कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-1

  • 2016-09-11 08:30:17.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-1

राकेश कुमार आर्य
मंत्र शब्द से मंत्री, मंत्राणी, मंत्रणा जैसे शब्द बने हैं। मंत्र का शाब्दिक अर्थ गूढ़ विचार है। गूढ़ विचार का अभिप्राय है किसी लंबी चौड़ी चिंतन मनन प्रक्रिया का अथवा चर्चा का वह सार रूप जो अंत में एक परिणाम के रूप में हमारे हाथ में आया। मानो जैसे दही को मथने के पश्चात मक्खन निकाल लिया है। गाय को दूह लिया तो दूध मिल गया यह दूहना और दोहने वाला मिलकर बन जाते हैं-दोहा। मानो सारतत्व खोज लिया।

जैसे मंत्र शब्द अपने आप में महत्वपूर्ण है वैसे ही मंत्री शब्द भी कम महत्वपूर्ण नही है। मंत्री वही बन सकता है जो सारतत्व को अपने मन-मस्तिष्क में समाये हो, जिसके पास अपने विषय का गूढ़ ज्ञान हो, और जो अपने मंत्रालय की सारी बारीकियों को भली प्रकार जानता हो। अब प्रश्न है कि मंत्री की योग्यता क्या होनी चाहिए? इस पर महर्षि मनु कहते हैं :-
मौलाञ्छास्त्रविद: शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्भवान.।
सचिवान्सप्त चाष्टौवा प्रकुर्नीत परीक्षितान् ।। 54 ।। (39)
''स्वराज्य स्वदेश में उत्पन्न हुए शास्त्रविद=वेदादि शास्त्रों के जानने वाले, शूरान=शूरवीर, लब्ध लक्षान = जिनके लक्ष्य और विचार निष्फल न हों, और कुलीन, परीक्षितान = अच्छे प्रकार सुपरीक्षित, सात या आठ (सचिवान) उत्तम, धार्मिक चतुर मंत्री करे।'' (सत्यार्थ प्रकाश 146)

इस प्रकार इस श्लोक की समीक्षा करने से पता चलता है कि हमारे मंत्रियों में निम्नलिखित योग्यताएं होनी अनिवार्य हैं :-
(1) वे स्वराज्य-स्वदेश में जन्मे हों।
(2)वेदादि शास्त्रों के जानने वाले हों।
(3) शूरवीर सेनापति की योग्यता रखते हों,
(4) जिनके लक्ष्य विचार निष्फल न हों,
(5) वे कुलीन हों (6) अच्छे प्रकार सुपरीक्षित हों, भली प्रकार ठोंक बजाकर देख लिये गये हों। (7) उत्तम धार्मिक चतुर हों।

किसी मंत्री या सचिव की इस प्रकार की योग्यता को स्पष्ट करने में विश्व के सभी संविधान मौन हैं। यह श्लोक मंत्रियों की योग्यता निर्धारित करते हुए उनके निर्वाचन के लिए या उम्मीदवारी के लिए सीमा रेखाएं खींचता है और कहता है कि हर 'ऐरा गैरा नत्थू खैरा' आकर ना तो मंत्री बन सकता है और ना मंत्री बनाया जा सकता है। उपरोक्त शर्तों को पूर्ण करने वाला व्यक्ति ही देश का मंत्री हो सकता है और ना मंत्री बनाया जा सकता है। आजकल मंत्रीपद पाने के लिए यदि ये सेवा शर्तें नही अपनायी जा रही हैं तो उसका एक ही कारण है कि अयोग्यों (जिसे मूर्खों का मूर्खों के द्वारा मूर्खों के लिए शासन कहा जाता है) ने अपने आपको योग्य सिद्घ करने के लिए ऐसी सेवा शर्तों को संविधान में स्थान ही नही दिया है या कहिए कि उन्हें संविधान में स्थान देने की आवश्यकता ही नही समझी है।

''जो अपने राज्य में उत्पन्न, शास्त्रों के जानने हारे, शूरवीर जिनका विचार निष्फल ना होवे कुलीन धर्मात्मा, स्वराज्यभक्त हों, उन सात या आठ पुरूषों को अच्छी प्रकार परीक्षा करके मंत्री करें और इन्हीं की सभा में आठवां या नववां 'राजा' हों। (इन्हीं 8-9 लोगों से मिलकर 'नवरत्न' कहे जाने की भारतीय परंपरा का आरंभ हुआ जो आज तक कही जाती है, इन्हें 'नवरत्न' कहे जाने के पीछे भी यही मान्यता छिपी है कि ये सभी परमविद्वान और देश हित के लिए समर्पित ऐसे भारतरत्न हैं जिनकी योग्यता पर किसी को संदेह नही है, और जिन्हें मंत्री बनाकर सभी गर्व और गौरव की अनुभूति हो रही है) ये सब मिलके कत्र्तव्याकत्र्तव्य कार्यों का विचार किया करें।'' (संस्कार विधि 154)

कत्र्तव्याकत्र्तव्य कार्यों का विचार
महर्षि दयानंद जी महाराज ने उक्त श्लोक की व्याख्या करते हुए अंत में यह कहा है कि ये मंत्री लोग और राजा मिलकर ''कत्र्तव्याकत्र्तव्य कार्यों का विचार किया करें।'' महर्षि का यह कथन महत्वपूर्ण है इससे भारत के शासन के वास्तविक लोकतांत्रिक स्वरूप की झलक मिलती है, और हमें पता चलता है कि हमारे जनप्रतिनिधियों को कौन से काम करने चाहिए और कौन से नही।

इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि मंत्रिपरिषद भी सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से कार्य करेगी। सारे मंत्री देशहित के सभी मुद्दों पर भली प्रकार विचार विमर्श करेंगे और जिस निर्णय को लेंगे उसे सामूहिक निर्णय माना जाएगा। इस मनुवादी व्यवस्था को आज भी हर लोकतांत्रिक देश यथावत मानता है।
''अपने राज्य और देश में उत्पन्न हुए वेद वा शास्त्रों के जानने वाले, शूरवीर, कवि, गृहस्थ अनुभवकत्र्ता, सात अथवा आठ धार्मिक बुद्घिमान मंत्री राजा को रखने चाहिए।'' (पू.प्र. 111)

नियुक्ति से पूर्व अमात्यों की परीक्षा विधि
अंग्रेजों ने इस देश की विधि व्यवस्था या शासन प्रणाली का अंग्रेजीकरण करने की प्रक्रिया प्रारंभ की थी। अपने इस मनोरथ में उन्हें इतनी तो सफलता मिल ही गयी कि आधुनिक भारत में राजनीति शास्त्र और राज्य व्यवस्था की सारी अच्छाईयों का श्रेय अंग्रेजों को देने वाले इस देश में आज भी हैं। अंग्रेजों ने भारत में अपनी राज्यव्यवस्था स्थापित की तो उसके संचालन में उन्होंने उन्हीं भारतीयों का सहयोग लिया जिन्हें वह अपने प्रति पूर्ण निष्ठावान और भारत के प्रति पूर्णत: गैर निष्ठावान मानते थे। यहां तक कि उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी उन्हीं लोगों को या नेताओं को भारत का प्रतिनिधि माना जो उनकी चाटुकारिता करते थे और उनके भारत पर शासन को भारत के लिए वरदान मानते थे।
क्रमश:

Tags:    दूत   

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.