नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-3

  • 2016-10-20 08:15:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-3

सूचना पर मंत्री की कार्यवाही
नीचे की कोई भी शिकायत स्वाभाविक रूप से ऊपर केन्द्रीय मंत्री तक पहुंचती है। केन्द्रीय मंत्री उस शिकायत को लेकर क्या करे। इस पर भी मनु ने स्पष्ट व्यवस्था की है :-
तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक्कार्याणि चैव हि।
राज्ञो अन्य: सचिव: स्निग्धस्तानि पश्येदतन्द्रित:।।
।। 102 ।। (92)
''इस पूर्वोक्त अध्यक्षों के गांवों से संबद्घ राजकार्यों को और अन्य भिन्न-भिन्न कार्यों को भी राजा का एक विश्वासपात्र प्रमुख मंत्री आलस्य रहित होकर देखे।''
''और एक-एक दश-दश सहस्र गांवों पर दो सभापति वैसे करें, जिनमें एक राजसभा में हो और दूसरा अध्यक्ष आलस्य छोडक़र सब न्यायाधीश राजपुरूषों के कामों को सदा घूमकर देखते रहें।''
(स.प्र. 153)

इस श्लोक की व्याख्या के लिए आवश्यक है कि मनु की राज्य व्यवस्था में सभा शब्द पर विचार कर लिया जाए। मनु ने जिसे सभा कहा है उनकी संख्या उसने तीन (1) राजसभा (2) ब्रह्मसभा या न्याय सभा (3) तथा धर्मनिर्णय सभा या विधान परिषद कहा है। आजकल के लोकतंत्र में इन सभाओं को पालिका कहकर लोकतंत्र के तीन स्तंभ कहा जाकर पालिका के नाम से पुकारा जाता है। जिससे इनके प्रचलित नाम विधान पालिका (विधायिका) कार्यपालिका और न्यायपालिका हो गये हैं। इससे स्पष्ट है कि आज की राज्य व्यवस्था इस संदर्भ में पूर्णत: 'मनुवादी' है। इसमें इतना अंतर अवश्य आया है कि मनु कालीन या मनु प्रतिपादित राज्य व्यवस्था में इन तीनों सभाओं के मुखिया वेदों के परमज्ञाता होते थे-परंतु आजकल ये लोग वेदों का नाम लेने से भी डरते हैं। इन्हें ऐसा करने से देश की 'धर्मनिरपेक्ष' छवि के भंग होने और स्वयं पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाने का डर रहता है।

मनु जिस प्रकार केन्द्र के एक मंत्री को जनसूचना एवं जनशिकायतों पर कार्यवाही करने के लिए अधिकृत करते हैं, उससे यह पता चलता है कि उस समय उन्होंने जनशिकायतों को दूर करने पर विशेष ध्यान दिया था। वास्तव में एक पूर्णत: उत्तरदायी और लोकल्याणकारी राज्य की स्थापना होना तभी संभव है जब सरकारें जन शिकायतों का शीघ्रातिशीघ्र निवारण कर दें। ऐसे मंत्री को 'जनलोकपाल' भी कहा जा सकता है। महर्षि दयानंद जी महाराज ने इस जनलोकपाल को घूम-घूमकर जन शिकायतों का समाधान करने कराने के लिए अधिकृत किया है। इस जनलोकपाल को सब न्यायाधीश राजपुरूषों के कार्यांे को भी देखने भालने का काम सौंपा जाता था, जिससे जनता के दुख-दर्द का समय पर निवारण और निस्तारण किया जा सके।

ऐसी अच्छी राज्य व्यवस्था का परिणाम यह आया कि इस देश में सामाजिक शांति, सदभाव और सम्मैत्री का वातावरण बना। यही कारण रहा कि भारत में लोग अपने घरों में ताला नही लगाते थे। जबकि डा. जानसन का कहना है-''आधुनिक विश्व के सर्वाधिक सभ्यराष्ट्र की राजधानी सही अर्थों में शैतान का घर है।'' वह कहता है-''यदि तुम यहां रात्रि में सैर करना चाहो तो मौत के लिए तैयार रहो। घर से बाहर रात्रिभोज पर जाने से पूर्व अपनी वसीयत पर हस्ताक्षर कर दो।'' इसके विपरीत भारत के विषय में एरियन का स्पष्ट मत है कि ''प्रत्येक भारतीय स्वतंत्र है।'' लेफ्टिनेंट कर्नल मार्क विल्क्स भारत की प्रांतीय कार्यप्रणाली की विवेचना करते हुए लिखते हैं-''प्रत्येक हिंदू नगर अपने आप में एक विशिष्ट सामुदायिक संस्था या लोकतंत्र है और सदा से था।'' वे आगे कहते हैं- पूरे भारत मेें ऐसी ही बहुत सी स्वायत्त संस्थाओं के समूह के अतिरिक्त कुछ भी नही है।

जेम्स मिल मनुस्मृति जैसे प्राचीन भारतीय संविधानों की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं-''इन प्राचीन संविधानों एवं कानूनों की भावना के परीक्षण में हमें प्रजातांत्रिक जीवाणुओं की उपस्थिति का स्पष्ट संकेत मिलता है।''

चॉल्र्स मेटकॉफ ने लिखा है-''ग्राम सभाएं प्रजातंत्र का लघु रूप हैं और बिना किसी बाह्य सहायता के वे जो कुछ चाहते हैं करने में सक्षम हैं। जहां कोई और सफल नही हो पाता है वे वहां भी सफल होती हैं। एक राजवंश के बाद दूसरा धड़ाम से गिर जाता है, क्रांति के पश्चात क्रांति होती है और यद्यपि क्रमश: पठान मुगल, मराठा, सिख और ब्रिटिश, इस देश के स्वामी बने हैं, परंतु ग्रामसभा अपरिवर्तित ही रही। (कहने का अभिप्राय है कि ग्राम सभाओं के मौलिक स्वरूप में कोई विदेशी सत्ता भी किसी प्रकार का हस्तक्षेप नही कर पायी) प्रत्येक ग्राम सभा का संगठन अपने काम में छोटे से पूर्ण राज्य के रूप में हिन्दुओं की प्रसन्नता, स्वतंत्रता एवं प्रभुसत्ता का उच्चश्रेणी का स्रोत रहा है।''

भारत में पायी जाने वाली ग्रामसभाएं स्वायत्त शासी और आत्म निर्भर संस्थाएं होती थीं। एक गांव को अपनी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान या उपचार के लिए भी बाहर जाना नही पड़ता था, गांव में ही वैद्य होता था। वैद्य का कार्य घर-घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करना होता था। यह परंपरा अभी कुछ समय से ही भारत में छूटती जा रही है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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