चन्।।
(9/25)
''स्त्रियां घर की लक्ष्मी और शोभा होती हैं। उनके रहने से घर दीप्तिमान=शोभायमान रहता है। आज तक भी इस मर्यादा का अर्थ समझने वाले लोग (भारत के गांव देहात में) बड़ी सरलता से कह दिया करते हैं कि बिना नारी के घर में भूतों का निवास होता है। उनकी यह मर्यादा मनुवाद की टूटी-फूटी कड़ी है-जिसे आज समझने की आवश्यकता है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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