कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-3

  • 2016-09-14 12:30:40.0
  • राकेश कुमार आर्य

कैसे मंत्रियों व दूतों को नियुक्त किया जाए भाग-3

राकेश कुमार आर्य
अब प्रश्न है कि भारत की वर्तमान राज्यव्यवस्था को संचालित करने वाले संविधान का कौन सा प्राविधान या अनुच्छेद है जो ऐसी सारी धांधलियों की छूट दे रहा है? निश्चित रूप से वही प्राविधान जिसमें किसी उच्च न्यायालय के जज की नियुक्ति का प्राविधान किया गया है, और व्यवस्था दी गयी है कि कोई अधिवक्ता जो किसी उच्च न्यायालय में 10 वर्ष वकालत कर चुका हो, वह भी उच्च न्यायालय का जज हो सकता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था निश्चित रूप से एक साधारण परिवार के वकील को भी आगे बढऩे के लिए प्रदान की होगी, पर व्यवहार में क्या हुआ? व्यवहार में साधारण परिवार के वकील को प्रतियोगिता से धक्के मारकर बाहर कर दिया गया। सारी व्यवस्था को उन मुट्ठी भर लोगों ने अपनी दासी बना लिया है, जो उच्च पदों पर बैठे थे। फिर कमी क्या रही? कमी ये रही कि नियुक्ति की प्रक्रिया उचित नही है। जिसकी नियुक्ति की जा रही है उसमें उस जनता की जनसहभागिता नही है जिस पर उस अधिकारी को शासन करना है या जिसके विवादों का निस्तारण उसे करना है। हमारा मानना है कि 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' की उपरोक्त व्यवस्था को काम में लाया जाना अपेक्षित है। भ्रष्टाचार के सारे बादल ही छंट जाएंगे और वास्तविक पात्र व्यक्ति पद पाने में सफल भी हो जाएगा।
कौटिल्य की उपरोक्त विधि नियुक्ति की प्रकट विधि है, जबकि एक गुप्त विधि भी है। उसके विषय में 4 विधियों की सहायता ली जाती है।
(1) धर्मोपधा-गुप्त धार्मिक उपायों से अमात्य के (या किसी भी अधिकारी/जज के) हृदय की पवित्रता की परीक्षा करना (2) अर्थोपधा-गुप्त आर्थिक लोभ की बातों से (3) कामोपधा-गुप्त काम संबंधी आकर्षणों से (4) भयोपधा-गुप्त भय आदि प्रदर्शित करके अमात्यो के हृदय की पवित्रता की परीक्षा करें।

हमने धर्मोपधा रीति से 'नमस्ते' कर ली है। जबकि 'अर्योपधा' और 'कामोपधा' का उल्टा कर दिया है। धन और रूपसी को हम अपनी नियुक्ति के लिए साहब को नजराने के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जबकि 'भयोपधा' रीति भी प्रचलन से बाहर हो गयी है, इसे हमारे उच्चाधिकारी अधीनस्थ कर्मचारी की दुर्बलताओं की जानकारी लेकर उसका भयादोहन करने में प्रयुक्त करते देखे जाते हैं। कौटिल्य का मत है कि-''धर्मपरीक्षा में पवित्र सिद्घ अमात्यों को न्यायालय में, अर्थपरीक्षा में पवित्र को कर संग्रह और कोषसंरक्षण में, काम परीक्षा में पवित्र को अंत:पुर और विलास स्थानों में तथा भयपरीक्षा में पवित्र को अंगरक्षक के रूप में नियुक्त करना चाहिए।''
राजा को सहायकों की आवश्यकता क्यों?
मनु महाराज कहते हैं :-
अपि यत्सुकरं कर्म हृदप्येकेन दुष्करम्।
विशेष तो असहायेन किंतु राज्यं महोदयम् ।।
।। 55।। (40)
''क्योंकि विशेष सहाय के बिना जो सुगम कर्म है वह भी एक के करने में कठिन हो जाता है, जब ऐसा है तो महान राज्य कर्म एक से कैसे हो सकता है? इसलिए एक को राजा और एक की बुद्घि पर राज्य के कार्य को निर्भर रखना बहुत ही बुरा काम है।'' (सत्यार्थप्रकाश 146)
राजा को अपने विशाल राज्य को संभालने में सहायता के लिए अमात्यों, मंत्रियों, अधिकारियों, न्यायाधीशों की नियुक्ति करनी होती है। इससे प्रशासनिक तंत्र, अर्थतंत्र, और न्यायतंत्र सुगमता से कार्य करने लगता है।
दूसरे जनसाधारण को अपने कार्यों को कराने में सुविधा हो जाती है तीसरे, शासन-प्रशासन एक इकाई के रूप में लोगों के मध्य आकर बैठ जाता है।
इस प्रकार इस श्लोक में महर्षि मनु ने 'शक्ति पृथक्करण' के लोकतांत्रिक मूल्य की घोषणा की है। इस सिद्घांत को किसी पश्चिमी राज्य व्यवस्था में खोजने की आवश्यकता नही है, जैसा कि लॉर्ड मैकाले के मानस पुत्र करते रहते हैं। इसके विषय में यह मानना चाहिए कि इसे विश्व को हमने दिया है और इस आदर्श व्यवस्था के लिए विश्व को हमारा ऋणी होना चाहिए।
मंत्रियों के साथ मंत्रणा
मनु कहते हैं :-
तै: सार्ध चिंतयेन्नियम् सामान्यं संधिविग्रहम्।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानिच ।। 56।। (41)

इससे सभापति को उचित है कि-''नित्यप्रति उन राज्यकर्मों में कुशल विद्वान मंत्रियों के साथ सामान्य करके किसी से संधि=मित्रता, किसी से विग्रह विरोध, स्थित समय को देखकर के चुप रहना, अपने राज्य की रक्षा करके बैठे रहना, जब अपना उदय अर्थात बुद्घि हो तब दुष्ट शत्रु पर चढ़ाई करना, मूलराज, सेना कोश, आदि की रक्षा जो जो देश प्राप्त हों, उस उसमें शांति स्थापना उपद्रव रहित करना, इन छह गुणों का विचार नित्यप्रति किया करें।''
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.