राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-3

  • 2016-09-06 09:30:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-3

महर्षि मनु कहते हैं कि-''विनयी अर्थात अनुशासन-मर्यादाओं में रहने के स्वभाव वाला होते हुए भी राजा उन वेदवेत्ता गुरूजनों से प्रतिदिन अनुशासन और मर्यादा की शिक्षा ग्रहण करे, क्योंकि अनुशासन में रहने के स्वभाव वाला राजा कभी विनाश को प्राप्त नही करता।''
कहने का अभिप्राय है कि राजा को वेदवेत्ता विद्वानों से अनुशासन की शिक्षा लेनी चाहिए। वेदवेत्ता विद्वान लोग स्वयं अनुशासित रहते हैं, वे किसी का अहित नही चाहते, इसलिए ऐसे आत्मानुशासित विद्वानों से राजा यदि परामर्श करता है, या शिक्षा ग्रहण करता है तो स्वाभाविक है कि उसके भीतर भी ऐसे ही गुणों का संचार होगा, जिससे उसका राज्य स्थायित्व को प्राप्त करेगा।

चाणक्य भी कुछ ऐसा ही कहते हैं-''विद्यावान और अनुशासन-मर्यादा में रहने वाला तथा प्रजाओं के हित में तत्पर राजा ही संपूर्ण पृथिवी का उपभोग करता है।''
चाणक्य का यह भी कथन है-''इंद्रिय जय का मूल विनय अर्थात अनुशासनबद्घ रहना है। अनुशासन का मूल वृद्घों की संगति और सेवा है, और वृद्घ=पारंगत विद्वानों की संगति का मूल विशिष्ट ज्ञानार्जन करना है।'' वृद्घ का अभिप्राय जीर्णकाय हो जाना नही है। वृद्घ का अभिप्राय है जो किसी प्रकार की वृद्घि को प्राप्त कर लेता है। आयु में वृद्घ तो वयोवृद्घ कहाता है। पर यहां तो चाणक्य केवल वृद्घ की बात कह रहे हैं। जिसका अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो ज्ञानवृद्घ हो, अनुभव वृद्घ हो।
चाणक्य कहते हैं :-
अविनीतस्वामिलाभात् अस्वामिलाभ: श्रेयान्। (चा.सू. 14)
अर्थात ''विनयविहीन=अनुशासन या मर्यादा में न रहने के स्वभाव वाले राजा की प्राप्ति की अपेक्षा राजा का न होना ही श्रेयस्कर है।''

राजा विद्वानों से विद्या प्राप्त करे
राजा की जीवनचर्या पर प्रकाश डालते हुए महर्षि मनु कहते हैं :-
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीति च शाश्वतीम्।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यावात्र्तारम्भांश्च लोकत:।। ।। 43 ।। (28)
''राजा और राजसभा के सभासद तब हो सकते हैं कि जब वे वेदों की कर्म, उपासना, ज्ञान विद्याओं के जानने वालों से तीनों विद्या सनातन दण्डनीति, न्यायविद्या, आत्मविद्या अर्थात परमात्मा के गुण, कर्म, स्वभाव रूप को यथावत जानने रूप ब्रह्मविद्या और लोक से वात्र्ताओं का आरंभ सीखकर सभासद या सभापति हो सकें।'' (सं.प्र. 144)

इस श्लोक में महर्षि मनु के राजा और राजसभा के सभासदों की योग्यता की ओर संकेत किया है कि उन्हें किस प्रकार की विद्या से युक्त होना चाहिए? इस पर चिंतन करते हुए महर्षि मनु स्पष्ट करते हैं कि राजा को त्रयी विद्या (ज्ञान, कर्म और उपासना) से युक्त होना चाहिए। इतना ही नही उसे सनातन दण्डनीति, न्यायविद्या (बिना किसी रागद्वेष के न्याय करने में तत्पर) आत्मविद्या (मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? कहां जा रहा हूं? मुझे कहां पहुंचना है? और मैं कर क्या रहा हूं?) से युक्त होना चाहिए। इसके साथ ही उसे परमात्मा के न्यायकारी स्वरूप का यथावत ज्ञान होना चाहिए। यह मुमुक्ष के लिए आवश्यक है कि वह ब्रह्मविद्या का ज्ञाता हो। अगली योग्यता है कि एक राजा या सभासद को वात्र्ताओं का विनयपूर्वक आरंभ भी सीखना चाहिए।

