मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-1

  • 2016-09-21 09:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-1

राकेश कुमार आर्य
अथर्ववेद (3/4/2) में आया है :-''हे राजत्वाभिलाषिन! प्रजाएं राजकार्य के लिए तुझे चुनें, स्वीकार करें तथा ये पांचों दिव्य गुणयुक्त प्रदिशाएं तुझे ही चुनें। चुना जाने पर राष्ट्र के श्रेष्ठ सिंहासन पर आश्रय ले बैठ। उसके पश्चात तेजस्वी होकर हमारे लिए धनों का विभाग कर।''
इसकी व्याख्या करते हुए स्वामी वेदानंद तीर्थ जी महाराज लिखते हैं :-''आज के संसार को अभिमान है कि यह राजा का चुनाव करता है। यद्यपि संसार का बहुत बड़ा भाग इससे वंचित है। इतनी बात अवश्य है कि समस्त संसार अपना शासक चुनने का अधिकार प्राप्त करने में लालायित हो रहा है यह लालसा-राजनिर्वाचन की उत्कृष्टता की सूचक है। पश्चिम तथा उसके चेलों को भ्रम है कि यह राजनिर्वाचन की पद्घति उसकी चलाई हुई है। संसार का सबसे पुराना गं्रथ वेद इसका आविष्कारक तथा प्रचारक है। देखिये, राजा होने के इच्छुक को वेद कहता है-'त्वां विशोवृणतां राज्याय=राज्यकार्य के लिए प्रजाएं तुझे चुनें। अथर्ववेद (3/4/1) में कहा है-सारी प्रदिशाएं, हे राजन! तुझे चाहें।
प्रदिशा का अर्थ है-दिशाओं -विदिशाओं में रहने वाली प्रजाएं। अथर्ववेद (3/5/7) में राजा बनाने वालों का भी उल्लेख है ये राजानो राजकृत: सूता ग्रामण्यश्च=ये सामंत राजा (सरदार जागीरदार) तथा सूत नंबरदार आदि राजा के बनाने वाले हैं। इससे प्रतीत होता है कि राजा के चुनने में सरदारों जागीरदारों, सूतों नंबरदारों का मत लेना चाहिए।''
इस मंत्र से यह भी पता चलता है कि राजा को चुनने का अधिकार योग्य, अनुभवी, विद्वान और राजकार्यों में निपुण लोगों तक ही सीमित था यह प्रक्रिया कुछ वैसी ही मानी जानी चाहिए जैसी आज के प्रधानमंत्री को चुनते समय देखी जाती है। प्रधानमंत्री को लोकसभा के निर्वाचित सांसदों का बहुमत चुनता है। सभी सांंसदों से अपेक्षा की जाती है कि वे एक योग्य और अनुभवी व्यक्ति को ही अपना नायक बनाकर राष्ट्रनायक घोषित करेंगे। पर हमारा मानना है कि आज के प्रधानमंत्री के चुनने की यह प्रक्रिया तो हमारी राजा चुनने की प्राचीन परंपरा की केवल नकल मात्र है, यह उतनी लोकतांत्रिक नही है, जितनी प्राचीन परंपरा लोकतांत्रिक थी। इसका कारण यह है प्रधानमंत्री को चुनने वाले सांसदों की योग्यता-अयोग्यता वोटों से निर्धारित होती है, वह जीतकर आने चाहिए-चाहे जैसे जीतकर आ जाएं। दूसरे ये जीते हुए सांसद अपना मत उसी व्यक्ति को देते हैं, जो इनकी पार्टी का नेता होता है या जिसके नाम पर चुनाव में इन्हें मत मिलते हैं। इस प्रकार आज के प्रधानमंत्री के चुनाव की प्रणाली में दोष है।
हम अपने देश के राष्ट्रपति के चुनाव में भी ऐसी ही दोषपूर्ण प्रक्रिया को देखते हैं जो हमारे आज के संविधान की देन है। राष्ट्रपति के चुनाव में ऐसे विधायक और सांसद अपने मत का प्रयोग करते हैं जो समाज में जाति, बिरादरी, क्षेत्र या भाषा के नाम पर लोगों में फूट डालकर वोट प्राप्त करते हैं। वोट प्राप्त करने की इस दुर्भावना का प्रभाव हमारी शासन प्रणाली और शासन की कार्यशैली पर स्पष्ट दिखाई देता है। शासक लोककल्याण की बात तो करते हैं, पर लोककल्याण के कार्यांे को नही करते।
हमारा स्पष्ट मत है कि राजा अथवा प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के चुनाव में विद्वान, न्यायशील, समदर्शी और समतामूलक समाज की संरचना के लिए कृतसंकल्प लोग ही अपना मत डाल सकें। ऐसे लोगों का चयन जनता करे और इन सभासदों की विद्वत्ता का निर्धारण वेदों के प्रकाण्ड पंडित (अर्थात विद्वान) राजधर्म और राष्ट्रनीति के मनीषी लोग करें। महर्षि मनु वेद के सिद्घांतों अथवा दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्य संचालन कराने के समर्थक थे।
अथर्ववेद (12/1/1) में वेद ने किसी भी देश की स्वतंत्रता को सुस्थिर रखने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता अनुभव की है वह भी आज की विश्व राज्यव्यवस्था के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्घ हो सकती है।
वेद का आदेश है :-
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षातपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवींधारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरांलोकं पृथिवी न: कृणोतु।।
देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए वेद ने गुणों की आवश्यकता बताई है-(1) सत्यम् (2) बृहत् (3) ऋतम् (4) उग्रम् (5) दीक्षा (6) तप (7) ब्रह्म (8) यज्ञ।
अब इन एक-एक गुण पर विचार करते हैं। इनमें प्रथम है-
(1) सत्यम्-देश के नागरिकों को अपने देश और राष्ट्र के प्रति सच्ची भावना से समर्पित रहना चाहिए। जो लोग अपने देश या राष्ट्र के प्रति सच्ची भावना से समर्पित नही रहते हैं वे अपने देश या राष्ट्र की क्षति कर बैठते हैं या उसे पतन के गर्त में गिरा देते हैं। हमने अपने देश की 'स्वतंत्रता का 1235 वर्षीय (सन 712 से लेकर 1947 तक का) स्वातंत्रय समर' जो कि अत्यंत दीर्घकालीन था, केवल इसीलिए लड़ लिया था कि हमारे भीतर राष्ट्रीय भावना थी और हमें अपने देश से सच्चा प्यार था। पर जिन लोगों के भीतर किसी भी कारण से इस देश भक्ति की भावना का लोप हो गया था, वे अपने ही देश का विभाजन कराने की मांग करने लगे थे। इस देश के जितने भी विभाजन हुए उन सबके पीछे कुछ लोगों में देशभक्ति की सच्ची भावना का लोप हो जाना एक प्रमुख कारण था। अत: किसी भी देश के निवासियों के भीतर देशभक्ति के जज्बे का होना परम आवश्यक है। देशवासियों की देशभक्ति के बिना कोई भी देश आगे नही बढ़ सकता।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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