मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-4

  • 2016-09-23 07:00:15.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-4

पश्चिम ने उजाड़ दिया समाज को
पश्चिम के चिंतन की यह सबसे बड़ी भूल रही है कि उसने राष्ट्र और समाज के कोई अधिकार नही माने। जबकि जैसे व्यक्ति के अपने मौलिक अधिकार होते हैं वैसे ही सामाजिक संगठनों के भी अपने कुछ अधिकार होते हैं, तब यह भी स्वाभाविक है कि राष्ट्र और समाज के भी अपने कुछ मौलिक अधिकार होने चाहिए। पश्चिम के विद्वान इस मूलभूत सत्य को समझने में चूक कर गये, जिससे उनका चिंतन या तो अधूरा रहा या दोषपूर्ण रहा, फलस्वरूप पश्चिमी जगत ने इन दोनों संस्थाओं को अधिकारविहीन कर उजाडक़र रख दिया है। यह वास्तव में पश्चिम की सोच मनुष्य को स्वेच्छाचारी और निरंकुश बनाती है, जिसके चलते वह नही चाहता कि समाज उसके कार्यों में कहीं आड़े आए या उसे किसी भी प्रकार से रोकने या टोकने की शक्ति प्राप्त करे। यही कारण है कि पश्चिम का सामाजिक जीवन उजड़ गया है और लोगों की ईसाइयत के प्रति रूचि कम होती जा रही है। क्योंकि ईसाइयत एक स्वस्थ सामाजिक परिवेश उन्हें देने में असफल सिद्घ हो चुकी है। स्वस्थ्य सामाजिक परिवेश से हमारा तात्पर्य आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने वाले समाज से है।

भारतीय जीवन प्रणाली का मूलाधार-यज्ञ
भारतीय जीवन प्रणाली आदर्श राज्य प्रणाली से संचालित रही है और यज्ञ उसका मूलाधार है। इसलिए प्रत्येक कार्य को या प्रत्येक संस्कार को बड़ी पवित्रता से और एक दूसरे की सहायता के उद्देश्य से करने की परंपरा हमारी रही है। अब वैदिक विवाह संस्कार को ही लें। भारत में नारी की स्थिति पर बार-बार प्रश्न उठाने वालों की आंखें खोलने के लिए एक ही उदाहरण पर्याप्त है। विवाह संस्कार में पति एकांत में जाकर पत्नी के केशों का मोचन करता है। इस समय वर कहता है-''प्रेतो मुञ्चामि नामुत:।'' अर्थात मैं तुझे पितृकुल से छुड़ा रहा हूं। परंतु मैं कोई भी ऐसा कारण उपस्थित न होने दूंगा जिससे तुझे अपना पतिकुल भी छोडऩा पड़े-अर्थात मैं किसी भी स्थिति में तुझे तलाक नही दूंगा। इसके विपरीत मेरा सतत प्रयास होगा कि- 'सुबद्घा ममुतस्तकरम्' तू पतिकुल में स्नेहरज्जु से अच्छी प्रकार बंधी रह सके।

क्या आदर्श उदाहरण है-पति अपने जीवन को पति के लिए यज्ञोमयी बना रहा है और पत्नी उसमें एक आहुति बनकर स्वेच्छा से पड़ रही है। फिर जैसे यज्ञकुण्ड में जाकर अग्नि (गृहस्थरूपी संसार) में सामग्री और घृत सब एक हो जाते हैं और वे विश्व के कल्याण का हेतु बनते हैं, वैसे ही पति-पत्नी गृहस्थरूपी मृत्यु में अपने आप को प्रजा (संतान) के हितार्थ समर्पित कर रहे हैं। उनके ब्रह्मचर्य की साधना आज तक भी समाज के लिए थी कि उन्होंने कुंआरे रहते हुए कोई बुराई समाज में नही फैलाई और आज के बाद के जीवन की साधना भी संसार के लिए या समाज के लिए ही रहेगी क्योंकि वे समाज को, श्रेष्ठ गुण संपन्न संतति उत्पन्न करके देंगे और एक दूसरे पर कोई अत्याचार नही करेंगे। पर स्मरण रहे कि ऐसी व्यवस्था तभी संभव होती है, जब राजा ब्रह्मचर्य की साधना करता है, राजा स्वयं ऊंचे चरित्र का होता है, उसकी कथनी-करनी में साम्यता होती है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि भारत की अनेकों आदर्श सामाजिक परंपराओं का भी सीधा संबंध राज्य प्रणाली से है। यही कारण है कि चाहे मनु हों चाहे उनके सदृश हमारे अन्य ऋषि हों सभी ने राष्ट्रधर्म की पवित्रता पर विशेष बल दिया है, और समाज व राष्ट्र के भी कुछ अधिकार चिन्हित किये हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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