मनु और राजकाज, भाग-एक

  • 2016-09-24 12:30:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और राजकाज, भाग-एक

महर्षि मनु राजा के विवाह योग्य कन्या के विषय में बताते हुए कहते हैं-
तदध्यास्योद्वहेदभार्या सवर्णां लक्षणान्विताम्।
कुले महति संभूतां हृद्यां
रूप गुणान्विताम् ।। 77।। (58)

इस श्लोक का अर्थ है-''ब्रह्मचर्य से विद्या पढक़े यहां तक राज करके पश्चात सौंदर्यरूप गुणयुक्त हृदय को अति प्रिय बड़े उत्तम कुल में उत्पन्न सुंदर लक्षणयुक्त अपने क्षत्रिय कुल की कन्या जो कि अपने सदृश विद्यादि गुणकर्म स्वभाव में हो उस एक ही स्त्री के साथ विवाह करे। दूसरी सब स्त्रियों को अगम्य समझकर दृष्टि से भी न देखे।'' (स.प्र. 149)
यह राजा की मर्यादा है कि वह एक विवाह ही करे। इस एक विवाह की आज्ञा वेद ने दी है। वहां 'चक्रवाकेव दम्पती' (अथर्व. 14/2/64) = अर्थात पति पत्नी दोनों चकवा-चकवी की भांति परस्पर प्रीति करने वाले हों। यहां तुम दोनों (पति-पत्नी) कहा गया है, यदि बहुत सी पत्नियों को रखने की अनुमति वेद देता तो ऐसा कदापि नही कहता। ऋग्वेद ( 10/05/42) में भी दंपति को यही शिक्षा दी गयी है कि तुम दोनों (एक साथ अपने परिवार में) यहां ही रहो, अर्थात कभी भी वियुक्त न होओ। वेद की इसी आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए महर्षि मनु ने व्यवस्था दी है-
सन्तुष्टो भार्यया भत्र्ता भत्र्रा भार्या तथैव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणे तत्र वै धु्रवम्।। यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्। अप्रमोदात्पनु: पुंस: प्रजनं न प्रवत्र्तते।। (मनु. 3/60-61)
कहने का अभिप्राय है कि-''जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छी प्रकार संतुष्ट रहती है उस कुल में सौभाग्य और ऐश्वर्य अवश्य निवास करता है। यदि स्त्री पति से प्रीति नही करती और पुरूष को प्रसन्न नही करती, तो पुरूष का संतान-जननकार्य नही चल सकता। इसीलिए वेद भी पति पत्नी के जोड़े में असीम प्रेम होने की बात कहकर उनकी उपमा चकवा चकवी से देता है।''
वेद के एक पति और एक पत्नी का आदर्श समाज में तभी स्थापित रह सकता है जब उस कार्य को देश का राजा अपनाये। क्योंकि देश की राजा अपने राजा का अनुकरण करती है। यही कारण है कि सामाजिक आदर्श की रक्षा के लिए 'राजा' की मर्यादा को कठोरता से स्थापित किया गया है। तभी तो महर्षि मनु उन्हें एक ही विवाह करने का स्पष्ट और सीधा संदेश दे रहे हैं कि एक ही स्त्री के साथ विवाह करे।
यज्ञादि कराने वाला हो राजा
राजा के लिए अगली मर्यादा स्थापित करते हुए मनु महाराज कहते हैं कि-
पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चात्र्विज:।
ते अस्य गृहयाणि कर्माणि कुर्युर्वैता निकानि च।।
।। 78 ।। (59)
''पुरोहित और ऋत्विक का स्वीकार इसलिए करे कि वे अग्निहोत्र तथा पक्षेष्टि आदि सब राजघर के कर्मों को करें और सर्वदा राजकार्य में तत्पर रहें।''
(स.प्र. 149)
इस श्लोक में पुरोहित या ऋत्विक का वरण करने का निर्देश राजा को दिया गया है, जिससे कि राजा अपने राज्य में बड़े-बड़े यज्ञों का आयोजन करा सके। ये यज्ञ राजा अपनी प्रजा के कल्याण के लिए कराये। प्राणिमात्र पर ईश्वरीय कृपा निरंतर बनी रहे अर्थात वर्षा आदि होते रहें, जिनसे धन-धान्य की कमी प्राणियों के लिए न आने पावें। यज्ञादि करने कराने से एक और लाभ यह होता है कि इनसे बुद्घि दोषों का शमन होता है, बुद्घि पवित्र होती है और विद्वान लोगों की संगति मिलने से आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
अगले श्लोक में कहा गया है:
यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्त दक्षिणै:।
धर्मार्थ चैव विप्रेभ्यो दद्या दभोगान्धनानि च।।
।। 79 ।। (60)
अर्थात ''राजा बहुत दक्षिणा वाले अनेक यज्ञों को किया करे तथा धर्म के लिए विद्वान ब्राह्मणों को भोग्य वस्तुओं एवं धनों का दान करे।''
ब्राह्मणों को दान देने की बात सुनकर बहुत से लोगों को ऐसा लगता है कि जैसे मनुस्मृति ब्राह्मणवादी सोच को बढ़ावा देने वाला ऐसा ग्रंथ है जो किसी जाति विशेष को प्रोत्साहित करती है। इसीलिए ब्राह्मणों को दान देने की बात मनु कह रहे हैं। हम पूर्व में भी कह आये हैं कि ब्राह्मण कोई जाति नही है, अपितु विद्वानों को संबोधित करने वाला एक शब्द है। विद्वानों को दान दक्षिणा देकर प्रसन्न रखना प्रत्येक सभ्य समाज का पुनीत दायित्व है। क्योंकि विद्वान यदि प्रसन्न रहेंगे तो देश में विद्या, शिक्षादि का प्रसार भली प्रकार हो सकेगा, और यदि विद्या शिक्षादि का प्रसार होगा तो नये-नये आविष्कारों, अनुसंधानों और शोधादि का मार्ग प्रशस्त होगा। ब्राह्मणों को दान देना इसीलिए उत्तम है कि ऐसा करने से सर्वत्र ज्ञान की, विज्ञान की श्रेष्ठ और उत्तमोत्तम चर्चाएं होती रहती है, जिससे समाज का नैतिक स्तर ऊंचा रहता है।

समाज के नैतिक स्तर को ऊंचा रखने के लिए ही मनु प्रतिपादित राज्य प्रणाली में ब्राह्मणों=श्रेष्ठ विद्वानों का सारा भार राजकोष पर रहता था। परंतु इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि एक ब्राह्मणों का ही ध्यान उस समय रखा जाता था, अन्य लोगों का नहीं। जैसे जिसके कार्य थे, वर्ण थे और जैसी उन वर्णस्थ लोगों के लिए आवश्यकताएं थीं, उनके अनुसार राजा उनका ध्यान रखना भी अपना राष्ट्रधर्म मानता था।

सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहार येद्बलिम्।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेते पितृवन्नृषु ।। 80 ।। (61)
अर्थात ''वार्षिक कर आप्त पुरूषों (अपने विषय में पूर्णत: व्याप्त अर्थात व्यापक और प्रत्यक्ष ज्ञान रखने वाले धार्मिक व्यक्ति को आप्त कहते हैं) के द्वारा ग्रहण करे और जो सभापति रूप राजा आदि प्रधान पुरूष है वे सब सभा वेदानुकूल होकर प्रजा के साथ पिता के समान वर्ते।'' (प.प्र. 150)

इसमें स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी वर्ग विशेष के साथ कोई विशेष अनुग्रह या कृपा दृष्टि राजा को नही दिखानी है, अपितु उसे सभी वर्णस्थ लोगों के प्रति पितृवत व्यवहार करना है। पिता को परिवार का विष्णु (भरण पोषण कत्र्ता) कहा जाता है। इसी प्रकार राजा भी लोक का अर्थात अपने राज्य का भरण-पोषण कत्र्ता है।

अत: दोनों के कर्म में समानता है, इसीलिए राजा को 'पितृवत' व्यवहार अपनी प्रजा के साथ करने की सलाह दी गयी है। यह सलाह उसके लिए एक मर्यादा है, जिसे उसे अपनाना ही है। किसी भी पिता से यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वह अपने पुत्रों में भेद करेगा।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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