मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-6

  • 2016-12-18 08:30:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-6

गतांक से आगे........
राजा के विजयोपरांत कत्र्तव्य
तुर्कों, मुगलों और अंग्रेजों ने भारत में युद्घ जीतने के पश्चात भयंकर नरसंहार किये, उनके द्वारा आयोजित इन नरसंहारों में इतने अत्याचार जनसाधारण पर किये गये कि उन्हें देखकर या सुनकर मानवता भी कांप उठी। परंतु मनु अपने विजयी राजा को ऐसा कोई अनाचार, अत्याचार या पापाचार करने की सलाह न देकर कुछ दूसरी ही बात कह रहे हैं। वह कहते हैं :-
जित्वा सम्पूजयेद् देवान्ब्राह्मणांश्चैव धार्मिकान।
प्रदद्यात्परिहारांश्च ख्यापयेदभयानि च।। 201।।
विजय प्राप्त करके जो धर्माचरण वाले विद्वान ब्राह्मण हों उनको ही सत्कृत करे अर्थात उनको अभिवादन करके उनका आशीर्वाद लें और जिन प्रजाजनों को युद्घ में हानि हुई है उन्हें क्षति पूत्र्ति के लिए सहायता दें तथा सब प्रकार के अभयों की घोषणा करा दे कि प्रजाओं को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं दिया जाएगा, अत: वे सब प्रकार से भय-आशंका रहित रहें।
ये है भारत की महान परंपरा। इसे विश्व आज भी अपना ले तो बहुत कुछ लाभ हो सकता है, पराजित राजा के भी विद्वानों से आशीर्वाद लेना बहुत बड़ी बात है। मनु की इसी आज्ञा का पालन करते हुए लंका विजय के बाद रामचंद्रजी ने स्वयं रावण के पास जाकर उससे आशीर्वाद लिया था। यद्यपि रामचंद्र जी राजनीति के स्वयं भी ज्ञाता थे, परंतु इसके उपरांत भी उन्होंने रावण की विद्वत्ता को नमन किया। ऐसा करके उन्होंने रावण के विषय में शेष विश्व को यह संदेश दिया था कि मेरा युद्घ रावण की आसुरी वृत्ति से था, जिसका विनाश करना मेरा कत्र्तव्य था, रावण की सुरी प्रवृत्तियों से मेरा कोई द्वेष नहीं था, वे तो उस समय भी जितनी वंदनीय थीं उतनी ही उसकी पराजय के इन क्षणों में भी वंदनीय हंै। कहने का अभिप्राय है कि पराजय आसुरी प्रवृत्तियों की होती है-सुरी प्रवृत्तियों की नहीं, क्योंकि वे तो युद्घ से पूर्व भी दुष्ट व्यक्ति को प्रेरित करती हैं कि तू गलत कर रहा है। दुष्टता को मिटाकर दिव्यता को नमन करने की भारत की यह परंपरा सचमुच सराहनीय है।
आधुनिक और प्रगतिशील कहे जाने वाले संप्रदायों के लोगों ने युद्घ में कभी पराजित पक्ष के विद्वानों का सम्मान नहीं किया इसके विरूद्घ उन्होंने नालंदा और उसके विद्वानों का विनाश ही किया है। जिसका परिणाम यह निकला कि संपूर्ण विश्व ही ज्ञान विज्ञान में बहुत पिछड़ गया। विशेषत: नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों का तो अकथनीय हृास हुआ है।

हारे हुए राजा से शपथ पत्र लेना
शपथ पत्र लेने की बात भी संपूर्ण विश्व को भारत ने ही दी है। शपथ पथ पर हस्ताक्षर करने के बाद लोग अपने वचन का पालन करते थे। प्रतिज्ञा भंग करना एक अपराध था। भारत तो वह देश है जिसमें वचन का भी दान किया जाता था और फिर उसे आजीवन निभाया जाता था। आज भी हम इसे वाग्दान संस्कार (सगाई) के नाम से जानते हैं और करते भी हैं। वाग्दान इतना पवित्र होता था कि इसे भंग करने की कोई संभावना ही नहीं थी। इसलिए विवाह भंग की भी कोई संभावना भारत में नहीं थी। अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में ही यह संभव था कि विवाह विच्छेद हो। मनु इसी प्रकार का वचन पराजित राजा से लेने की बात कहते हैं, जिसमें पुन: युद्घ जैसी विनाशकारी स्थिति का सामना न करना पड़े। उनका आदेश है -
सर्वेषांतु विदित्वैषां समासेन चिकीर्षितम्।
स्थापयेतत्र तदंश्यं कुर्याच्च समयक्रियाम्।। 202 ।।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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