मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-8

  • 2016-12-29 12:30:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-8

गतांक से आगे........

प्रशंसनीय मित्र राजा के लक्षण
''धर्म को जानने वाला और कृतज्ञ अर्थात किये हुए उपकार को सदा मानने वाले, प्रसन्न स्वभाव अनुरागी (स्थिरतापूर्वक मित्रता या कार्य करने वाला) लघु=छोटे मित्र को प्राप्त होकर प्रशंसित होता है।'' (स.प्र. 164)
जिस राजा में उपरोक्त गुण समाविष्ट हों उसे मित्र बनाने में लाभ ही लाभ है। क्योंकि मित्रों की संगति हमारे दुर्गुणों का हनन करती है, जबकि दुष्टों की संगति हमें पथभ्रष्ट करती है।

राजा का आपदधर्म
मनु की व्यवस्था है कि :-
क्षेम्यां सस्यप्रदांनित्यं पशुवृद्घिकरोमपि।
परित्यजेन्नृपो भूमिमात्यमार्थमविचारयन्।। 212।।
जब किसी राजा से किसी दूसरे राजा को पराजय का मुंह देखना पड़ जाए तो उस समय राजा को आत्मरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए और विजयी राजा को अपने राज्य की रक्षा के लिए यदि आरोग्यता से युक्त धान्य घास आदि से उपजाऊ रहने वाली ऐसी भूमि जहां पशुओं की वृद्घि होती हो-को भी बिना विचार किये दे देना चाहिए। अर्थात आपद्काल में अपना कुछ गंवाकर भी यदि सम्मान सुरक्षित रहता हो तो उसकी रक्षा करनी चाहिए।
अगले श्लोक (213) में मनु कहते हैं कि आपत्ति में पडऩे पर राजा को आपत्ति से रक्षा के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए और धनों की अपेक्षा स्त्रियों की रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। स्त्रियों का अभिप्राय यहां परिवार की रक्षा करने से भी है। स्त्रियों से भी और धनों से भी आत्मरक्षा करना सबसे आवश्यक है। यदि उसकी रक्षा नहीं हो सकेगी तो वह न परिवार की रक्षा कर सकेगा और न धन की, न राज्य की।
राजा यदि उन परिस्थितियों में बचा रह जाता है तो आपत्ति काल निकलने पर अपने राज्य को पुन: उसी प्रकार उठा लेगा जैसे तूफान के निकल जाने के पश्चात बांस का पेड़ धरती से अपने आपको ऊपर उठा लेता है। एक प्रकार से राजा को यहां यही शिक्षा दी गयी है कि आपत्तिकाल में 'बांस धर्म' का ही प्रयोग करना चाहिए। ''आपत्ति काले नास्ति मर्यादा'' कहकर भी हमारे विद्वानों ने इसी ओर संकेत किया है।
इस सिद्घांत की या विधान की अपनी सीमाएं हैं, यदि एक राजा दूसरे राजा के सैन्यदल को देखकर ही भाग लेता है, या स्वयं भयभीत होकर उससे युद्घ करता है या स्वयं दूसरे राजा के सामने हथियार डाल देता है या स्वयं अपने देश की स्वतंत्रता को दूसरे राजा के चरणों में न्यौछावर कर देता है या ऐसा कोई भी कार्य करता है जिससे दूसरे राजा को पराजित देश के राजा के लोगों पर अत्याचार करने का अवसर मिले तो ऐसा राजा कायर की श्रेणी में आता है। पर यदि राजा विवेकशीलता के साथ पूर्ण धैर्य बरतते हुए अपनी सूझबूझ से विजयी राजा को तात्कालिक परिस्थितियों में प्रसन्न कर अपने देश की प्रजा की रक्षा करने-कराने में सफल हो जाता है और समय आने पर अपने देश को पुन: सम्मान के साथ ऊपर उठा लेता है तो वह राजा पराजित होकर भी प्रशंसनीय होता है। इसीलिए मनु महाराज कहते हैं :-
सहसर्वा:समुत्पन्ना: प्रसमीक्ष्या पदो भृश्ग्म्।
संयुक्तांश वियुक्तांश्च सर्वोपायान्सृजेद् बुध:।।
।। 214।।
अर्थात सब प्रकार की आपत्तियां तीव्र रूप में और एक साथ उपस्थित हुई देखकर अर्थात अपने आपको चारों ओर से आपत्तियों में घिरा देखकर बुद्घिमान राजा सम्मिलित रूप से और पृथक-पृथक रूप से अर्थात जैसे भी उचित समझे सब उपायों को उपयोग में लावे।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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