मनु और राजकाज, भाग-दो

  • 2016-09-26 12:30:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और राजकाज, भाग-दो

इस श्लोक में 'बलिम्' शब्द भी ध्यातव्य है। यह 'बलिवैश्व देव यज्ञ' की ओर हमारा ध्यान दिलाता है। जिसमें प्रत्येक सदगृहस्थी को अपने भोजन का कुछ अंश संसार के अन्य प्राणियों-पशु-पक्षियों के लिए स्वेच्छा से निकालना अनिवार्य होता है। भारत के लोग इस कार्य को बड़ी श्रद्घा से करते हैं, वे ऐसा सोचते हैं कि ऐसा करने से उन्होंने बहुत बड़ा पुण्य-कार्य कर दिया है। इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द 'बलिम्' भी यही संकेत कर रहा है कि राज्य व्यवस्था के संचालन के लिए देश के लोग कर को अपने ऊपर भार ना मानें, अपितु उसे एक पवित्र कार्य मानें, पुण्य मानें, राष्ट्रहित में किया जाने वाला एक यज्ञ समझें। देश में ऐसे पवित्र कार्य को पूर्ण करने के लिए आप्तपुरूषों का सहारा लिया जाए। ये आप्त पुरूष निश्चय ही वे लोग हैं जो कि भ्रष्टाचार मुक्त होते हैं और लोभ-लालच जिन्हें छू भी न गया हो। इनका उद्देश्य देश, समाज और मानवता का कल्याण करना होता है।


जिस राष्ट्र में कर को 'बलिम्' मानने वाले श्रेष्ठ नागरिक हों, तथा उस कर को वसूलने वाले आप्तपुरूष हों, उस राज्य में निश्चय ही विकास कार्यों पर ध्यान दिया जाएगा और हर व्यक्ति सुखानुभूति करेगा। 'सबका धन-सबका विकास' करने में व्यय होगा तो देश में आर्थिक समृद्घि स्वयं ही आ जाएगी। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ भी यही है कि 'सबका धन सबके विकास' में खर्च हो।

कर्मचारियों का निरीक्षण करने की परंपरा
आजकल विभागों में उच्चाधिकारी लोग अपने कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करते हैं। कभी इस कार्य को राजा स्वयं किया करता था या अपने किन्हीं विश्वस्त सभासदों या मंत्रियों के माध्यम से संपन्न कराया करता था। भारत की यह परंपरा आज भी टूटे-फूटे प्रचलन के साथ समस्त विश्व के सभी लोकतांत्रिक देशों में एक समान अपनायी जाती है। भारत में मुस्लिम काल में इस परंपरा का रूप विकृत हुआ तो अंग्रेजों ने इसे अपने अधिकारियों के माध्यम से कराया जाना आरंभ किया। परंतु हमारे देश में ऐसा माना गया है कि जैसे इस परंपरा को इस देश में अंग्रेजों ने आरंभ किया है। वैसे भारत में अंग्रेजों ने इस परंपरा को इसलिए अपनाया कि उनको देश के कई स्थानों का भौगोलिक ज्ञान नही था। दूसरे, उन्हें भाषा की समस्या आड़े आती थी, तीसरे उन्होंने अपने अधिकतर कार्य 'सत्ता के दलालों' के माध्यम से कराने आरंभ किये थे। एक प्रकार से किसी भी कार्य की निविदा सी छोड़ दी जाती थी कि हमें तो यह कार्य आप लोग इतने धन की एवज में करके दे दो, आगे आपने कितना कमाना है ये आप जानो। ऐसी परिस्थितियों में अंग्रेजों के उच्चाधिकारियों ने कर्मचारियों के निरीक्षण के कार्य को भी भ्रष्टाचार का माध्यम बना लिया। उच्चाधिकारी अधीनस्थ भारतीय अधिकारियों या कर्मियों के कार्य में कमी निकालते या पैसे लेकर कमियों को रफा-दफा कर देते थे। हम देखते हैं कि हमारे देश में अंग्रेजों द्वारा स्थापित भ्रष्टाचार की जननी यही परंपरा आज भी चल रही है। निरीक्षण कार्य को उच्चाधिकारी कमाई का माध्यम बना लेते हैं। अधिकतर तो ऐसा होता है कि निरीक्षण को केवल खानापूर्ति के लिए ही किया जाता है। सारे कार्य और कमियों की पूत्र्ति ले देकर पहले ही पूर्ण कर दी जाती है। इस प्रकार कर्मचारियों का निरीक्षण आजकल एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

हम कह रहे थे किकर्मचारियों के कार्य का निरीक्षण करने की परंपरा विश्व को भारत की देन है तो इस विषय में मनुस्मृति का प्रमाण है कि :-
अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात्तत्र
तत्र विपश्चियत:।
ते अस्य सर्वाण्य वेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ।। 81।। (62)
अर्थात '' राजा अनेक मेधावी, प्रतिभाशाली, योग्य विद्वान अध्यक्षों को आवश्यकतानुसार विभिन्न विभागों में नियुक्त करे वे विभागाध्यक्ष इस राजा के द्वारा नियुक्त अन्य सब अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मचारी लोगों का निरीक्षण किया करे।''

''इस राज्य कार्य में विविध प्रकार के अध्यक्षों को सभा नियत करे। इनका यही काम है-जितने जिस-जिस काम के राजपुरूष होवें नियमानुसार वत्र्तकर यथावत कार्य करते हैं वा नही। जो यथावत करे तो उनका सत्कार और जो विरूद्घ करें तो उनको यथावत दण्ड दिया करे।'' (स.प्र. 150)

धर्म और अर्थ की स्थापना के लिए निरीक्षण
कर्मचारियों में अपने कार्यों के प्रति शिथिलता का या आलस्य अथवा प्रमाद का भाव ना आ जाए, इसलिए उनका निरीक्षण आवश्यक माना गया। दूसरी बात ये है कि प्राचीनकाल से हमारे देश में राजनीति को धर्म और अर्थ का समन्वय बनाकर चलने की परंपरा रही है।

धर्म और अर्थ की शुचिता को बनाये रखना हर राजकीय कर्मचारी का पवित्र कत्र्तव्य है, यदि उसमें लापरवाही बरती गयी तो अनर्थ हो जाएगा। धर्म और अर्थ की इस शुचिता को बनाये रखने की बात विदुर जी जानते थे उनसे धृतराष्ट्र कहते हैं :-
जागृतो दहयमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि।
तद्ब्रहू त्वं हिनस्तात् धर्मार्थ कुशलो हयसि ।। 11 ।। (विनीत)

''हे भाई! (विदुर) मुझ जागते हुए और चिंता से व्याकुल का जिस बात में कल्याण हो वह मुझे बताओ। क्योंकि हम सब में तुम ही धर्म और अर्थ=राजनीति का प्रवचन करने में कुशल हो।''
अत: धर्म और अर्थ की शुचिता के अनुसार राज्य कार्य चल रहे होते थे तो माना जाता था कि राष्ट्रनीति (राजनीति) सफलता पूर्वक कार्य कर रही है और यदि ऐसा नही है तो राजनीति में कहीं दोष माना जाता था। अत: अपने राष्ट्रधर्म का पालन करते हुए राजा स्वयं कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करे। इस निरीक्षण से एक साथ दो बातों का पता चलता था एक तो सरकारी नीतियों का विधिवत विस्तार हो रहा है या नही, दूसरे सरकारी नीतियों से जनसाधारण को कोई लाभ मिल रहा है या नही, यह भी पता चल जाता था। कुल मिलाकर कर्मचारियों के निरीक्षण का उद्देश्य पवित्र ही कहा जाएगा।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.