मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-छह

  • 2016-11-09 12:30:19.0
  • अमन आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-छह

नारी को वेदाध्ययन का अधिकार
नारी से कुछ लोगों ने वेदाध्ययन का अधिकार छीन लिया और उसे मनु के सिर मढ़ दिया। जबकि मनु नारी को शिक्षित और संस्कारित देखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वेदों को आधार बनाया जो कि स्वयं नारी को वेदाध्ययन का अधिकार देते हैं। वैसे भी धरती की आधी जनसंख्या को वेद विद्या से दूर रखने का विधान करना उस मनु के लिए असंभव था जो मां को गृहस्वामिनी बनाकर परिवार जैसी पवित्र संस्था का पूर्ण दायित्व सौंपने का पक्षधर हो। यही कारण है कि मनु महाराज ने नारी को पुरूष के प्रत्येक मांगलिक कार्य में साथ रहकर वेद मंत्रों का उच्चारण कराने की बात कही है। 2/4 (2/29)
श्लोक में जातकर्म के अवसर पर बालक और बालिका दोनों के लिए मंत्रोच्चारण पूर्वक शहद चटाने का विधान किया गया है- ''मंत्रवत प्राशनं चास्य।''
स्पष्ट है कि जिस व्यक्ति के द्वारा बच्चे के जन्म के समय ही बालक बालिका में कोई भेद नही किया जा रहा है, उससे बाद में किसी प्रकार के भेद की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? अन्य नामकरण आदि संस्कारों के करने कराने में भी किसी प्रकार का भेद नहीं किया गया है। अत: यदि कोई श्लोक (41वां) स्त्रियों को वेदमंत्रों के निषेध की बात कहता है-तो वह प्रक्षिप्त है।
मनु (3/28) में अग्निहोत्रपूर्वक स्त्रियों के दैव विवाह करने का प्राविधान करते हैं। अब स्पष्ट है कि यदि अग्निहोत्र से स्त्रियां दैव विवाह करेंगी तो वह बिना मंत्रोच्चारण (वह भी नित्य प्रति) के तो होने से रहा।

इसके अतिरिक्त एक बात यह समझनी व माननी चाहिए कि मनु की व्यवस्था वेद संगत ही है, उसमें ऐसी कोई बात नहीं हो सकती जो वेद विरूद्घ हो। कारण कि महर्षि मनु वेद धर्म को ही सर्वोपरि मानते थे और वेद की मान्यताओं को ही मानवता के लिए उचित मानते थे। वेद ने कई स्थलों पर पति-पत्नी को यज्ञ करने का निर्देश दिया है। अथर्ववेद (19/58) में आया है-''इमं यज्ञं सह पत्नीभिरेत्य=इस यज्ञ में पत्नियों समेत आकर आनंदित हों। इसी प्रकार ऋग्वेद (8/31/5) में भी आया है-'या दम्पती समनसा सुनुत:' अर्थात जो दंपती=पति-पत्नी एक मन से यज्ञ करते हैं।
वेद ऐसी व्यवस्था तभी करता है जब दोनों को वेद पढऩे का और मंत्रोच्चारण करने का समान अधिकार देगा। ऋग्वेद (5/47/6) में आया है :-
''वि तन्वतेधियो अस्मा अपांसि.....मातर:''
अर्थात माताएं अपनी संतान के लिए बुद्घियों तथा कर्मों का विस्तार करती हैं। माताएं देशों के भाग्य की निर्माता होती हैं, वे ही अपने बच्चों को उच्च संस्कार देती हैं। यदि वेद नारी जाति को पठन-पाठन का अधिकार नहीं देता तो उन्हें इतना बड़ा दायित्व भी कभी नही देता कि वे अपनी संतानों में श्रेष्ठ बुद्घियों का और श्रेष्ठ कर्मों का विस्तार करें। वैसे भी एक अज्ञानी माता से ऐसे उत्कृष्ट कार्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अथर्ववेद में आया है :-
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्
(3/5/18)

अर्थात ''ब्रह्मचर्याश्रम में रहकर वेदों को पढऩे और ब्रह्मचर्य का पालन करने के उपरांत गृहस्थ की कामना करने वाली कन्या युवक पति का वरण करती है।'' यह मंत्र भी प्रमाण है कि वेद नारी को समान शिक्षा का अधिकार देता है। मनु घर में होने वाले अग्निहोत्र आदि धर्म कार्यों की जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही डालते हैं। हमारे समाज में धार्मिक कार्यों में जितनी अधिक रूचि नारी लेती है, उतना पुरूष नहीं लेता।

कुछ लोगों का मानना है कि नारी भावुक होती है, इसलिए वे इन कार्यों में न केवल भाग लेती है, अपितु धर्म बाबा या धर्म गुरूओं के जाल में भी आराम से फंस जाती हैं। हमारा मानना है कि धार्मिक क्रियाओं को नारी अपने नेतृत्व में युग-युगों से कराती आयी है, और इस देश के समाज ने उसे इन कार्यों को कराने की पूरी छूट भी दी है, इसलिए धार्मिक क्रिया कलापों का संपादन कराना उसका एक परंपरागत संस्कार बन गया है।

मनु महाराज ने धार्मिक क्रियाओं की जिम्मेदारी नारी को सौंपते हुए पुरूष समाज के लिए मर्यादा बनायी है कि 'शौचे धर्मे अन्न पक्त्यांच' अर्थात 'घर की शुद्घि, धर्मकार्यों का आयोजन और भोजन बनाना आदि की जिम्मेदारी स्त्री को दी जाए।'

अब एक बात तो निश्चित है कि धार्मिक क्रिया कलापों, अग्निहोत्रादि में संस्कृत के वेदमंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जिन्हें एक अशिक्षित महिला तो करेगी नहीं। निश्चित रूप से उन्हें एक पढ़ी लिखी और बड़ा वैयाकरणिक वेद मंत्रोच्चारण करने वाली महिला ही संपन्न कराएगी। क्रमश:

अमन आर्य ( 358 )

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