ऐसे गुणों से युक्त हमारा राजा और हमारे सभासद कभी भी अन्याय नही कर सकते। ना ही कभी किसी के साथ अत्याचार कर सकते हैं। जब हम बार-बार न्यायशील राजा और सभासदों की बात करते हैं तो हमारे कुछ भाइयों को कष्ट होता है और वे पूछ लेते हैं कि आप किस ऐसे राजा की बात कर रहे हैं-जो न्यायशील था, या सदाचारी और जितेन्द्रिय था? उनके प्रश्न को सुनकर मैं सोचा करता हूं कि इनका प्रश्न इनके अनुसार उचित ही है। क्योंकि इन्हें प्रचलित इतिहास में जितना पढ़ाया गया है वह सब अत्याचारी शासकों, या राजाओं के विषय में ही तो पढ़ाया गया है। ऐसे प्रश्नकत्र्ताओं को अपने देश के लगभग दो अरब वर्ष पुराने इतिहास पर अनुसंधान करना चाहिए। आर्यावत्र्तीय काल में इस समस्त भूमंडल पर ऐसे अनेकों आर्य राजा हो गये हैं, जिन्होंने बहुत काल तक प्रजा वत्सल भाव से लोगों की रक्षा की। इस दीर्घकाल पर मैं प्रकाश तो नही डाल सकता, पर मैं यह अवश्य मानता हूं कि इस भूमंडल पर एक से बढक़र एक विद्वान और एक से बढक़र एक महायोद्घा हो गये हैं। हम जिस इतिहास को पढ़ रहे हैं वह हमारे विषय में और स्वयं मानवता के विषय में मान लो कि कुछ भी नही बताता। जो कुछ भी बताता है वह न केवल अपूर्ण है अपितु हमें साम्प्रदायिक आधार पर परस्पर लड़ाने वाला है। उस अपूर्ण और परस्पर लड़ाने वाले इतिहास को पढक़र हम सब परस्पर लडऩे को तत्पर रहते हैं। इतने पूर्वाग्रही हो गये हैं कि सत्य को मानने को भी तैयार नही होते। ऐसे बंधुओं से हमारा विनम्र निवेदन है कि तथ्यों को तथ्य रूप में जानकर सत्य रूप में स्वीकारें। हम अन्य संप्रदायों के साथ तो एकता बनाने की बात करते हैं पर हिंदू समाज मेें विखण्डन को बढ़ावा देते रहते हैं। इसलिए मनु के नाम पर जिन लोगों ने मनुस्मृति से छेड़छाड़ कर इसमें वेद-विरूद्घ बातों को भरा उन्हें पकड़-पकडक़र तथ्य और प्रमाण रूप में पेश करते रहते हैं कि देखो इसमें गंदगी ये रही,.....ये रही।

मैं कहता हूं कि 'गंदगी' का निवारण कर जो कुछ मानवता के अनुकूल है और युगानुकूल है उसे ही धारण कर लो पर केवल गाली देने का ही काम जारी रखना छोड़ दो। सुधार की बात करने से पूर्व स्वयं सुधरना पड़ता है। जिन लोगों को भारत के प्राचीन साहित्य में केवल गंदगी ही दिखाई देती है उन्होंने भारत की हर प्राचीन गौरवमयी परंपरा का भी 'ब्राह्मणवादीकरण' कर दिया है। इससे जातिगत द्वेष भावना देश में बढ़ रही है। इसकी परिणति कहां होगी? सोचकर भी डर लगता है? इसलिए समय की आवश्यकता है कि हम अपने सनातन धर्म के सनातन मूल्यों को अपनाने की बात करें, उनको पहचानें और सही रूप में अपनायें। कथित ब्राह्मणवादी सोच के लोगों पर भी यह बात उतनी ही लागू होती है जितनी मनु की व्यवस्था के आलोचकों पर लागू होती है।

आर्य समाज ने मनु को समझने और समझाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया और जिस वर्ग ने हमारे प्राचीन साहित्य में वेद विरूद्घ बातें कहीं प्रक्षिप्त कीं या हमारे महापुरूषों के आप्त जीवन को किसी भी प्रकार से कलंकित करने का प्रयास किया, उसकी पोल खोली। आज हमें विज्ञान के युग में बिना किसी पर कटाक्ष किये अच्छी और वैज्ञानिक बातों को मानने-जानने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ऐसा प्रयास मनुस्मृति को लेकर आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट की ओर से किया गया है। जिन्होंने 'विशुद्घ मनुस्मृति' को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। मैं उसी को आधार बनाकर प्रस्तुत लेखमाला आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूं। इस मनुस्मृति का सातवां अध्याय राजधर्म से संबंधित है। यही राजधर्म हमारे आपके लिए आज विवेचनीय है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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