मनु और राजकाज, भाग-चार

  • 2016-09-28 08:00:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और राजकाज, भाग-चार

ऐसे स्वयंसेवियों का सम्मान किया ही जाना चाहिए जो लोगों को सदा एक और नेक बने रहने के लिए प्रेरित करते हों, समाज की विसंगतियों से लड़ते हों, और समाज में कहीं भी गलत कार्य ना हो-इसके लिए सदैव प्रयासरत रहते हों। ऐसे लोगों के लिए ही मनु कहते हैं :-
आवृत्तानां गुरूकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत्।
नृपाणामक्षयो हयेष निधिर्बा हमोअभिधीयते।।
।। 82 ।। (63)

अर्थात ''सदा जो राजाओं को वेद प्रचारक रूप अक्षयकोष है, इसके प्रचार के लिए कोई यथावत ब्रह्मचर्य से वेदादि शास्त्रों को प$ढक़र गुरूकुल से आवे, उसका सत्कार, राजा और सभा यथावत करें, तथा उनका भी जिनके पढ़ाये हुए विद्वान होवें। इस बात के करने से राज्य में विद्या की उन्नति होकर अत्यंत उन्नति होती है।'' (स.प्र. 150)

ज्ञान और ज्ञानियों को यहां 'पदमश्री' देने की बात मनु नही कह रहे हैं। ये 'पदमश्री' तो आजकल लोग सिफारिशें कराके ले रहे हैं, पी.एच.डी. झूठे शोधपत्रों पर लोग ले रहे हैं, जिससे पदमश्री या पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त लोग एक अनावश्यक अहंकार में रहने लगते हैं और आम आदमी से अपने आपको अलग, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ और वरिष्ठ दिखाने का प्रयास करते हैं। उनका अहंकार उन्हें अन्य लोगों से दूर करता है, जबकि शिक्षा का उद्देश्य विनम्रता, शालीनता और दूसरों के प्रति सहयोगी व सहृदयी होने के गुणों का विकास करना है। यदि व्यक्ति पढ़ लिखकर भी आत्मकेन्द्रित होकर रह जाए और अपने ही संसार में व्यस्त और मस्त रहने लगे तो भी काम नही चलता। काम तो तभी चलता है जब व्यक्ति व्यक्ति के काम आए, व्यक्ति व्यक्ति के दुख-दर्द को समझे, उसमें सम्मिलित हो और उन्हें सरल करने में या उनका समाधान देने में अपना सहयोग दे। जो लोग शिक्षा के बोझ में सडऩे लगते हैं और किसी दम्भ में या किसीपुकार के अहंकार में रहने लगते हैं उनसे समाज और भी अधिक विकृत और प्रदूषित होता चला जाता है। जिससे समाज में ऊंचनीच की भावना बढ़ती है।

मनु ऐसी सामाजिक विसंगतियों को बढ़ाने वाली किसी व्यवस्था के समर्थक नही हैं वह तो प्रत्येक स्नातक को समान रूप से सम्मानित करने की बहुत ऊंची बात कह रहे हैं। वह कह रहे हैं कि प्रतिभा सम्मान में कैसी सिफारिश? कैसी चाटुकारिता? 'सबको ज्ञान दो-सबको सम्मान दो-सबको अधिमान दो और सबको स्वाभिमान दो'-मनु का यह आदर्श है। मनु की इस व्यवस्था में स्नातक किसी के स्वाभिमान को चोट पहुंचाना नही चाहता, इसके विपरीत हर व्यक्ति के और हर नागरिक के स्वाभिमान का रक्षक बनकर बाहर आता है। शिक्षा का यही उद्देश्य है कि वह सबके सम्मान की रक्षा करने वाली हो। जिनका सम्मान लोग नही कर रहे हैं-स्नातक से अपेक्षा है कि वह वैसे लोगों को भी इस बात के लिए प्रेरित करें कि ईश्वर की सृष्टि में सभी समान हैं इसलिए सबको समान समझना और सबका सम्मान करना मनुष्य मात्र के जीवन का उद्देश्य है।

स्नातक का सम्मान राजा और सभा दोनों करें, उसे ऐसे रूप में देखें कि ये आने वाले कल में समाज का नायक, पथ प्रदर्शक होगा। मनु की यह व्यवस्था भी बहुत ही अनुकरणीय है। जहां पात्रों का सम्मान होता है और योग्यता को नमस्कार किया जाता है वहीं सुख-शांति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है। जहां पर अपूज्यनीय अर्थात अयोग्य व्यक्तियों को सम्मानित किया जाने लगता है, अर्थात किसी भी प्रकार से प्रतिभा और योग्यता की उपेक्षा होने लगती है-वहां अकाल, मृत्यु और भय का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। क्योंकि योग्य अथवा अपूज्यनीय लोग सम्मान पाकर अभिमान में फूल जाते हैं और वे अपनी उस अवस्था में निर्बल लोगों पर अत्याचार करने लगते हैं, अथवा उनके अधिकारों का शोषण करने लगते हैं। ऐसे जीवन को मनु इस व्यवस्था में अशोभनीय और समाज के लिए अमान्य घोषित कर रहे हैं।

मनु इसी श्लोक में एक और पते की बात कह गये हैं कि राजा न केवल स्नातकों का सम्मान करे, अपितु ऐसे स्नातकों का निर्माण करने वाले उनके आचार्यों का भी सम्मान करे। आजकल हम देख रहे हैं कि 'गुरू गुड़ रह जाता है और चेला चीनी हो जाते हैं'-अर्थात चेला किसी भी प्रकार से जुगाड़ लगाकर या कहीं से भी किसी प्रकार की सिफारिश आदि लगाकर ऊंचा पद प्राप्त कर जाते हैं, उनके पास सुख, सुविधाएं और समृद्घि की वर्षात होने लगती है, जबकि गुरूजी फटे हाल रह जाते हैं। इसका कारण यही है कि आज की व्यवस्था चेला को तो सम्मान दे रही है परंतु उसके निर्माता का ध्यान नही कर रही। यह इस व्यवस्था का दोष है। हम मानते हैं कि चेला का सम्मान होना चाहिए, परंतु व्यावहारिक और अच्छी बात यही होगी कि जिस गुरू ने उसका निर्माण किया है राष्ट्र या समाज पर उस शिष्य से अधिक उसके गुरू का ऋण है। अत: गुरू के ऋण से उऋण होने के लिए मनु ने यह व्यवस्था दी कि जब शिष्य का सम्मान किया जाए तो उसको इस ऊंचाई तक पहुंचाने वाले उसके गुरू का भी सम्मान होना चाहिए। इससे गुरू को आत्मसंतोष की अनुभूति होती है, साथ ही वह देश और समाज के लिए और भी प्रतिभाएं तराशने का कार्य पूर्ण मनोयोग से
करने का प्रयत्न करेगा। इसका अंतिम लाभ समाज और राष्ट्र को ही मिलेगा।

मनु की बात का आशय स्पष्ट है कि गुरू प्रथम पूज्यनीय है। ऐसा ना हो कि 'पदमश्री' तो चेला ले आये और गुरू देखता ही रह जाए। क्योंकि उसके पास बड़ी सिफारिशें नही थीं और वह किसी की चाटुकारिता नही कर पाया था। जो लोग 'पदमश्री' किसी सिफारिश से प्राप्त कर रहे हैं वे गुरू के प्रति श्रद्घावान नही हो सकते। हां, वे गुरू के प्रति अभिमानी अवश्य हो सकते हैं। वे गुरू को बता सकते हैं कि-देखिए! हम आपसे कितने आगे निकल गये हैं, आप कहते थे ना कि तू कुछ नही कर पाएगा? पर देखिये मैंने क्या कर दिखाया है? सचमुच वही, जिसे आप नही कर पाये।' जहां ऐसा अभिमान शिष्य को हो जाता है वहां विद्या का प्रकाश बाधित हो जाता है। इसीलिए मनु ने इस श्लोक में यह व्यवस्था कर दी है कि शिष्य के साथ-साथ गुरू का सम्मान भी किया जाना उचित और सार्थक होता है। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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