राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-6

  • 2016-09-09 09:30:53.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-6

राकेश कुमार आर्य
महर्षि मनु ने (कामज और क्रोधज) अन्य व्यसनों को क्रम से इस प्रकार घातक माना है :-
दण्डस्य पातनं चैव वाक्यारूष्यार्थदूषणे।
क्रोधजेअपिगणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा।।
।। 50 ।। (36)
''और क्रोधजों में बिना अपराध दण्ड देना, कठोर वचन बोलना और धन आदि का अन्याय में खर्च करना (एतत त्रिकं सदा कष्टं) ये तीन क्रोध से उत्पन्न हुए बड़े दुखदायक कष्ट हैं।'' (स.प्र. 145)
इससे अगले श्लोक में महर्षि मनु कहते हैं:-''इस सात प्रकार के दुर्गुणों के वर्ग में जो सब स्थानों पर सब मनुष्यों में पाये जाते हैं आत्मा की उन्नति चाहने वाला राजा पहले पहले व्यसन को अधिक कष्टप्रद समझे।''
महर्षि दयानंद इस श्लोक की व्याख्या करते हुए सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं-''जो ये सात दुर्गुण दोनों कामज और क्रोधज दोषों में गिने जाते हैं, इनमें से पूर्व पूर्व अर्थात व्यर्थ व्यय से कठोर वचन, कठोर वचन से अन्याय से दण्ड देना इससे मृगया खेलना, इससे स्त्रियों का अत्यंत संग इससे जुआ खेलना अर्थात द्यूत करना और इससे भी मद्यादि सेवन करना बड़ा दुष्ट व्यसन है।'' (स.प्र. 145)

मनु कहते हैं कि-ये व्यसन व्यक्ति को जीते जी अपयश दिलाते हैं। इनको अपनाने वाले व्यक्ति की जीते जी कई बार मृत्यु होती है। जिससे लोक में व्यक्ति की अपकीत्र्ति होती है। यह अपकीत्र्ति ही जीवित व्यक्ति की मृत्यु है। हमारे सामने ही कितने ही राजनीतिज्ञ देश विदेश में उठे, आगे बढ़े और थोड़ी दूर चल कर वैसे ही फुस्स हो गये जैसे दीपावली का कोई पटाखा फुस्स हो जाता है। कितनों को ही दारू खा गयी, कितनों को ही भ्रष्टाचार मसल गया, कितनों को ही 'सैक्स स्कैंण्डल' ले डूबा और कितनों को ही उनका बिगडै़ल गुस्सा पतन के गर्त में ले गया। हमने कितने ही राजनीतिज्ञों को अर्श से फर्श पर आते देखा है, इसका कारण यही रहा कि वह अपने वैभव को संभाल नही पाए। उनकी साधना में कमी रही और साधन दूषित हो गये। साधना और साधन का मेल न होने के कारण उनका बना बनाया खेल बिगड़ गया। जो लोग अपनी उन्नति के दिनों में जमीन से जुडक़र नही रह पाते, या जिन्हें अहंकार सताने लगता है, या घमंड के कारण जो लोगों से सीधे मुंह बात करना बंद कर देते हैं, या जो राजनीतिज्ञ सत्ता के मद में चूर होकर अपने ही लोगों की उपेक्षा करने लगता है, या उन्हें किसी प्रकार से दुखी करने लगता है, उसका पतन हो जाता है, यह पतन ही ऐसे राजनीतिज्ञ की अपयश रूपी मृत्यु है।

आश्चर्य की बात है कि विश्व में नित्यप्रति राजनीतिज्ञों की ऐसी मौतें हो रही हैं, पर इसके उपरांत भी सब इन मौतों की ओर से आंखें बंद किये बैठे हैं। खतरा को जानबूझकर अनदेखा कर रहे हैं। सत्ता के मद में चूर होकर जो लोग भूल जाते हैं कि यदि कुछ गलत करोगे तो उसका परिणाम भी भोगना ही पड़ेगा, और परिणाम भोगा जाएगा तो कोई बचाने वाला भी नही मिलेगा। क्यों नही ये लोग अपना राजधर्म (राजनीतिक आचार संहिता) घोषित करते हैं? समय रहते ही इस ओर हमारे राजनीतिज्ञों को सोचना चाहिए। लगता है ये लोग अपना नाश तो करेंगे ही साथ ही विश्व की नैया को भी लेकर डूबेंगे।
मनु कहते हैं :-
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसन कष्टुच्यते।
व्यसन्यधोअधो व्रजति स्वर्यात्य व्यसनी मृत:।। ।। 53।। (38)

अर्थात ''व्यसन और मृत्यु में व्यसन को ही अधिक कष्टदायक माना गया है, क्योंकि व्यसनों में फंसा रहने वाला व्यक्ति दिन प्रतिदिन दुर्गुणों और कष्टों में गिरता ही जाता है, या अवन्नति को ही प्राप्त होता जाता है, किंतु व्यसन से रहित व्यक्ति मरकर भी स्वर्ग को प्राप्त करता है, अर्थात उसे परजन्य में सुख मिलता है।''

कहने का अभिप्राय है कि राजनीतिज्ञों को अपने आपको व्यसन मुक्त करने के लिए अपनी आचार संहिता की घोषणा अवश्य करनी चाहिए। उनके व्यसन मुक्त होने से देश व्यसन मुक्त होता है और उनके व्यसनी होने से देश व्यसनी होता जाता है।
इस रहस्य को हमारे देश के राजनीतिज्ञ जितना शीघ्र समझ लेंगे उतना ही मनु हमारे लिए प्रासंगिक हो जाएंगे।

मनु को लेकर इस समय देश में कई लोगों की धारणा ऐसी बन चुकी है कि वे मनु के नाम तक से घृणा करते हैं। दुख की बात यह है कि ऐसी घृणा करने वाले लोग मनु को पढऩा और समझना तक नही चाहते, यह पूर्वाग्रह समाज में जातिवाद की घृणास्पद सोच को बढ़ा रहा है। वैसे इस सोच के मूल में जाएं तो वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था भी कम दोषी नही है, जिसने समाज के एक वर्ग को अपमानित और उपेक्षित कराने की हरसंभव चेष्टा की और उसे मनुष्य के मौलिक अधिकारों तक से वंचित कर दिया। आज ऐसे लोग प्रतिशोध की भावना के वशीभूत होकर तथाकथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोधी होते-होते मनु के विरोधी हो गये हैं। ऐसे भाईयों से हमारा विनम्र अनुरोध है कि वह मनु को समझें, मनुवाद को समझें और उसकी व्यवस्था के अनुसार उन लोगों को जीने के लिए बाध्य और प्रेरित करें जिन्होंने मनु पर केवल अपना अधिकार जताकर मनु को एक पक्षीय बना दिया। मनु जैसे विश्व मानव के साथ हुआ यह अन्याय मानवता के साथ किया गया अन्याय है। यदि मनु को हम समझेंगे तो पता चलेगा कि मनु की व्यवस्था में मनुष्य मनुष्य के बीच कहीं कोई अंतर नही है, कोई दुर्भाव नही है और कोई भेद नही है। मनु के नाम पर जिन लोगों ने मनुष्य मनुष्य के बीच कोई अंतर, दुर्भाव या भेद उत्पन्न करने का प्रयास किया है आज उन्हें पहचानने की आवश्यकता है। पर इसके उपरांत भी यह ध्यान रखना होगा कि हमें राष्ट्र निर्माण करने के लिए प्रतिशोध की भावना से काम न लेकर 'शोध और बोध' की भावना को अपनाना होगा। 'शोध और बोध' के माध्यम से ही हम आगे बढ़ सकते हैं।

हम इस लेखमाला को किसी की भावना को चोट पहुंचाने के लिए नही लिख रहे हैं अपितु हम आगे कैसे बढ़ें और राष्ट्र निर्माण कैसे हो, इस उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए यह लेखमाला लिखी जा रही है। कृपया इसे पाठकगण इसी भावना से लें, तो मैं अपने प्रयास को सार्थक और सफल समझूंगा।