राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या

  • 2016-09-05 07:30:33.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या

हमारे देश में राजा को प्रजावत्सल माना गया है, यदि राजा के भीतर प्रजावत्सलता का भाव नही है तो ऐसा राजा राजा होकर भी राजा नही होता। हमारे ऋषियों ने चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र माने हैं। समाज की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाये रखने के लिए इस वर्णव्यवस्था से उत्तम कोई व्यवस्था विश्व आज तक नही खोज सका है। यह अलग बात है कि कालांतर में यह व्यवस्था देश में जाति-व्यवस्था में परिवर्तित हो गयी, जिससे वर्तमान में कई प्रकार की सामाजिक विसंगतियों (जातीय द्वेषभाव, जाति आधारित आरक्षण) आदि ने जन्म ले लिया है। अब आवश्यकता तो इन सामाजिक विसंगतियों को मिटाकर मनु की कर्म आधारित वर्णव्यवस्था को अपनाते हुए जातिविहीन व वर्गविहीन समाज की स्थापना करने की है। पर हम देख रहे हैं कि जातिवाद के लिए मनु को कोसने में जो लोग लगे हैं, वही जातिवादी आरक्षण को बनाये रखने के समर्थक हैं। ऐसे महानुभावों को ठंडे दिमाग से सोचने की आवश्यकता है कि यदि मनु वर्तमान जातिवादी व्यवस्था के लिए दोषी हैं, और आप वास्तव में इस जातिवादी व्यवस्था को सामाजिक समरसता के लिए घातक मानते हैं, तो जातिवादी आरक्षण के लफड़े में पड़े बिना जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की संरचना का कोई उपाय क्यों नही खोजते? मानव को द्वेषभाव से और मानवता को सर्वोपयोगी बनाना बुद्घिजीवियों का प्रथम कत्र्तव्य होता है जिसे उन्हें पहचानना चाहिए। यदि हमारे बुद्घिजीवी भाई ऐसी कोई व्यवस्था खोजें जो जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की संरचना को बलवती करे, तो हम तो उसे भी 'मनुवादी व्यवस्था' ही कहेंगे, क्योंकि वास्तविक मनुवाद जातिवहीन वर्गविहीन, और संप्रदायविहीन एक मानव समाज की कल्पना को साकार करना है।

वर्णव्यवस्था एक ऐसा सत्य है जो सदा बना रहेगा। मानव के लिए वर्णव्यवस्था उसकी प्रतिभा के विभिन्न कोणों को स्पष्ट करने वाली एक वैज्ञानिक व्यवस्था का नाम है। किसी की भाषा में आप ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को बुला लें, उसका अभिप्राय वही रहेगा जो इन शब्दों का है। जैसे शिक्षक को आप टीचर कह लें, या आलिम या कुछ और वह 'ब्राह्मण' के अर्थ से बाहर नही जा सकता। इसी प्रकार अन्य वर्णों के विषय में समझना अपेक्षित है।

महर्षि मनु ने अपनी वैज्ञानिक वर्णव्यवस्था का संरक्षक राजा को माना है। वह कहते हैं-
''स्वे-स्वे धर्मेनिविष्टानां
सर्वेषामनुपूर्वश:।
वर्णनामश्रमाणां च राजा सृष्टो अभिरक्षिता।।''

कहने का अभिप्राय है कि अपने-अपने धर्मों अर्थात वर्णों में संलग्न क्रमश: सब वर्णों और आश्रमों का राजा को 'सुरक्षा करने वाले के रूप में' बनाया है अर्थात राजा के पद पर आसीन व्यक्ति का कत्र्तव्य है कि वह सर्ववर्णस्थ और आश्रमस्थ व्यक्तियों को उनके धर्मों में प्रवृत्त रखे, अर्थात उन्हें उनके कर्म-कत्र्तव्य कर्मो में लगाये रखे और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्ने करे जिससे उन लोगों का अपने-अपने कत्र्तव्य कर्मों में स्वाभाविक रूप से मन भी लगा रहे।

राजा की जीवन चर्या
महर्षि मनु ने एक आदर्श राजा की जीवन चर्या को भी बड़े अच्छे ढंग से परिभाषित और प्रस्तुत किया है। उसके लिए अपेक्षित है कि वह उत्तम भृत्यों का चयन करे। जिससे उसकी लोकहितकारी नीतियों का लाभ साधारण जनता तक सीधे पहुंचे। भृत्य वर्ग से अभिप्राय उस वर्ग से है जो राजा की ओर से भरण पोषण की अपेक्षा रखने वाले लोगों से बनता है। आजकल जिसे हम 'प्रशासनिक तंत्र' कहते हैं या 'सरकारी अमला' कहकर बुलाते हैं वही पुराने समय में भृत्यवर्ग कहलाता था। इसमें अमात्य, मंत्री, से लेकर सरकार के साधारण सेवक तक आ जाते थे।

अब राजा की जीवनचर्या पर विचार करते हैं जिसके विषय में महर्षि मनु हमें बताते हैं :-
''राजा सवेरे उठकर ऋक, साम, यजु रूपत्रयी विद्या में बढ़े-चढ़े अर्थात पारंगत आचार्य ऋत्विज आदि विद्वान ब्राह्मणों की अभिवादन आदि से सत्कार एवं शिक्षा के लिए संगति करे, और उन शिक्षक विद्वानों के निर्देशन और मर्यादा में अपना जीवन रखे।''

बात साफ है कि राजा को प्रात:काल शीघ्र उठकर ईश भजन कर विद्वानों की संगति प्राप्त करनी चाहिए जिससे कि वह अपने राजकाज के कार्यों में संलिप्त होने से पूर्व पूर्णत: तनावमुक्त हो जाए और यदि पिछले दिन दरबार में उसने किसी कारण क्रोधावेश में या किसी भी कारण से किसी व्यक्ति को कुछ कह दिया है तो उसके प्रति उसके मन में आज कोई पूर्वाग्रह ना रहे, दुर्भाव ना रहे और कलुषता ना रहे, उसकी बुद्घि पूर्णत: निष्पाप और विवेकशील रहे इसके लिए आवश्यक है कि वह प्रात:काल में सुशील, परमधैर्यवान, धर्मज्ञ, नीतिज्ञ और व्यवहार कुशल संपन्न आचार्यों की संगति करे। राजा को प्रात:काल में उठकर पहले संध्या, अग्निहोत्रादि आवश्यक दिनचर्या से निवृत्त होना चाहिए।

कौटिल्य का राजा की जीवन चर्या के विषय में मत है कि वह विद्वान पुरूषों की संगति में रहकर बुद्घि का विकास करे। आचार्यादि गुरूजन और अमात्यवर्ग राजा की मर्यादा को निर्धारित करें। वे ही राजा को गलत कार्यों से रोकते रहें। जैसे आचार्य के निर्देशन में शिष्य, पिता के निर्देशन में पुत्र, स्वामी के निर्देशन में भृत्य चलता है, उसी प्रकार अपने ऋत्विक के निर्देशन में राजा चले।''

मनु के आलोचक इस प्रकार के श्लोकों में 'ब्राह्मणवाद' की गंध खोज सकते हैं। उनका कुतर्क रहता है कि ब्राह्मण ने अपने आपको श्रेष्ठ बनाने के लिए ऐसे श्लोकों की रचना की है। इन बंधुओं को दो बातें समझनी चाहिए कि प्रथम तो ब्राह्मण कोई जाति नही एक वर्ण है, दूसरे ब्राह्मण एक व्यक्ति नही एक संस्था है। हमें वर्ण और संस्था का सम्मान करना चाहिए। विद्वानों की विद्घत्ता को नमन करना चाहिए। इस श्लोक में भी उस ब्राह्मण की चर्चा है जो राजा को गलत कार्यों से रोकने की क्षमता और सामथ्र्य रखता हो। वह 'जी हुजूरी' करने वाला चाटुकार और स्वार्थी ना हो, अपितु प्रात:काल में ही राजा को कल की गलतियों का उल्लेख साहस के साथ उसके सामने करके आज उनकी पुनरावृत्ति करने से रोकने वाला हो। ऐसे श्रेष्ठ सलाहकार और साहसी व्यक्ति का राष्ट्र ऋणी रहता है। क्योंकि उसके युक्तियुक्त परामर्श के कारण राजा किसी प्रकार का अनर्थ नही कर पाता है।

महर्षि मनु का कथन है :-
'वृद्घाश्च नित्यं सेवेत विप्रान्वेदविद:शुचीन।
वृहसेवीहि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते।।'

भावार्थ है कि राजा को शुद्घ हृदय वाले (अर्थात ऐसे व्यक्ति का आदर-सत्कार करना चाहिए जो रागद्वेष से मुक्त हों, और मानवतावाद के हितचिंतक हों) वेद के ज्ञाता=वेदवेत्ता, ज्ञानतपस्या में बढ़े-चढ़े विद्वानों की सेवा करने वाला, राक्षसों द्वारा भी पूजा जाता है। राक्षसों द्वारा पूजा जाने का अभिप्राय है कि ऐसा राजा राक्षसों के साथ भी रागद्वेष से मुक्त होकर ही न्याय करता है। जिससे ऐसे राक्षस लोग उसके न्याय से कंपित रहते हैं उनका कंपित रहकर राजा की राज्यव्यवस्था के अनुकूल चलना ही उनकी राजा की पूजा करना है। राजा के वशीभूत होकर यदि राक्षस लोग अपना कार्य करने वाले हो जाते हैं तो फिर राजा का राज्य सुरक्षित हो जाता है, और वह देर तक निष्कंटक शासन करता है।
ब्राह्मण या वेदवेत्ता विद्वानों के लिए उचित है कि वे राजा को ऐसा परामर्श दें जिससे कि उसका राज्य स्थायित्व को प्राप्त करे और राजा का मर्यादाशील व्यवहार लोक में सर्वत्र अभिनंदनीय माना जाए। राजा को अपेक्षित है कि-
तेभ्योअधिगच्छेद्विनयं विनीतात्मापि नित्यश:।
विनीतात्मा हि नृतपतिर्न विनश्यति कर्हिचित्।। (39)
क्रमश: