मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-3

  • 2016-09-22 06:30:20.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-3

राकेश कुमार आर्य
(6) तप :- इसका अभिप्राय तितिक्षा या तपस्या से है। महाराणा प्रताप चित्तौड़ के लिए जंगलों की खान छानते रहे, शिवाजी औरंगजेब की जेल से निकल भागे, बंदा वीर वैरागी ने असीम यातनाएं सहीं, रानी कर्णावती, रानी पदमिनी, रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई ने अपने-अपने समय में विदेशी सत्ता की असीम यातनाएं सहीं। इन्हीं का अनुकरण कोतवाल धनसिंह, मंगल पांडे, श्यामजी कृष्ण वर्मा, वीर सावरकर, रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद इत्यादि ने किया। देश की आजादी के लिए इन महान क्रांतिकारियों ने जो ये असीम कष्ट उठाये वे सब उनकी तपस्या का एक अंग थे। देश सदा ही क्रांतिकारियों के तप की अपेक्षा करता है। क्योंकि देश क्रांतिकारियों के तप से ही आगे बढ़ा करता है। 'क्रांतिकारियों' का अभिप्राय ऐसे लोगों से है जो व्यवस्था में जंग नही लगने देते हैं, और नित्यप्रति व्यवस्था की गाड़ी की नियमित साफ-सफाई करते रहते हैं, अथवा उसके लिए सदा सजग रहते हैं। ये लोग नाना प्रकार के विघ्नों का सफलतापूर्वक सामना किया करते हैं, हर प्रकार के सुख-दुख को, भूख प्यास को, सर्दी गरमी को ये लोग सहते हैं और सारे राष्ट्र के लिए एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। देश के लोग इनके तप से प्रेरणा लेते हैं और अपने-अपने स्तर पर देश के लिए कुछ करने का प्रयास करते रहते हैं। इससे राष्ट्र सबल होता है। हर व्यक्ति को अपने विकास के समान अवसर उपलब्ध होते हैं।

(7) ब्रह्म :-ब्रह्म का अर्थ 'ब्रह्मचर्य' तथा आत्म ज्ञान से है। प्राचीनकाल में भारत की राजनीति में 'ब्रह्मचर्य' शब्द को सर्वाधिक आवश्यक माना जाता था। परंतु वर्तमान काल में विश्व के किसी भी देश के संविधान में भूल से भी इस शब्द को कहीं स्थान नही दिया गया है। 'ब्रह्मचर्य' की तप रूपी भट्टी में पड़ा 'राजा' सारे देशवासियों की प्रेरणा का स्रोत होता है, वह जितना ही उच्च चरित्र का स्रोत होता है, वह जितना ही उच्च चरित्र का होता है-राष्ट्र उतना ही सबल होता है। विश्व के कितने ही देशों का पतन युद्घ के मैदान में केवल 'राजाओं' के चारित्रिक पतन के कारण हुआ है। भारत ने भी इस दंश को झेला है, यदि पृथ्वीराज चौहान जैसे शूरमा क्षत्रिय 'संयोगिताओं' के डोले चुराने में अपनी शक्ति का अपव्यय नही करते तो इस देश का इतिहास ही कुछ और होता। इसीलिए वेद राष्ट्र के निर्माण के लिए ब्रह्म की बात कहता है।

वेदानंद तीर्थ जी महाराज कहते हैं-''ब्रह्मचर्य पालन राजा के लिए भी कत्र्तव्य है। यथा-''ब्रह्मचय्र्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति'' (अथर्व. 11/5/17) अर्थात 'ब्रह्मचर्य' रूपी तप से राजा राष्ट्र की विशेष रक्षा करता है। राष्ट्र संवर्धक लोग आस्तिक हों, नास्तिक लम्पट प्रथम तो सफलता ही प्राप्त नहीं करते, यदि सफल हो भी जायें तो उनकी वह सफलता चिरस्थायिनी नहीं हो सकती। आस्तिकता तथा सदाचार से आत्मज्ञान=अपनी शक्ति का ज्ञान होता है। कार्यसिद्घि के लिए अपेक्षित शक्ति तथा साधनों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। जो अपने बल, सामथ्र्य का प्रमाण जाने बिना किसी गुरूत्तर कार्य में प्रवृत्त होता है, वह बहुधा असफल होता है। उसके मनोरथ मनोरथ ही रह जाते हैं। अत: ब्रह्म अपनी शक्ति का ज्ञान भी राष्ट्र रक्षा के लिए अत्यंत प्रयोजनीय है।''

(8) यज्ञ :- यज्ञ इस सृष्टि की नाभि है और वैदिक संस्कृति का मूलस्रोत है। यज्ञ के बिना तो वैदिक संस्कृति की कल्पना भी नही की जा सकती। यज्ञ का अभिप्राय केवल घी-सामग्री फूंकना ही नहीं है, अपितु प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य ही यज्ञ है, अर्थात श्रेष्ठ कार्य करते जाने में अपनी रूचि बढ़ाना और स्वयं को संसार की सेवा के लिए समर्पित किये रखना ही यज्ञमयी जीवन को अपना लेना है। किसी भी देश के नागरिक सुसभ्य और सुसंस्कृति तभी बन पाते हैं जब वे एक दूसरे के कप्रति विनम्र और सौम्य स्वभाव वाले होते हैं। विनम्रता और सौम्यता में बनावट नहीं होनी चाहिए, इसमें वास्तविकता होनी चाहिए। यदि विनम्रता और सौम्यता में बनावट है तो फिर उनसे सबका भला नही हो सकता। संसार में आज चाहे वैदिक यज्ञ का प्रचलन कितना ही सिमट गया हो, परंतु इसके उपरांत भी संसार के जितने भर की श्रेष्ठकार्य नित्यप्रति संपन्न होते हैं वे सबके सब वैदिक संस्कृति की याज्ञिक परंपरा के ही प्रतीक हैं। इसी प्रकार संसार के जितने भर भी शालीन, मर्यादित और विनम्र लोग हैं, वे सब भी आर्य-संस्कृति के ही संवाहक हैं। उनका मजहब भिन्न हो सकता है, उनका देश भिन्न हो सकता है, उनकी वेशभूषा भिन्न हो सकती है, परंतु उनका संस्कार भिन्न नहीं है, और यह संस्कार परस्पर जोड़ता है उनकी सारी भिन्नताओं को मिटा देता है और उन्हें एक मंच पर ला देता है। तब वे सारे बोल पड़ते हैं-संपूर्ण वसुधा ही हमारा परिवार है। इसको यज्ञीय परंपरा की पराकाष्ठा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी।

महर्षि मनु वेद के इसी आदर्श को लेकर आगे बढ़े और उनकी मनुस्मृति का यदि सार निकाला जाए तो उनकी इच्छा वैदिक राष्ट्र के उपरोक्त सिद्घांतों के अनुसार राष्ट्र निर्माण करने वाली राज्यव्यवस्था को देश में लागू करने की थी। जिस समय मनु महाराज हुए उस समय वैसे भी विभिन्न मत मतांतरों का प्राबल्य नहीं था, उस समय समाज के भले लोगों को तंग करने वाले कुछ बुरे लोग सिर उठा रहे थे। वेद का उपरोक्त मंत्र इन बुरे लोगों का राष्ट्रीयकरण या सामाजीकरण करने का उपाय बता रहा है, जिसमें वह राजा और प्रजा की मर्यादा का निर्धारण कर रहा है।

हमारा मानना है कि जैसे व्यक्ति के मौलिक अधिकार आज के संविधान प्रदान करते हैं और उन्हें प्रदान करते ही स्वयं को लोकतांत्रिक घोषित कर देते हैं उसी प्रकार एक लोकतांत्रिक देश में राष्ट्र के भी कुछ मौलिक अधिकार होते हैं। जिन्हें आज के विश्व में प्रचलित संविधानों ने तो अपने पृष्ठों पर कोई स्थान दिया नहीं है, परंतु वेद ने उपरोक्त मंत्र को अपने पृष्ठों पर स्थान देकर इसे एक प्रकार से 'राष्ट्र के मौलिक अधिकार' घोषित कर दिया है। सचमुच हमारा वेद का संविधान विश्व के लिए अद्भुत है। विश्व चाहे इसे ना अपनाये पर इसने अपना निरालापन सिद्घ अवश्य कर दिया है। किसी भी राजनीतिक चिंतक या मनीषी या विद्वान ने वेद के इस मंत्र को 'राष्ट्र के मौलिक अधिकार' के रूप में अपने चिंतन में यदि स्थान दिया होता तो वर्तमान में विश्व जिस दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है उसे प्राप्त न हुआ होता। राष्ट्र के मौलिक अधिकार के समाज के भी मौलिक अधिकार है।

राष्ट्र और समाज दोनों मिलकर इस मंत्र में मानो अपने निवासियों या नागरिकों से कुछ अपेक्षाएं कर रहे हैं, कि तुम्हें राष्ट्र और समाज की मर्यादा को बनाये रखने के लिए कैसी मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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