मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-पांच

  • 2016-11-07 12:30:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु की मर्यादाएं और समाज, भाग-पांच

यदि 'द्रोपदी' और अपने सतीत्व का पूरा ध्यान रखेगी, तो कोई 'दु:शासन' द्रोपदी को हाथ भी नही लगा पाएगा। द्रोपदी एक सन्नारी थी, जिसके विषय में यही सत्य है कि उसके सतीत्व के कारण दु:शासन उसे हाथ नही लगा पाया था, इस प्रकार रावण जैसा कामी व्यक्ति सीताजी के सतीत्व बल के सामने स्वयं ही झुक गया था। इन तथ्यों को बताने की और सामने लाने की आवश्यकता है। जिससे समाज में बन रहा वासनात्मक परिवेश समाप्त हो सके। दृष्टिकोण का ही अंतर है कि एक व्यक्ति नारी को भोग्या समझता है तो एक उसे योग्या समझता है, एक उसे वासना की दृष्टि से देखता है तो एक उसमें मातृशक्ति के दर्शन करता है। नारी योग्या हो जाए और पुरूष उसे केवल मातृशक्ति के रूप में देखें-बस इसी से नारी सशक्तिकरण की प्रक्रिया पूर्ण होगी, यही मनुवाद है। इस मनुवाद से आज का कानून जितनी देर तक लुका-छिपी का खेल खेलेगा, उतनी देर तक वह नारी सशक्तिकरण कर नही पाएगा।


चलो चलें-मनु की ओर
चलो चलें-मनु की ओर। ऐसी परिस्थितियों में यही उचित है कि मनु की ओर ही लौटा जाए। जहां मनु कह रहे हैं-
अन्योन्यस्य अव्यभिचारो भवेदामरणान्तिक एवं धर्म: समासेन ज्ञेप: स्त्री पुंसयौ पर:
।। 9/101।।
अर्थात पुरूष और नारी सदा मिलकर रहें, समानभाव से एक दूसरे के प्रति बरतें, व्यवहार करें कोई सा भी कोई से का उत्पीडऩ या दमन ना करे। इससे अगले श्लोक में मनु कहते हैं कि स्त्री पुरूष परस्पर समानभाव से बरतकर रहते हुए अर्थात चकवा-चकवी की भांति प्रेम करते हुए रहें और एक दूसरे से कभी ना बिछुड़ें। इसका अर्थ यह है कि तलाक जैसी स्थिति भारत में नही है-मनु दोनों को अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करते हुए सदा साथ रहने का आदेश दे रहे हैं। अब इस मर्यादा को तोड़ा जा रहा है तो आज की राज्यव्यवस्था के लिए उचित तो यह है कि वह दोनों को मर्यादित जीवन जीने के लिए प्रेरित और बाध्य करे, पर हो रहा है इसके विपरीत। आज की राज्यव्यवस्था ने 'तलाक' की खोज कर ली है और तलाक के लिए दोनों पक्षों को अधिकार दे दिये हैं-नारी को कुछ अधिक दे दिये गये हैं। फलस्वरूप न्यायालयी में तलाक के केस नित्य प्रति बढ़ते ही जा रहे हैं। आज की राज्यव्यवस्था ने एक समस्या का समाधान खोजने के स्थान पर नई सामाजिक विसंगतियों को जन्म दे दिया है। कोई नही देख रहा कि तलाक से क्या-क्या हानियां हो रही हैं? कितने ही बच्चे ऐसे हैं जो माता-पिता के प्यार से वंचित हो रहे हैं? कितने ही बुढ़ापे ऐसे हैं जो फफक-फफक कर रो रहे हैं? इस निर्मम समाज पर। इससे भी बुरी स्थिति यह आ रही है कि 'लिव इन रिलेशनशिप' का प्रचलन बढ़ रहा है, जिसे व्यवस्था का समर्थन मिलने से आबाद घर भी बर्बाद हो रहे हैं। कोई एक लडक़ा या पुरूष और कहीं पर कोई लडक़ी या नारी विवाह के उपरांत भी एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो रहे हैं और अनजाने में ही अपनी घर गृहस्थी को उजाडऩे का कारण बन रहे हैं। हमारा स्पष्ट मानना है कि समस्या का समाधान उसी मनुवाद में है जहां दोनों (पति-पत्नी) संयमित और मर्यादित जीवन जीने के लिए प्रेरित किये जाते हैं। जहां कहा जाता है-
प्रजनार्थ स्त्रिय: सृष्टा: संतानार्थ च मानवा:।
तस्यात्साधारणो धर्म: श्रुतौ पत्न्या सहोरिन्त:।।
(9/96)
अर्थात स्त्री और पुरूष दोनों ही समान हैं, अत: सभी कार्य दोनों मिलकर करें। एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं, इसलिए परस्पर विश्वास बनाये रखकर जीवन की गृहस्थ रूपी गाड़ी को खींचते रहें। मनु महाराज पुरूष वर्ग को आदेशित करते हैं:-
स्त्रिया: पंथा देय: (2/113, 2/138)
पुरूष वर्ग को स्त्री के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए। इस मर्यादा से नारी के प्रति पुरूष का सम्मान भाव दिखता है। भारत के गांवों में यह परंपरा आज भी है। जहां व्यक्ति यदि मूत्र-त्याग के लिए भी बैठता है तो पहले यह देखता है कि कोई नारी तो नही आ रही है। पर मनु विरोधियों ने शहरों में 'कृपा करके' इस व्यवस्था को बदल दिया है। पुरूष कहीं भी खड़े होकर पेशाब करने लगता है और इतना ही नही नारी भी उसके पास से आराम से निकल जाती है। यह नंगापन आधुनिकता बन गयी है। समाज की मर्यादा भंग हो रही है, और हम ढूंढ़ रहे हैं कि-मर्यादा कहां गयी। मनु पति के लिए मर्यादा स्थापित करते हैं :-
भार्यया.....विवादं न समाचरेत् ।
इस मर्यादा से पति को निषिद्घ किया गया है कि पत्नी से कोई वाद-विवाद नही करना है। इसी प्रकार पत्नी या माता या किसी भी नारी पर झूठा दोषारोपण करने या उन्हें अपशब्द कहने से भी पुरूष को रोका गया है। मनु इस प्रकार ही अशोभनीय बातों को दण्डनीय मानते हुए कहते हैं-
मातरं पितरं जायाम.....आक्षारयन् शतं
दण्डम्।। (8/180) क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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