राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-5

  • 2016-09-08 09:30:28.0
  • राकेश कुमार आर्य

राजा की जीवनचर्या और दिनचर्या, भाग-5

''क्रोधज आठ व्यसन''
जैसे कामज 10 व्यसन हैं, वैसे ही क्रोधज व्यसन भी हैं। इनकी संख्या मनु महाराज ने 8 बतायी है। इन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वह कहते हैं :-
पैशुन्यं साहसं द्रोह ईष्र्या सूयार्थ दूषणम्।
वाग्यदण्डजम् च पास्ष्यं क्रोधजोअपिगणो अष्टक: ।। 48।। (33)
सत्यार्थ प्रकाश (144) में महर्षि दयानंद इस श्लोक का अर्थ करते हुए कहते हैं,-''क्रोध से उत्पन्न हुए व्यसनों को गिनाते हैं-पैशुन्य अर्थात चुगली करना, बिना विचारे बलात्कार से किसी स्त्री से बुरा काम करना, द्रोह रखना, ईष्र्या अर्थात दूसरे की बड़ाई व उन्नति देखकर जला करना, असूयादोषों में गुण, गुणों में दोषारोपण करना, अर्थदूषण अर्थात अधर्म युक्त बुरे कामों में धनादि का व्यय करना, कठोर वचन बोलना और बिना अपराध का कड़ा वचन वा विशेष दण्ड देना, ये आठ दुर्गुण क्रोध से उत्पन्न होते हैं।''

यदि हमारे राजनीतिज्ञों के लिए आचार संहिता बनाकर उनके लिए यह निश्चित कर दिया जाए कि उन्हें काम और क्रोध से हर स्थिति में बचना है और अपने जितेन्द्रिय होने का प्रमाण अवश्य देना है तो राजनीति को भारत में राष्ट्रनीति बनने में तनिक सी भी देरी नही लगेगी। देश से व्यभिचार, अनाचार, दुराचार सभी समाप्त हो जाएंगे। परंतु अपने आपको हर प्रकार की व्यवस्था से ऊपर रखने वाले हमारे राजनीतिज्ञों ने तो इन कामज और क्रोधज व्यसनों से तबाह हुए अपने चरित्र को छुपाने के लिए हमें ये कहकर भ्रमित करने में सफलता प्राप्त कर ली है कि व्यक्ति का सार्वजनिक जीवन अलग है और उसका व्यक्तिगत जीवन अलग है। लेकिन मनु कह रहे हैं कि व्यक्तिगत जीवन सार्वजनिक जीवन की नींव होता है, इसलिए व्यक्तिगत जीवन अति पवित्र और उच्च होना चाहिए। किसी भी राजनीतिज्ञ का व्यक्तिगत जीवन जितना पवित्र और उच्च होगा, उसका सार्वजनिक जीवन भी उतना ही उच्च और पवित्र होगा। स्पष्ट है कि महर्षि मनु की व्यवस्था आज की राज्य व्यवस्था से कहीं अधिक पारदर्शी और व्यावहारिक है। यह नही हो सकता है कि जब किसी 'दामिनी' का शील भंग साधारण जनता के लोगों में से कोई करे तो कानून उसके लिए किसी और दृष्टिकोण से सोचे और जब राजनीतिज्ञ किसी की पत्नी को (दिग्विजय सिंह का अपराध देखो) फुसलाकर अपनी पत्नी बना ले, तो उस समय कानून मौन रह जाए। राजा के ऐसे दुराचरण से प्रेरित होकर जनता में अपराध बढ़ते हैं। इसलिए महर्षि मनु कामज और क्रोधज अवगुणों से सावधान करते हुए राजा को सचेत कर रहे हैं :-
कामवेषु प्रसक्तो हि व्यासनेषु महीपति:।
वियुज्यते अर्थ धर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैवतु। ।। 46।। (31)

अर्थात ''जो राजा काम से उत्पन्न हुए दस दुष्ट व्यसनों में फंसता है, वह अर्थ अर्थात राज्य धन आदि और धर्म से रहित हो जाता है, और जो क्रोध से उत्पन्न हुए आठ बुरे व्यसनों में फंसता है, वह शरीर से भी रहित हो जाता है।'' (स.प्र. 144)

वर्तमान राज्यव्यवस्था ने कुछ ऐसा संकेत दिया है कि किसी भी राजनीतिज्ञ के भीतर कामज और क्रोधज विकार होते ही नही हैं। इसलिए उन्हें इन विकारों से मुक्त मानकर प्रत्येक प्रकार के विधि-विधान से मुक्त रखा जाए।

महर्षि दयानंद जी के द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में आर्य राजाओं की जिस श्रंखला को दिया गया है उसे देखने से हमें पता चलता है कि न्यायी और धर्मात्मा राजाओं ने कई-कई दशक तक शासन किया। निश्चय ही इसके पीछे उनका आत्म संयम भी महत्वपूर्ण कार्य करता था। पर आजकल हमारे राजनीतिज्ञों को सत्ताशीर्ष पर रहने का अत्यल्प समय मिलता है। इसका कारण उनके कामज और क्रोधज व्यसन है, जो उन्हें अधिक देर तक ऊंचाई पर रहने नही देते और उन्हें वहां से पकडक़र खींच लेते हैं। फलस्वरूप हमारे नेता ''अर्थ अर्थात राज्य धन आदि और धर्म से रहित हो जाते हैं, और अंत में शरीर से रहित हो जाते हैं।''

अच्छा हो कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक जीवन की आधारशिला बनाया जाए।

व्यसनों का मूल है लोभ
कामज और क्रोधज व्यसनों का मूल लोभ को माना गया है। इस विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए महर्षि मनु कहते हैं:-
द्वयोरप्येतयोमूलं यं सर्वेकवयो विदु:।
तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेताकुभौ गणौ।। ।। 49।। (34)

जो सब विद्वान लोग कामज और क्रोधज का मूल जानते हैं कि जिससे ये सब दुर्गुण मनुष्य को प्राप्त होते हैं, उस लोभ को प्रयत्न से छोड़ें। सचमुच विश्व के देशों में जितना भ्रष्टाचार और अनाचार आज फैला है उसका मूल यह लोभ ही है। लोगों ने राजनीति को व्यापार बना लिया और जनसेवा की उसकी पवित्रता का उच्च भाव उससे कहीं लुप्त हो गया है। जिससे हर राजनीतिज्ञ को अपनी तिजोरी भरने की चिंता है। अपनी इस प्रवृत्ति से राजनीतिज्ञों ने अपनी साख तो गिरायी ही है साथ ही राजनीति को भी अधोगामी बनाया है। सभी व्यसनों का मूल लोभ बताकर महर्षि मनु एक प्रकार से यही कह रहे हैं कि राजधर्म में एक धारा यह भी होनी चाहिए कि कोई भी सभासद या जनप्रतिनिधि लोभी नही होगा। यदि कोई राजा या सभासद लोभी पाया जाता है तो उसको राजनीति के अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। लोभ के वशीभूत होकर लोग जुआ खेलते हैं, जब जुआ से अवैध धन आ जाता है, तो मद्यमांस में उसे उड़ाते हैं और मद्यमांस आ जाता है तो फिर कोई न कोई महिला भी होनी चाहिए जो इन का मनोरंजन करा सके।

सारे संसार के राजनीतिक गलियारों में ये सारे अवैध और अनैतिक कार्य नित्य प्रति होते हैं, परंतु अवैध और अनैतिक होकर भी अवैध और अनैतिक इसलिए नही माने जाते कि ये उन लोगों के द्वारा किये जाते हैं, जिनके यहां कुछ भी अवैध और अनैतिक नही होता। महर्षि मनु कामज और क्रोधज व्यसनों में सर्वाधिक कष्टदायक 4 व्यसनों को ही मानते हैं। वह इन कष्टदायक व्यसनों का उल्लेख करते हुए लिखते हैं :-
पानमक्षा: स्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम्।
एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजेगणे।। ।। 50।। (35)
''काम के व्यसनों में बड़े दुर्गुण एक मद्यपान अर्थात मदकारक द्रव्यों का सेवन, दूसरा-पासों आदि से जुआ खेलना, तीसरा-स्त्रियों का विशेष संग चौथा-मृगया=शिकार खेलना। ये चार महादुष्ट व्यसन हैं।''(स.प्र. 145)
कहना न होगा कि बड़े-बड़े राजाओं ने अपने लिए महर्षि मनु की इस आदर्श आचार संहिता का अथवा विधि व्यवस्था का उल्लंघन करके अपने राज्य और राजधानियों को ही नष्ट कर लिया। जब संविधान की धज्जियां उड़ायी जाती हैं तो ऐसा ही होता है। महर्षि मनु की विधि व्यवस्था की उपयोगिता का इसी बात से पता चल जाता है कि यह आज भी उतनी ही उपयोगी है जितनी महर्षि मनु के काल में थी।
क्रमश: