मनु और राजकाज, भाग-तीन

  • 2016-09-27 10:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

मनु और राजकाज, भाग-तीन

राकेश कुमार आर्य
कौटिल्य के अनुसार विभागाध्यक्ष
भारतवर्ष में कई लोगों ने यह भ्रांति फैलाने का कार्य भी किया है कि भारत में प्रशासनिक विभागों का कार्य विभाजन या निर्माण अंग्रेजों ने प्रचलित किया। पर वास्तव में ऐसा नही है। 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' से हमें विभिन्न विभागों के विषय में जानकारी मिलती है। ये विभाग और उनके अध्यक्ष इस प्रकार हैं-(1) सेनाध्यक्ष=संपूर्ण सेनाओं का निरीक्षक (2) कोषाध्यक्ष=खजाने का अध्यक्ष (3) अकराध्यक्ष=खानों का अध्यक्ष (4) अक्षपटलाध्यक्ष= आय-व्यय का महानिरीक्षक (5) कोष्ठगाराध्यक्ष=कोठरी, (6) आयुधगाराध्यक्ष (7) पण्याध्यक्ष=बाजार का नियंत्रक अधिकारी (8) कुप्याध्यक्ष=वन की वस्तुओं का अध्यक्ष (9) स्वर्णाध्यक्ष=सोने चांदी का अध्यक्ष (10) लोहाध्यक्ष=लोहा आदि वस्तुओं का अध्यक्ष (11) सीताध्यक्ष=कृषि विभाग या करके रूप में एकत्रित धान्य का अध्यक्ष (12) शुल्काध्यक्ष=चुंगी का अधिकारी (13) पौतवाध्यक्ष=तोलमाप का नियंत्रक अधिकारी (14) मानाध्यक्ष=देशकाल के मानों का नियंत्रक (15) सूत्राध्यक्ष=वस्त्र या सूत व्यवसाय का अध्यक्ष (16) सूनाध्यक्ष-वधस्थान का अधिकारी (17) नगराध्यक्ष=नगर का प्रमुख अधिकारी (18) नावध्यक्ष=नौका परिवहन का अधिकारी (19) गोअध्यक्ष=गौ आदि पशुओं का व्यवस्थापक अधिकारी (20) अश्वाध्यक्ष= अश्वशाला का अधिकारी (21) हस्तिअध्यक्ष= हस्तिशाला का अधिकारी (22) रथाध्यक्ष=रथ सेना का अधिकारी (23) पत्यध्यक्ष=पैदल सेना का अधिकारी (24)मुद्राध्यक्ष=देश की मुद्रा का व्यवस्थापक अधिकारी (25) विविताध्यक्ष= चरगाह की भूमि का अधिकारी (26) लवणाध्यक्ष=देश की टकसाल का अधिकारी (27) धर्माध्यक्ष=धर्मनिर्णायक अधिकारी।

भाषा परिवर्तन से उत्पन्न हुई भ्रांति
मुगलकाल में प्रशासन की भाषा अरबी, फारसी, तथा अंग्रेजी काल में प्रशासन की भाषा अंग्रेजी बना दी गयी। जिससे हिंदी और संस्कृत की घोर उपेक्षा आरंभ हो गयी। फलस्वरूप प्रशासन के अधिकारियों के उपरोक्त पद नाम व अन्य प्रशासनिक शब्दावली हमसे छूटती चली गयी। इन सारे अधिकारियों या विभागाध्यक्षों के नाम आज हमें विदेशी भाषा अंग्रेजी में मिलते हैं और हम उनकी हिंदी करने का प्रयास भी नही करते, या उनकी हिंदी पता भी होती है तो उसे बोलने का प्रयास नही करते। हमें कलेक्टर या डीएम कहना अच्छा लगता है पर उसे जिलाधिकारी नही कह सकते। जो लोग यह मानते हैं कि शब्दों को बोलना ही तो है, किसी भी भाषा में बोल दीजिए क्या फर्क पड़ता है? उन्हें इस बात का पता होना चाहिए कि जब अपनी भाषा छूटती चली जाती है और विदेशी भाषा उसके स्थान पर आ जाती है तो हमारा ज्ञान-विज्ञान भी बाधित, कुंठित, सीमित होता चला जाता है और हम यह मानने लगते हैं कि हमें तो सब कुछ इस विदेशी भाषा ने ही दिया है। इसलिए राज्य व्यवस्था सहित हर क्षेत्र में अपनी भाषा का प्रयोग किया जाना आवश्यक है। समय की आवश्यकता है कि प्रशासन के हर विभाग के अधिकारी या कर्मचारी के पदनाम का हिंदी समानार्थक शब्द खोजकर प्रचलन में लाया जाए। जिससे हम अपने प्राचीन गौरव के साथ तारतम्य स्थापित कर सकें।
राजा के लिए महर्षि मनु यह भी आवश्यक मानते हैं कि वह विद्वानों का सम्मान करने वाला हो।

राजा स्नातकों का सम्मान करे
व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता ज्ञान की प्राप्ति करना है। कहा गया है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन ये तो पशुओं और मानवों में समान रूप से मिलते हैं, परंतु धर्म (जिसके स्थान पर कहीं ज्ञान भी लिखा है।) ही एक ऐसा है जो मनुष्यों के पास अधिक मिलता है। संसार की व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे, इसके लिए आवश्यक है कि हर मनुष्य ज्ञानी हो, विद्यमान हो। ज्ञानी पुरूषों का ज्ञान चूंकि संसार की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने और बनाये रखने में सहायक होता है, इसलिए ज्ञान और ज्ञानी का सम्मान करना हमारी राज्यव्यवस्था का अनिवार्य अंग था। यही कारण है कि केवल भारत में ही ऐसी मान्यता है-'विद्वान सर्वत्र पूज्यते।' अर्थात विद्वान सर्वत्र पूज्यनीय होता है। विद्वान सर्वत्र पूज्यनीय हो, उसकी बातों को सब मानें जानें और समझें। उसकी बातों का अनुकरण करें और समाज में शांति व्यवस्था बनाये रखें, यह बात सब पर समान रूप से लागू होती है। यही विद्वान की पूजा है।

आज घर-घर में कलह है, तकरार है, विवाद है और झगड़े हैं। समाज और राष्ट्र में भी यही स्थिति है। इसका कारण यही है कि हम घर से लेकर राष्ट्र तक ज्ञानियों और विद्वानों का सम्मान करना भूल गये हैं। यह दोष आज की शिक्षा प्रणाली का है-इसके चलते डिग्री धारी लोगों को कोई नही पूछ रहा है। इसका कारण यही है कि यह शिक्षा प्रणाली भौतिकवाद को बढ़ावा दे रही है। इस शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को नौकरी दिलाना माना गया, पर आज शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती भीड़ यह बता रही है कि यह शिक्षा प्रणाली रोजगार देने में भी असफल हो चुकी है। शिक्षा का उद्देश्य (नौकरी पाना) जब प्राप्त नही हो पा रहा है तो किसी भी शिक्षित को वह सम्मान नही मिल रहा है, जो उसे मिलना चाहिए। इसे वर्तमान राज्य व्यवस्था का एक भारी दोष माना जाना चाहिए।

मनु कहते हैं कि राजा स्नातकों का अर्थात विद्वानों का सत्कार करे। स्नातक वह है जो गुरूकुल में रहकर ज्ञान गंगाजल में-स्नान करके निकला हो। गंगाजल स्वयं पवित्र है क्योंकि वह गंधक के पर्वत से होकर निकलता है, गंधक में रोग निवारक क्षमता होती है। इसी प्रकार ज्ञान स्वयं में पवित्र है क्योंकि वह गुरूकुल के आचार्यों और तपस्वी ऋषियों के हृदय स्थल की पवित्र गंगा से निकलता है, जो साधारण लोगों को पापमुक्त कराता है, उन्हें पापकार्यों से बचाता है, जिससे समाज की उन्नत स्थिति बना करती है। यही कारण है कि विद्वान का सर्वत्र सम्मान करना हमारे समाज की अनिवार्य शर्त रही। विद्वान ज्ञानी जन सरकार के या राजा के राज्य में शांति व्यवस्था बनाये रखने वाले स्वयंसेवी होते हैं। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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