कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए, भाग-6

  • 2016-09-17 08:30:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए, भाग-6

राकेश कुमार आर्य
दूत को अपने राजा की सच्ची बात को जो कि कई बार सुननी बड़ी कठिन होती है, दूसरे राजा के सामने इस प्रकार परोसना होता है कि वह बात कह भी दी जाए और उसे बुरी भी ना लगे। इसी को 'राजनय' कहा जाता है। उसकी भाषा इतनी परिष्कृत और दूसरे 'राजा' को अपनी बात मनवाने में सफलता दिलाने वाली हो कि दूसरे देश का शासन प्रमुख कहीं ना कहीं या तो उस दूत से सहमत हो जाए या कहीं ना कहीं दूत के स्वदेश के प्रति विष उगलना बंद कर दे। दूत की इस प्रकार की भाषा को या उसके भाषण को 'कूटनयिक प्रयास' कहा जाता है। इस प्रकार दो देशों के मध्य संवाद बना रहे और शांति स्थापित रहे-इसमें किसी दूत का विशेष महत्व होता है। 'युद्घ' किसी भी समस्या का अंतिम और मूर्खतापूर्ण विनाशकारी उपाय है, और यह तभी होता है जब दूत के राजनयिक और कूटनीतिक प्रयासों को एक पक्ष मानने से इंकार कर देता है, या उन पर पानी फेर देता है। महाभारत के युद्घ आरंभ होने से पूर्व उसे टालने के हरसंभव प्रयास किये गये थे, और ये प्रयास श्रीकृष्ण जी द्वारा अपने स्तर पर भी किये गये थे, इसीलिए वह युधिष्ठिर के दूत बनकर हस्तिनापुर गये थे। 'दूत' का कार्य करना कोई छोटा कार्य नही था-यह दो पक्षों के मध्य होने वाले भीषण युद्घ को टालने का एक गंभीर प्रयास था, जिसे एक 'युगपुरूष' संपन्न कर रहा था, इसीलिए वह 'योगीराज श्री कृष्ण' कहे जाते हैं। उन्हें चूड़ी बेचने वाला कहना या छलिया कहना, सचमुच उनका अपमान है। आगे
महर्षि मनु कहते हैं
:-
अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधि विपर्ययौ ।। 65।। (48)
''अमात्य को दण्डाधिकार, दण्ड में विनय=अनुशासित क्रिया अर्थात जिससे अन्यायपूर्वक दण्ड न होने पावे राजा के अधीनकोश और राष्ट्र तथा सभी के अधीन सब कार्य और दूत के अधीन किसी से मेल वा विरोध करना अधिकार देवे।'' (स.प्र. 148)

इस श्लोक में दो बातें विचारणीय हैं-एक तो इसमें कार्य विभाजन किया गया है, जोकि अनुकरणीय है, दूसरे इसमें 'पुन: अन्यायपूर्वक दण्ड न होने पावे' की बात कही गयी है।
'अन्यायपूर्वक दण्ड न होने पावे' इस कथन की विवेचना में जाना आवश्यक है। कुछ लोगों ने मनु को शूद्र विरोधी माना है और कुछ ने स्वार्थसिद्घि के लिए उन्हें ऐसा बनाया भी है। अब यदि मनु कहीं से भी शूद्र विरोधी होते तो वह बार-बार 'किसी के साथ अन्यायपूर्वक दण्ड न होने पावे ' -ऐसा नही कहते। तब उनका कथन यही होता कि शूद्रों को अधिक से अधिक दण्ड देकर उनका अस्तित्व मिटा दे। पर मनु कहीं भी दण्ड के पात्र व्यक्तियों के लिए शूद्र का प्रयोग नही करते हैं। वह राक्षस या पिशाच या दुष्ट या आततायी लोगों की बात करते हैं, और उन्हीं को दण्ड का पात्र मानते हैं। अब जिन लोगों ने मनु को शूद्र विरोधी माना है या बनाने का प्रयास किया है-उन्होंने मनु की भावना के विपरीत जाकर 'मनुस्मृति' में घालमेल किया है। महर्षि मनु समतामूलक समाज की संरचना करने के समर्थक और व्यवस्थापक थे। उसमें उनका स्पष्ट मत था कि जो व्यक्ति सहयोग कर रहा है, उसको किसी प्रकार का आघात नही लगना चाहिए।

''इस कार्य विभाजन के माध्यम से 'राजा' को राष्ट्र और राष्ट्रीय स्तर के कार्य विभाग सेना तथा कोश=खजाना आदि अपने सीधे नियंत्रण में रखने चाहिए। अमात्यों को दण्ड न्याय आदि का अधिकार सौंप देने तथा दण्डाधिकारियों को अनुशासन बनाये रखने या शिक्षा व्यवस्था आदि का अधिकार सौंपे। दूत के अधीन संधि और विरोध, आदि की नीतियों का निर्धारण होना चाहिए। ये प्रधान अमात्य अपने-अपने विभागों के संचालन करें और राजा से संपर्क रखें। इस प्रकार कार्य सुचारू रूप से संपन्न होता है।''

इस प्रकार के कार्य विभाजन में 'कड़ा अनुशासन और दूरदृष्टि' दिखाई देती है। भारतवर्ष में स्वतंत्रता के उपरांत इस नीति को श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनाने का प्रयास किया था। परंतु उनसे गलती यह हो गयी थी कि उन्होंने देश में आपातकाल लागू कर दिया था, दूसरे उनके अधिकारी और मंत्री कड़ा अनुशासन और दूरदृष्टि का महत्व नही समझ पाये थे। फलस्वरूप उनके इस प्रयास की हवा निकल गयी।

वास्तव में कड़ा अनुशासन और दूरदृष्टि किसी नारे से न आकर व्यक्ति के भाव संसार में उठने वाले संकल्पों से आया करती है और इन संकल्पों में भी सात्विकता तभी आ सकती है जब व्यक्ति में ज्ञान-गाम्भीर्य हो, वह परम-विद्वान और वेदादि सब शास्त्रों का अध्ययन करने वाला हो। सात्विक संकल्पों से राजनीति लोककल्याणकारी और नियत कर्तव्यों के प्रति समर्पणभाव से ओतप्रोत होती है। मनु ऐसी ही राजनीति के पोषक थे। वर्तमान राजनीति ने चाहे कार्य विभाजन के मनु प्रतिपादित सिद्घांत का अनुकरण किया है, पर इसने सात्विकता और विद्वत्ता को अपनाने से दूरी बनाकर रखी है। जिससे वर्तमान राजनीति से लोगों का मोहभंग हो गया सा लगता है।

दूत के कार्य
दूत के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए मनु कहते हैं :-
मनु एव हि सधत्ते भिनत्येव च संहतान्।
दूतस्तत्कुरूते कर्मभिद्यन्ते ये न मानवा ।। 66।। (49)
''दूत ही ऐसा व्यक्ति होता है जो शत्रु और अपने राजा का मेल करा सकता है और मिले हुए शत्रुओं में फूट भी डाल देता है, दूत वह काम कर देता है जिससे शत्रुओं के लोगों में भी फूट पड़ जाती है।''
''दूत उसको कहते हैं जो फूट में मेल और मिले हुए दुष्टों को फोड़, तोड़ देवे, दूत वह कर्म करे जिससे शत्रुओं में फूट पड़े।'' (स.प्र. 148)
आचार्य चाणक्य दूत के कार्यों पर इस प्रकार प्रकाश डालते हैं :-''अपने राजा का संदेश दूसरे राजा के पास ले जाना और उसको लाना, संधिभाव को बनाये रखना, अपने राजा के प्रताप को बनाये रखना, अधिक से अधिक मित्र बनाना, शत्रु के पक्ष के पुरूषों को फोडऩा, शत्रु के मित्रों को उससे विमुख करना, कार्यरत अपने गुप्तचरों अथवा सैनिकों को आपत्ति से पूर्वनिकाल लाना, शत्रु के बांधवों और रत्न आदि का अपहरण, शत्रु देश में कार्यरत अपने गुप्तचरों के कार्य का निरीक्षण, समय पडऩे पर पराक्रम दिखाना, बंधक रखे, शत्रु बांधवों को शर्त के अनुसार छोडऩा, दोनों राजाओं की भेंट आदि कराना, दूत के कार्य हैं।'' क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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