मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-2

  • 2016-09-21 12:30:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और वेद का राष्ट्र धर्म, भाग-2


राकेश कुमार आर्य
वेद में कहा गया है कि-''सत्येनोत्तभिताभूमि: (अथर्व. 14/1/1) अर्थात यह भूमि सत्य के सहारे टिकी है।'' सत्य का अर्थ है-ईश्वरीय व्यवस्था के अटल और विज्ञान संगत नियम। जैसे पृथ्वी घूमती है। उसके घूमने की भी दो गतियां हैं-(1) परिक्रमण और (2) परिभ्रमण । यदि ये नियम अर्थात सत्य भंग हो जाए तो यह पृथिवी समाप्त हो जाएगी। राष्ट्र इसी भूमि को धरती माता=भारत माता को, कहा गया है, और यह राष्ट्र जिस सत्य पर आधृत है, उस सत्य का उपासक हर देशवासी को होना चाहिए। क्योंकि सत्य की उपासना का यह सुंदर सुयोग इस राष्ट्र ने ही हमारे लिए उपलब्ध कराया है। हमारे कार्य व्यवहार में ईश्वरीय दिव्य गुणों का भास आभास एक अहसास के रूप में हर सांस में होना चाहिए। इसी बात के दृष्टिगत महर्षि मनु ने कहा है-'नास्ति सत्यात्परो धर्म:' अर्थात सत्य से बढक़र कोई धर्म नही है। इसी लिए देश के हर नागरिक को सत्य ज्ञान सत्य विद्या और सत्य नियमों का उपासक होना चाहिए।
(2) बृहत् :- इसका अभिप्राय है-महत्वाकांक्षा या बड़प्पन। जब देश अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था तब देश के भीतर ही कुछ ऐसे भी लोग थे जो देश की स्वतंत्रता के लिए काम न करके अंग्रेजों की चाटुकारिता करने में लगे थे या स्वतंत्रता के दीर्घकालीन समर में कुछ ऐसे राजा भी रहे जो देश की स्वतंत्रता के लिए काम न करके अपने राज्य की स्वतंत्रता की चिंता कर रहे थे। ये दोनों ही प्रकार के लोग या राजा अपने क्षुद्र चिंतन और क्षुद्रबुद्घि के कारण देश के लिए उस समय एक कलंक ही थे। इसका कारण यह था कि इन लोगों के या इन राजाओं के भाव उच्च नही थे। इनके विचारों में बड़प्पन नही था। जबकि भावों की पवित्रता या उज्ज्वलता ही तो व्यक्ति को महान या महत्वाकांक्षी बनाती है। यही कारण है कि वैदिक संस्कृति में भावों की उज्ज्वलता को बड़ी प्रमुखता प्रदान की गयी है। वेद के इस मंत्र की विशेषता यही है कि यह हमारे राष्ट्रीय संस्कारों की प्रस्तुति करता है। जिसे कोई भी राष्ट्र अपनाकर महान बन सकता है।
(3) ऋतम् :- ऋतम् भी प्रकृति के अटल नियमों को ही कहते हैं। न्याययुक्त व्यवहार या नियमपालन करने में व्यक्ति को प्रकृति के नियमों की भांति अटल और अविचल रहना चाहिए। हमने विदेशों में जितनी भर भी क्रांतियां होते देखी हैं-उनमें स्वदेशी लोगों ने ही निजबंधु बांधवों का ही रक्त बहाया है और इस प्रकार की रक्तिम क्रांतियों से किसी कथित स्वतंत्रता की प्राप्ति की है। परंतु भारत में ऐसी किसी रक्तिम क्रांति के किये जाने का इतिहास नही है। यहां विदेशी शासकों ने हमारी स्वतंत्रता के अपहरण के लिए तो अनेकों नरसंहार किये हैं, परंतु हमने कभी परस्पर खूनी क्रांतियां नही कीं। इतना ही नही हमने मुगल शासकों और अंग्रेज शासकों के बीवी बच्चों का भी नरसंहार कभी नही किया। यद्यपि ऐसे अवसर हमें कितनी ही बार मिले। हमारा यह व्यवहार ऋतानुकूल था, जैसे प्रकृति दुष्टों का ही संहार करती है और अपने धर्म से भ्रष्ट नही होती, वैसे ही मनुष्यों को भी चाहिए कि वे न्याययुक्त व्यवहार करें। कई लोग सार्वजनिक अथवा राजनीतिक आंदोलन के समय सार्वजनिक संपत्ति को आग लगाने लगते हैं या किसी भी प्रकार से कोई ऐसा कार्य कर बैठते हैं जो अराजकता को बढ़ावा देता है, यह सब गलत है। देशहित और जनहित का तकाजा यही होता है कि हम हर स्थिति परिस्थिति में संतुलन बनाकर रखें। ऐसी सोच ही राष्ट्र को आगे बढ़ाती है।
(4) उग्रम् :- हमारे क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों ने ऋतानुकूल आचरण करते हुए अर्थात कोई भी ऐसा कार्य न करते हुए भी जिससे कि नरसंहार को बढ़ावा मिले, अपनी तेजस्विता अर्थात उग्रता का अनेकों अवसरों पर परिचय दिया।
उग्रता को हमारे देश में जब उग्रवाद से जोडक़र देखा जाता है तो यह बहुत ही बुरी सी जान पडऩे लगती है। पर यदि हम उग्रता की दो धाराओं सात्विक और तामसिक उग्रता पर विचार करें तो पता चलता है कि तामसिक उग्रता को ही हमने वास्तविक उग्रवाद मान लिया। तामसिक उग्रता में व्यक्ति पागल होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सारे विधि-विधानों को तोड़ता है, और अमर्यादित आचरण करते हुए जनसाधारण को कष्ट पहुंचाता है। जबकि सात्विक उग्रता में व्यक्ति जनसाधारण के भले के लिए उन दुष्ट शक्तियों से संघर्ष करता है जो जनसाधारण के अधिकारों का हनन कर चुकी होती है। इस उग्रता को हमारे महान ऋषियों ने और वेद ने तेजस्विता का नाम दिया है। इस प्रकार की तेजस्विता से राष्ट्र की रक्षा होती है। अत: इस प्रकार की तेजस्विता का बना रहना सदा ही आवश्यक और अनिवार्य माना गया है। इस प्रकार की तेजस्विता राष्ट्र के नागरिकों में देशभक्ति का उच्चभाव भरती है, और लोगों के भीतर व्याप गयी प्रत्येक प्रकार की भीरूता या कायरता को चुन-चुनकर दूर करती है। ऐसी तेजस्विता एक तेजस्वी राष्ट्र का निर्माण करती है। इसी तेजस्विता की कामना इस वेदमंत्र में की गयी है।
(5) दीक्षा :-दृढ़ संकल्प का नाम दीक्षा है। किसी को दीक्षा देना, दीक्षित करना या दक्ष कर देने का अभिप्राय है कि उसे दृढ़ संकल्पित कर दिया गया है। उसे जो कुछ पढ़ाया-समझाया या बताया गया है उसके प्रति उसके हृदय में यह दृढ़ संकल्प उत्पन्न कर देना कि इससे अलग कुछ भी सत्य नही है या अब तुम सत्य विद्या में निष्णात हो गये हो, अब किसी प्रकार की भ्रांति या संदेह करने की आवश्यकता नही रह गयी है। निशंक होकर आगे बढ़ो।
ऐसा निशंक व्यक्ति पूर्ण मनोयोग से किसी एक कार्य के प्रति संकल्पित हो जाता है और यह सच है कि जहां पूर्ण मनोयोग आ जुड़ता है, वहां सफलता सदा असंदिग्ध हो जाती है। हमारे ऋषियों ने तो राष्ट्र के कल्याण की इच्छा से प्रेरित होकर ही राज्य की कल्पना की थी। उन्हें अपने संकल्प में अथवा अपनी योजना के क्रियान्वयन में कोई संदेह शेष नही था। इसलिए उन्होंने दीक्षित होकर अर्थात सत्य संकल्पित होकर राज्य की स्थापना की और राष्ट्र के रथ को आगे बढ़ाया। इस प्रकार दीक्षा का अर्थ है राष्ट्रवासियों के कल्याण के लिए दृढ़संकल्पित होकर योजनाएं बनाना और उन योजनाओं को पूर्ण मनोयोग से लागू करने के लिए क्रियाशील हो उठना। आनन्द प्राप्ति के रहस्य को जानने वाले ज्ञानीजन कल्याण की कामना से पहले तप और दीक्षा का सेवन करते हैं। इसी तप और दीक्षा से ये लोग आगे बढ़ते हैं।
क्रमश: