मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-5

  • 2016-12-14 09:30:11.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-5

गतांक से आगे........
कदाचित इसी प्रक्रिया और प्रयोग को अपनाकर हमारे राजपूत सैनिकोंं ने अपने राष्ट्रनायक राणा संग्रामसिंह के संकेत पर बाबर की तोपों का सामना किया था। इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि हमारे सैनिक योद्घा विद्याहीन न होकर युद्घनीति के नियमों को गहराई से जानते थे, यद्यपि हमें उनके विषय में कुछ ऐसा ही बताया जाता है कि जैसे उनके पास युद्घनीति का कोई विशेष ज्ञान नहीं होता था।
अध्याय 7 के श्लोक संख्या 192 में मनु कहते हैं :-''जो समभूमि में युद्घ करना हो तो रथ, घोड़े और पदातियों से, जो समुद्र में युद्घ करना हो तो नौका और थोड़े जल में हाथियों पर वृक्ष और झाड़ी में बाण तथा स्थल बालू में तलवार और ढाल से युद्घ करें, करावें ।। 192 ।।'' (स.प्र. 162)
हमने प्राचीनता के नाम पर अपनी युद्घनीति को भी पुरानी मानकर छोड़ दिया है। यह माना जा सकता है कि आज के युग में युद्घ मैदानों में नहीं लड़ा जाता, इसलिए कई भारी परिवर्तन युद्घनीति में आ गये हैं, परंतु इसका अभिप्राय यह भी नहीं कि सब कुछ गलत ही है। भारत की व्यूह रचना आज भी कई क्षेत्रों में विश्व का मार्गदर्शन कर सकती है और कर भी रही है। पाठकों की जानकारी के लिए यह बताना भी उचित ही होगा कि प्राचीन भारत में व्यूह रचना आठ प्रकार की होती थी -(1) दण्डव्यूह (2) शकल व्यूह (3) वराह व्यूह (4) मकरव्यूह (5) सूचीव्यूह (6) गरूडव्यूह (7) पद्मव्यूह (8) वत्रव्यूह। इस प्रकार ये 8 प्रकार की व्यूह रचनाएं हैं जिनका उल्लेख महर्षि मनु ने मनुस्मृति में किया है।

सैनिकों का उत्साहवर्धन
महर्षि मनु का कथन है कि शत्रु पर टूट पडऩे के लिए अपने सैनिकों का उत्साहवर्धन कराया जाना आवश्यक है। राष्ट्रनायकों को कभी भी अपने सैनिकों का या अपनी सेना की आलोचना नही करनी चाहिए, प्रत्युत सेना का मनोबल बढ़ाये रखने का प्रयास करते रहना चाहिए। जिससे युद्घ में सैनिक हँसते-हँसते शत्रु का सामना कर सकें ऐसी वाणी का प्रयोग करना चाहिए। युद्घ में शत्रु का मनोबल तोडऩे के लिए सामान्य और शांतिकाल की कई अनैतिकताएं उस समय आपके लिए बचने-बचाने का उपाय बन जाती हैं, जो शांतिकाल में पूर्णत: वर्जित होती हैं, जैसे शांतिकाल में आप किसी का भोजन पानी न तो दूषित-प्रदूषित या विषाक्त कर सकते हैं और ना ही उसे किसी के लिए बंद कर सकते हैं-यही आपकी नैतिकता है, पर युद्घ काल में इसके विपरीत ही आपको करना चाहिए-अर्थात शत्रु का भोजन पानी दूषित प्रदूषित और विषाक्त कर दे, अपने कुएं भर दें, खेतों को आग लगा दें या कुंओं का पानी विषाक्त कर दें, या शत्रुपक्ष की भोजन पानी की आपूत्र्ति को काट दें इत्यादि। ये सब आपके लिए उस समय उचित ही हैं। इसमें कुछ भी दोष नहीं है, क्योंकि आपका शत्रु उस समय आपको मारने के लिए आया है। यदि उस समय आपके शत्रु का उद्देश्य आपका विनाश करना है तो आपका उद्देश्य भी उसे मारना या उसका विनाश करना ही होना चाहिए।

युद्घ में शत्रु राजा के अमात्यों में फूट डालने का उपाय भी अपनाना चाहिए। उसके प्रांतों में यदि कहीं से उपद्रव या उत्पात की बात आ रही है या विद्रोह की तनिक सी भी संभावना आपको दिखाई देती है तो युद्घकाल में आप उस विद्रोही भावना को उकसा दें, इसका आपको लाभ मिलना निश्चित है। दूसरे ऐसे विद्रोही लोगों से आपको अपने शत्रु पक्ष की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं, जिससे आप शत्रु पक्ष को सरलता से पराजित कर सकते हैं। कुल मिलाकर शत्रु से युद्घ करते समय आपको यह प्रयास करना है कि युद्घ को जीतना है। परंतुक यह है कि सारी मर्यादाएं नहीं तोडऩी है-जिनका उल्लेख हम पूर्व में कर चुके हैं।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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