कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए, भाग-7

  • 2016-09-21 06:30:30.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए, भाग-7

राकेश कुमार आर्य
कहा गया है कि-
स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढ़ेगिंतचेष्टित:।
आकारमिंगितम् चेष्टां भृत्येषुच चिकीर्षतम्।। 67 ।।
अर्थ : ''वह दूत शत्रु राजा के असंतुष्ट या विरोधी लोगों में और राजकर्मचारियों में गुप्त संकेतों के एवं चेष्टाओं से शत्रु राजा के आकार=भाव=चेष्टा= प्रयत्न को तथा उसके अभिलषित कार्य उसकी इच्छाओं को जाने।''
दूत के कार्यों पर हमें अधिक प्रकाश डालने की आवश्यकता नही है क्योंकि वर्तमान विश्व में भी राजदूतों और दूतों के वही कार्य हैं जो प्राचीनकाल में थे। बस इतना यहां स्पष्ट करना अनिवार्य और अपेक्षित था कि यह दूत परंपरा भी विश्व को भारत की देन है। वर्तमान में भी किसी दूत को वही सारी सुविधाएं मिलती हैं जो कभी प्राचीनकाल में किसी दूत को मिला करती थीं। कुल मिलाकर दूत के संबंध में एक ही बात को समझने की आवश्यकता है कि वह विदेशों में भारत के हितों का रक्षक भी है और अपनी बात को निडरता से कहने वाला एक अधिकारी भी है।
कालजयी है मनुस्मृति
कालजयी ग्रंथ वही होता है जो युग-युगों तक मनुष्य का मार्गदर्शन करे। मनु महाराज की मनुस्मृति ऐसा ही एक कालजयी ग्रंथ है। इसकी राज्यव्यवस्था के प्रतिपादित सिद्घांत आज भी विश्व की प्रत्येक उत्तम राज्य व्यवस्था का मार्गदर्शन कर रहे हैं। लोगों ने चाहे उन्हें नाम कुछ भी दे दिया हो, पर सर्वत्र मनु विराजमान है। अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया, उन्होंने चाहे जितने भारत पर शासन किया उसमें अपनी बनाई विधि को हम पर थोपा, परंतु उन्होंने 1860 से लेकर 1947 तक एक नही अनेकों बार कानून बनाये और बदले, अनेकों संविधान यहां अधिनियमों के रूप में लागू किये। जो लोग अंग्रेजों के अलिखित संविधान का लोहा मानकर उन्हें विश्व की सबसे अधिक बुद्घिमान जाति मानते हैं वे तनिक इस बात पर भी विचार करें कि यदि वे इतने ही दयालु न्यायप्रिय और बुद्घिमान थे और यदि विश्व की सर्वोत्तम राज्यव्यवस्था लोकतंत्र के वही जनक थे तो उन्हें भारत में बार-बार अनेकों शासन अधिनियम क्यों परिवर्तित करने पड़े?
स्वयं अंग्रेजों का संविधान अलिखित होने की भ्रांति फैलाई गयी है, जिससे कि वे विश्व के सर्वाधिक अनुशासित और बुद्घिमान लोग जान पड़ें। उनका संविधान अलिखित केवल इस सीमा तक है कि उसे लिखने के लिए कभी किसी संविधान सभा का गठन नही किया गया। अन्यथा तो ब्रिटिश संविधान को पूर्णत:, लिख लिया गया है। उनके अलिखित संविधान में कितने संशोधन कितनी बार हो गये हैं? यह भी किसी को ज्ञात नही है, क्योंकि परंपराओं को तोडऩा बड़ा सरल है, अपेक्षाकृत किसी लिखित संविधान की धारा या व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए। ऐसी परिस्थितियों में वहां का संविधान कितनी बार संशोधित किया गया, यह किसने जाना है?
अब अपनी मनुस्मृति पर आइये। इस कालजयी ग्रंथ को संशोधित करने की हिम्मत किसी की ना तो हुई और कभी ना हो सकती है। हां, इसमें स्वार्थी लोगों ने मिलावट अवश्य की है। परंतु मूलव्यवस्था में, धारा में या श्लोक में परिवर्तन करने या उसे मनुस्मृति से निकालने का साहस नही कर पाये। मिलावट को हम ना तो संशोधन मानते हैं, ना ही परिवर्तन मानते हैं और ना ही परिवर्धन मानते हैं। क्योंकि संशोधन वह होता है जिसके होने पर मूल व्यवस्था या धारा हटा दी जाती है, या उसका कोई अंश हटा दिया जाता है, परिवर्तन वह है जिसमें किसी पुस्तक ग्रंथ या संविधान का कोई बड़ा अंश पूर्णत: हटा दिया जाता है और नया स्थापित कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त परिवर्धन वह होता है जिसमें किसी पुस्तक के या संविधान की व्यवस्था धारा या अनुच्छेद की भावना के अनुरूप उसका अर्थ स्पष्ट करने के लिए विधिवत कुछ और जोड़ दिया जाता है। परंतु शर्त यह है कि यह कुछ और जोड़ा जाना पहले वाली व्यवस्था या धारा का अर्थ स्पष्ट करने के लिए ही जोड़ा जाता है।
मनुस्मृति की मिलावट जब किसी प्रकार के संशोधन, परिवर्तन या परिवर्धन की श्रेणी में आती ही नही है तो मनुस्मृति को कालजयी ग्रंथ माना ही जाना चाहिए। इसके पीछे हमारा मानना है कि जैसे किसी भाषा के कुछ निश्चित शब्द होते हैं और हम घुमा फिराकर उन्हीं शब्दों में अपनी बात कहते रहते हैं चाहे कोई कितने ही ग्रंथ क्यों न पढ़ लें, या कितने ही ग्रंथ क्यों न लिख ले शब्दों की सीमा तो उतनी ही रहनी है। वही शब्द होंगे पर यथा स्थान यथा समय यथावश्यक अपेक्षा के साथ प्रयुक्त होते रहेंगे जिससे हमें लगता रहेगा कि हम बहुत आगे बढ़ रहे हैं और नये-नये शब्द बोल रहे हैं। पर ऐसा नही होता।
इसी प्रकार मनु की राज्यव्यवस्था है उसकी बातों को ही घुमा फिराकर लोगों ने यथासमय यथास्थान प्रयोग कर लिया है। मूल विचार तो मनु प्रतिपादित राज्यव्यवस्था का ही घूम रहा है। आगे के आलेखों में हमारा यह मत और स्पष्ट होता जाएगा।
क्रमश: