कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-5

  • 2016-09-16 09:30:08.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-5

राकेश कुमार आर्य
वर्तमान लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का यह मूल्य भी मूलत: मनु की राज्य व्यवस्था से लिया गया है। जिसे उपरोक्त श्लोक स्पष्ट कर रहा है।
अगले श्लोक में भी यही बात कही गयी है-
निवर्तेतास्य यावदभिरिति कत्र्तव्यता नृभि:।
तावतो अतन्द्रितान्द क्षान्प्रकुर्वीत विचक्षणान्
।। 61।।
''जितने मनुष्यों से कार्य सिद्घ हो सके, उतने आलस्य रहित बलवान और बड़े-बड़े चतुर पुरूषों को अधिकारी अर्थात नौकर करे।'' (स.प्र. 147)
इसका अभिप्राय है कि देश की आवश्यकताओं के दृष्टिगत कितने सभासदों/मंत्रियों की राजा को आवश्यकता है उतने वह नियुक्त कर सकता है। इससे तो वर्तमान में हमारे देश में मंत्रियों की एक निश्चित संख्या की संवैधानिक व्यवस्था अलोकतांत्रिक सिद्घ होती है। क्योंकि मंत्रियों की नियुक्ति के संबंध में यह प्रधानमंत्री के हाथ बांधती है। कार्य को गति प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री को यदि सौ मंत्रियों की भी आवश्यकता है तो वह ऐसा कर सकें-ऐसी उसे छूट होनी चाहिए। आजकल देश की जनसंख्या बहुत अधिक हो गयी है। इतनी बड़ी जनसंख्या की जनसमस्याएं भी उसी अनुपात में बढ़ी हैं, तब मंत्रियों की संख्या पर निषेधात्मक प्रतिबंध उचित नही है, कहा जा सकता है कि अधिक मंत्रियों की भीड़ से कोष पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है। यह बात उचित हो सकती है और कदाचित इसी भय से मंत्रियों की संख्या भी निश्चित की गयी है। परंतु हम मंत्रियों की भीड़ की वकालत नही कर रहे हैं हम तो क्रियाशील, कर्मशील, विद्वान मंत्रियों की नियुक्ति और उनकी कार्यप्रणाली की वकालत कर रहे हैं, जिनकी नियुक्ति से देश के विकास कार्यों को गति दी जा सके। यदि देश का मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय में कार्याधिक्य की शिकायत कर अधिक जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री के सामने भावुक हो सकता है तो समझा जा सकता है कि देश की संसद के सामने भी कितना कार्य है? और हमारे मंत्रियों को कितनी शीघ्रता से उन कार्यों को पूर्ण करने की आवश्यकता है?

अमात्यों के सहयोगी अधिकारी
मनु कहते हैं :-
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान्दक्षान्कुलोदगतान्।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने ।। 62 ।।
''इनके अधीन शूरवीर बलवान कुलोत्पन्न पवित्र भृत्यों को बड़े-बड़े कर्मों में और भीरू=डरने वालों को भीतर के कर्मों में नियुक्त करे।'' (स.प्र. 147)
इस श्लोक से अर्थ निकलता है कि जैसी जिसकी योग्यता हो सरकार को उसे वैसा ही कार्य देना चाहिए। योग्यता की परख किसी जाति या जातीय आरक्षण से नही की जानी चाहिए। हर संभव प्रयास यह किया जाना चाहिए कि योग्य व्यक्ति की योग्यता का सम्मान होना ही चाहिए।
साथ ही यह भी कि प्रतिभा को किसी जाति विशेष या वर्ग विशेष की बपौती या विशेषाधिकार नही माना जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था करने से समाज में 'सबका सम्मान-सबका विकास' संभव हो पाता है। महर्षि मनु की यह व्यवस्था पूर्ण पारदर्शी है, जिस में किसी प्रकार के भ्रष्टाचार की कोई संभावना नही है।

प्रधानदूत की नियुक्ति
हमारे यहां दूत की परंपरा बहुत प्राचीनकाल से है। जब दो राजाओं में किसी कारण से संवादहीनता बन जाती थी या दोनों के मध्य कोई भ्रांति, संदेह या अविश्वास की भावना कहीं खड़ी हो जाती थी या किसी भी प्रकार से या किसी भी कारण से युद्घ की परिस्थितियां निर्मित होने लगती थीं, तब दूत की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती थी। वैसे राजनीति में दो देशों के मध्य ये संभावनाएं न्यूनाधिक सदा ही बनी रहती हैं। इसलिए राजा को दूत की सदा ही आवश्यकता भी रहती है।
दूत के कार्यों की महत्ता की दृष्टि से उसका बहुत ही तीव्र बुद्घि और साथ ही सुलझी हुई बुद्घि का होना आवश्यक होता था। इन्हीं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए महर्षि मनु ने दूत की योग्यता का चित्रण इस श्लोक में किया है :-
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्र विशारदमं्।
इंगिताकार चेष्टज्ञंशुचिंदक्षं कुलोदगतम्।।
''अर्थात जो प्रशंसित कुल में उत्पन्न, चतुर, पवित्र, हीनभाव और चेष्टा से भीतर हृदय और भविष्यत में होने वाली बात को जानने वाला सब शास्त्रों में विशारद चतुर है उस दूत को रखें।'' (स.प्र. 147)
सचमुच दूत वही उत्तम होता है जो किसी भी प्रकार से भविष्यत में होने वाली बात को या घटनाक्रम को जानने वाला हो। उसकी बौद्घिक क्षमता, विवेकशक्ति व्यावहारिक ज्ञान, उसकी सूझबूझ और कार्यशैली ऐसी हो जो दो देशों के मध्य होने वाले तनाव के परिणाम को भली प्रकार जान ले। यदि कोई दूत भविष्यत की होने वाली घटना को वर्तमान परिस्थितियों का अवलोकन करके समझने में असमर्थ रहता है तो उसके कारण देश को भारी क्षति उठानी पड़ जाती है। दूसरे, यदि वह भविष्यत को पढऩे वाला है तो स्वाभाविक है कि वह वर्तमान की गांठ को भी उतनी ही प्रबल इच्छाशक्ति के साथ खोलने के लिए सक्रिय रहता है।
''तथा जो सब शास्त्र में निपुण नेत्रादि के संकेत स्वरूप तथा चेष्टा से दूसरे के हृदय की बात को जाननेहारा, शुद्घ बड़ा स्मृतिमान, देशकाल, जाननेहारा, सुंदर, जिसका स्वरूप बड़ा वक्ता और अपने कुल में मुख्य हो उस और स्वराज्य और राज्य के समाचार देने होरे अन्य दूतों को भी नियत करें।'' (सं.वि. 154)

अच्छे दूत के लक्षण
मनु महाराज श्रेष्ठ दूत के लक्षण बताते हुए कहते हैं :-
अनुरक्त: शुचिर्दक्ष: स्मृतिमान्देशकालवित्।
वयुष्मान्वीतभीवर्गग्मी दूतो राज्ञ: प्रशस्यते।। 64 ।। (47)
''अर्थात वह ऐसा हो कि राजकाज में अत्यंत उत्साह प्रीतियुक्त, निष्कपटी, पवित्रात्मा, चतुर बहुत समय की बात को भी न भूलने वाला, देश और कालानुकूल वर्तमान का कत्र्ता, सुंदररूपयुक्त निर्भय और बड़ा वक्ता वही राजा का दूत होने में प्रशस्त है।'' (स.प्र. 147)
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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