मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-सात

  • 2016-11-10 12:30:33.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-सात

शूद्र-स्त्री शिक्षा पर महर्षि दयानंद के विचार
यदि महर्षि मनु शूद्र और स्त्री शिक्षा के विरोधी होते तो महर्षि दयानंद सत्यार्थप्रकाश में उनकी अवश्य खबर ले लेते। पर महर्षि दयानंद ने मनु के विषय में ऐसा कहीं नहीं कहा है कि वे शूद्र-स्त्री शिक्षा के विरोधी थे। स्त्री और शूद्र की शिक्षा पर महर्षि दयानंद जी के विचार भी जानने योग्य हैं। जो लोग यह मानते हैं कि प्राचीन काल में भारत में स्त्री और शूद्र को पढऩे लिखने का कोई अधिकार नहीं था, वे भूल करते हैं। महर्षि ने 'उपदेश मंजरी' (पूना प्रवचन) के तृतीय प्रवचन में कहा था-''पूर्वकाल में आर्य लोगों में स्त्रियां उत्कृष्ट रीति से पढ़ती थीं। आर्य लोगों के इतिहास की ओर देखो, स्त्रियां आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत धारण करके रहती थीं और साधारण स्त्रियों के भी उपनयन और गुरूग्रह में वास इत्यादि संस्कार होते थे। गार्गी, सुलभा, मैत्रेयी, कात्यायनी आदि बड़ी-बड़ी सुशिक्षित स्त्रियां होकर बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की शंकाओं का समाधान करती थीं।''
ऐसा भारत था अपना। सचमुच इसकी ऐतिहासिक विरासत गौरव प्रदात्री है।

महर्षि दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में प्रश्न उठाया है-''क्या स्त्री और शूद्र भी वेद पढ़ें? जो ये पढ़ेंगे तो हम फिर क्या करेंगे? और इनके पढऩे में प्रमाण भी नही हैं जैसा कि यह निषेध है-''स्त्री शूद्रोनाधीयतामिति श्रुते''-स्त्री और शूद्र न पढ़ें यह श्रुति है। इसका उत्तर देते हुए महर्षि दयानंद जी महाराज ने लिखा है-''सब स्त्री और पुरूष अर्थात मनुष्य मात्र को पढऩे का अधिकार है। तुम कुंओं में पड़ो और यह श्रुति तुम्हारी कपोल कल्पना से हुई है, किसी प्रामाणिक ग्रंथ की नही है।''
महर्षि दयानंद स्त्रियों की शिक्षा का निषेध करने वालों का फटकारते हुए कहते हैं-'और जो स्त्रियों के पढऩे का निषेध करते हो यह तुम्हारी मूर्खता, स्वार्थता और निर्बुद्घिता का प्रभाव है।'
महर्षि दयानंद के ये वचन भी दृष्टव्य हैं-''विद्वानों की यही योग्यता है कि सब कुमार और कुमारियों को पंडित बनावें, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सम मति हों।''
(ऋ. भा. 2/41/16)

'यदि माता-पिता अपने पुत्र तथा कन्याओं को अच्छी शिक्षा देके, फिर विद्वान और विदुषी के समीप बहुत काल तक रखकर पढ़ावें तब वे कन्या और पुत्र सूर्य के समान अपने कुल और देश के प्रकाशक हों।' (य. भा. 11/36)
''जैसे माताएं संतानों को दूध आदि देकर बढ़ाती हैं वैसे विदुषी स्त्रियां और विद्वान पुरूष कुमारियों और कुमारों को विद्या और अच्छी शिक्षा से बढ़ावें।'' (ऋ. भा. 1/152/6)
''जो भूमि के तुल्य क्षमाशील लक्ष्मी के तुल्य शोभती हुई जल के तुल्य शांत, सहेली के तुल्य उपकार करने वाली विदुषी अध्यापिकाएं हों वे सब कन्याओं को पढ़ावें और सब स्त्रियों को उपदेश से आनंदित करें।''
(ऋ. भा. 7/40/7)
ऐसे उद्घरणों से स्पष्ट है कि भारत में नारी और शूद्र को पढऩे-पढ़ाने और अपना संपूर्ण विकास करने का नैसर्गिक अधिकार प्राप्त रहा है। भारत के हर धर्मग्रंथ की शिक्षाएं स्त्री और शूद्र दोनों के लिए समान रूप से उपलब्ध रही हैं।

जहां तक मनु महाराज की बात है तो उन्होंने भी शूद्र को अस्पृश्य नही माना है। तीनों वर्णों की सेवा का अधिकार उसे देकर या उसके वर्ण का कत्र्तव्य निर्धारण कर मनु का शूद्र अस्पृश्य नहीं रह जाता है। मनु ने शूद्र को धर्मपालन का अधिकार भी प्रदान किया है। 'अन्त्यादपि परम धर्मम्' (2/213, 239) कहकर उन्होंने शूद्र को धर्मपालन का अधिकार दिया है।
मनु ने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों के लिए मर्यादा निर्धारित की है :-
''सोअत्र मानाह: शूद्रोअपि दशमीं गत:''
(2/112/137)
अभिप्राय है कि तीनों द्विज वृद्घ शूद्र का सम्मान करें। समाज में ब्राह्मण को ज्ञानबल से, क्षत्रिय को क्षात्रबल से वैश्य को धनबल और शूद्र को वयोवृद्घ होने से सर्वोच्च आसन मिलता है। मनु की इस व्यवस्था का जिन लोगों ने उल्लंघन कर सर्वोच्च आसन पर अपना एकाधिकार जमाने का प्रयास किया उन्होंने मनुवाद को विकृत किया है। मनु तो यह भी मर्यादा स्थापित करते हैं-
शुचिरात्कृष्टशुश्रुषर्मृदु वागनहंकृत:।
ब्राह्मणद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुमते।।

''शुद्घ पवित्र शरीर एवं मन से अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, सदा ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की सेवा में संलग्न शूद्र भी उत्तम ब्रह्मजन्मान्तर्गत द्विजवर्ण को प्राप्त कर लेता है।''

कहने का अभिप्राय है कि नारी और शूद्र पर निषेधात्मक प्रतिबंध जिन लोगों ने लगाये हैं-उनसे मनु का कोई संबंध नहीं है। मनु न केवल समतावादी थे, अपितु अंत्योदयवादी सोच के भी थे। उनकी मर्यादाएं यदि आज भी शुद्घ रूप में समाज में स्थापित कर दी जाएं तो वे समाज को सही दिशा देने की सामथ्र्य आज भी रखती हैं। हमारा प्रयास रहना चाहिए कि आंख मूंदकर मनु की आलोचना नहीं करनी चाहिए और जिन लोगों ने मनु के नाम पर मनु की व्यवस्था में मिलावट की है-उनकी मिलावट को मनुवाद कहकर समाज में परोसना भी बंद होना चाहिए। इसके स्थान पर मनु की मर्यादाओं का उसी प्रकार पालन किया जाए जिस प्रकार एक विद्यार्थी दीक्षा लेकर जब विद्यालय से बाहर आता है तो आचार्य के दीक्षांत भाषण का पग-पग पर ध्यान रखता है। मनुस्मृति हमारे लिए मनु आचार्य का दीक्षांत प्रवचन बन जाए तो कोई बात बने।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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