कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-4

  • 2016-09-15 09:30:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-4

राकेश कुमार आर्य
''महाराजा को उचित है कि मंत्रियों समेत छह बातों पर विचार करे-(1) मित्र (2) शत्रु में चतुरता (3) अपनी उन्नति (4) अपना स्थान (5) शत्रु के हमला से देश की रक्षा (6) विजय किये हुए देशों की रक्षा, स्वास्थ्य आदि प्रत्येक विषय पर विचार करके यथार्थ निर्णय से जो कुछ अपनी और दूसरों की भलाई की बात विदित हो उसे करना।'' (पू. प्र. 111)
इस श्लोक में भी विद्वान मंत्रियों से राजा की मंत्रणा की बात कही गयी है, अर्थात मंत्रियों का विद्वान होना अनिवार्य माना गया है। परन्तु वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में विद्वानों का मिलना कठिन होता जा रहा है। अत: लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा जाता है-''लोकतंत्र शासन प्रणाली प्राय: (शासन) क्षमता से शून्य होती है। प्रसिद्घ लेखक ट्रीटस्के ने एक आलंकारिक चित्र का उल्लेख किया है, जिसमें कि लोकतंत्र शासन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो चीखती-चिल्लाती भीड़ से घिरा है। जब राजशक्ति अशिक्षित और गैर जिम्मेदार लोगों के हाथ में दे दी जाती है तो उसमें क्षमता आ ही कैसे सकती है? जैसे एक कुशल गडरिया सैकड़ों भेड़ों को अपनी इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही लोकतंत्र राज्यों में कतिपय राजनीतिक नेता जनता को अपनी इच्छानुसार हांकने में सफल हो जाते हैं। सांसद तथा राज्यों की विधानसभाओं के लिए जो सदस्य निर्वाचित होते हैं, न केवल वे अयोग्य होते हैं अपितु जिन लोगों के हाथ में शासन की बागडोर होती है वे भी अपना काम भलीभांति नही कर सकते, उन्हें सदा भय बना रहता है कि राजनीतिक नेता उनकी किसी बात से असंतुष्ट न हो जाएं।''

इस प्रकार आज के लोकतंत्र में 'प्रतिभा भगाओ और मौज मनाओ' की नीति पर कार्य किया जाता है, जिसका अर्थ है कि शासन में किसी भी प्रकार से प्रतिभाएं ना आने पाएं-इसके लिए प्रशासन कार्य करता रहता है। क्योंकि अंग्रेजी काल के हमारे वर्तमान प्रशासन को तभी सम्मान मिल सकता है जब शासन मूर्खों का हो।

यह कितनी हास्यास्पद बात है कि कानून की व्याख्या के लिए तो एक सुयोग्य अधिवक्ता की आवश्यकता होती है, जिसके लिए निर्धारित किया गया है कि आपको इतनी शैक्षणिक योग्यता तो प्राप्त करनी ही है और उस व्याख्यायित विधि के अनुसार निर्णय करने वाले जज की भी एक योग्यता निर्धारित की गयी है, परंतु उस कानून को बनाने वाले सांसद या विधायक की कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नही की गयी।

लोकतंत्र के इस दोष को दूर करने का उपाय महर्षि मनु कदम -कदम पर बता रहे हैं। वह बार-बार कह रहे हैं कि हमारे सभासद या जनप्रतिनिधि अति विद्वान होने चाहिएं। विद्वान का अभिप्राय उनका आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही नही है, अपितु अपने क्षेत्र और देश की समस्याओं से पूर्णत: परिचित होना और उनका समाधान खोजने के लिए पूर्ण विवेकसंपन्न मेधाशक्ति वाला होने से भी है। हमारे सामने ऐसे भी उदाहरण आये हैं जब हमारे जनप्रतिनिधि संसद की कार्यवाही के चलते अपने चलभाष पर अश्लील वीडियो देखते पकड़े गये हैं। इतना ही नही कांग्रेस जैसी सबसे पुरानी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी जी एक से अधिक बार संसद में नींद की झपकी लेते देखे गये हैं। इसका अभिप्राय है कि संसद में बयानवीर लोग देश की जनता का मूर्ख बनाकर जनप्रतिनिधि बनकर पहुंच जाते हैं। उनका विद्वत्ता से कोई लेना-देना नही होता।
विचारों का क्रियान्वयन
राजा को अपने मंत्रियों के विचारों को समझकर व जानकर उन्हें क्रियान्वित करना चाहिए। मनु कहते हैं :-
तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक-पृथक।
समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्वितमात्मन:।। 57 ।। (42)
अर्थात ''उन सभासदों का पृथक-पृथक अपना-अपना विचार और अभिप्राय को सुनकर सभी के द्वारा कथित कार्यों में जो कार्य अपना और अन्य का हितकारक हो वह करने लगना।'' (स.प्र. 147)
हमारे मंत्री और सभासद विद्वान हों महर्षि ने श्लोक संख्या 57 में सभासद शब्द को अपनी व्याख्या में स्थान दिया है। जिसका अभिप्राय है कि मंत्री से भी पूर्व सभासदों का विद्वान होना आवश्यक है, क्योंकि मंत्री तो सभासदों में से ही बनेगा।
'राजा सांसदों के विचार सुने' इसका अभिप्राय है कि राजा राजसभा में (अर्थात संसद में) जनकल्याण से जुड़े समस्त विषयों पर जनप्रतिनिधियों के विचार सुने। यहां पक्ष-विपक्ष का कोई लफड़ा नही है, सबका एक पक्ष है-राष्ट्रहित। अगड़े-पिछड़े या दलित-शोषित का या अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का कोई अनर्गल प्रलाप नही, सबकी दृष्टि में ऐसा साम्यता है कि सबको 'जन' दिखता है, उसका कोई अन्य रूप अर्थात अगड़ा-पिछड़ा, दलित-शोषित अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक कुछ नही दिखता। यही कारण है कि मनु महाराज की संसद में कोई अप्रत्याशित शोर-शराबा नही है। विद्वानों की मंत्रणा में कभी शोर-शराबा हो भी नही सकता। यह तो वहीं होगा जहां लोग पाले खींचकर बैठते हैं और अपने-अपने पाले में बैठे या तो ऊंघते हैं या फिर अश्लील वीडियो देखते हैं।
मंत्री की नियुक्ति 'राजा' का विशेषाधिकार
आवश्यकता पडऩे पर राजा अन्य मंत्रियों की भी नियुक्ति कर सकता है। कहा गया है :-
अन्यायनपि प्रकुर्वीत सुचीन्प्राज्ञानवस्थितान्।
सम्यगर्थ समाहर्तृ नमात्यान्सुपरीशितान्।। 60 ।। (43) ''आवश्यकता पडऩे पर अन्य भी पवित्रात्मा, बुद्घिमान, निश्चित बुद्घि पदार्थों के संग्रह करने में अति चतुर सुपरीक्षित मंत्री (नियुक्ति) करे।'' (स.प्र. 147) ''इसी प्रकार अन्य भी राजा और सेना के अधिकारी जितने पुरूषों से राज्यकार्य सिद्घ हो सके उतने ही पवित्र, धार्मिक विद्वान चतुर स्थिर बुद्घि पुरूषों को राज सामग्री के वर्धक नियुक्त करे।'' (स.वि. 154) आजकल की लोकतांत्रिक प्रणाली में यह कहा जाता है कि किसी को मंत्री बनाना या किसी को मंत्री पद से हटाना (राजा का अर्थात) प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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