कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-2

  • 2016-09-14 03:00:06.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-2

राकेश कुमार आर्य
अंग्रेजों ने जिस राज्य व्यवस्था की स्थापना की उसमें बड़े पदों (मंत्री या सचिव पद) पर नियुक्ति का उनका ढंग स्वार्थ प्रेरित था, यह तो समझ में आता है, पर स्वतंत्र भारत में इन पदों की नियुक्ति के लिए सेवा शर्तों का भारतीयकरण किया जाना अपेक्षित था। जैसा कि 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' (प्र. 41 अ. 8) में व्यवस्था की गयी है, कहा गया है-''नियुक्ति से पूर्व राजा प्रमाणिक, सत्यवादी एवं आप्तपुरूषों के द्वारा उनके निवास स्थान और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी करे। सहपाठियों के माध्यम से उनकी योग्यता तथा शास्त्रीय प्रतिभा की, नये नये कार्य सौंप कर उनकी बुद्घि, स्मृति तथा चतुरवादी व्याख्यानों एवं सभाओं द्वारा उनकी वाकपटुता प्रगल्भता और प्रतिभा की, आपत्ति प्रस्तुत करके उनके उत्साह, प्रभाव और सहनशक्ति की, व्यवहार से उनकी पवित्रता मित्रता एवं दृढ़ स्वामी भक्ति की, सहवासियों एवं पड़ोसियों के माध्यम से उनके शील, बल स्वास्थ्य, गौरव, अप्रमाद तथा स्थिर वृत्ति की जानकारी करें। उनके मधुरभाषी स्वभाव तथा द्वेषरहित स्वभाव की परीक्षा राजा स्वयं करे।''

अंग्रेजी काल में अंग्रेजों ने राजस्व विभाग में एक ऐसे अधिकारी के पद का सृजन किया जो भ्रष्टाचार का जनक बना। यह पद था कलैक्टर का। जिला कलैक्टर का कार्य था भारत के लोगों से जबरन राजस्व वसूल कर सरकार को देना, तथा लिये हुए राजस्व में से अपना हिस्सा अपने पास रखना और शेष अपने ''सत्ताधीशों' की सेवा में भेंट कर देना। इस प्रक्रिया से देश में लोगों पर आर्थिक अत्याचार करने का इस सरकारी अधिकारी कलेक्टर अर्थात संग्रहकत्र्ता को ठेका दे दिया गया। इतना ही नही यदि कहीं उपद्रव आदि हों अर्थात भारत के लोग उसके अत्याचारों का विरोध करें, तो उसे कानून व्यवस्था बनाये रखने अर्थात भारत के लोगों की छटपटाहट को बलपूर्वक शांत रखने हेतु पुलिस बल भी उपलब्ध कराया गया। दुर्भाग्य से अंग्रेजों की यही-व्यवस्था इस देश में आज तक यथावत चल रही है। बहुत कम जिलाधिकारी ऐसे होते हैं जो जनता से सीधे संवाद करते हैं, या लोकप्रिय होते हैं। उनमें से अधिकांश तो आज भी जनता के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वह इस जनता के लिए 'लाईसेंसधारी लुटेरे' हों। इसका कारण यही है कि हमने संतरी से लेकर मंत्री तक की नियुक्ति प्रक्रिया को अंग्रेजों के अनुसार चला रखा है, यदि हम ऊपरिलिखित 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' की नियुक्ति प्रक्रिया को अपना लें तो वास्तविक जनसहयोगी और जनता के प्रति सेवाभावी अधिकारी और मंत्री हमें मिल सकते हैं। परंतु इस देश के विषय में यह सच है कि यहां नियुक्ति प्रक्रिया में सिफारिशें चलती हैं, परीक्षा प्रश्न पत्र लीक किये जाते हैं, मंत्री का पुत्र या संबंधी या किसी अधिकारी का पुत्र या संबंधी नियुक्ति के लिए प्राथमिकता पर लिया जाता है। अब तो इस बीमारी से न्यायपालिका भी अछूती नही रह गयी है।

वहां भी भाई -भतीजावाद, वंशवाद और भ्रष्टाचार जजों की नियुक्ति का आधार बन गया है। जज अपने बेटों को या किसी संबंधी को आगे लाते हैं और अपने पद का लाभ उठाते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का पद संभालने के पूर्व जो लगभग 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे थे, उनमें से अधिकांश लोग जजों के बेटे और संबंधी अथवा सरकारी वकीलों के पुत्र थे।

इस एकाधिकारवादी राज्य व्यवस्था के चलते इलाहाबाद उच्च न्यायालय और लखनऊ खण्डपीठ में आज तक एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नही बना है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कानूनमंत्री रहे रामजेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गयी सूची की जांच का आदेश दिया था जांच में पाया गया था कि 159 सिफारिशों में से लगभग 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या उनके निकट संबंधियों के लिए की गयी थीं।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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