नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-2

  • 2016-10-19 12:30:41.0
  • राकेश कुमार आर्य

नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-2

अवर अधिकारियों की नियुक्ति
मनु महाराज ने अपने संविधान में ग्राम प्रधान का उल्लेख किया है। जो कि उनके संविधान की विश्व को बहुत महत्वपूर्ण देन है। वह स्पष्ट कहते हैं :-
ग्रामस्याधिपति कुर्याद्दश ग्रामपति तथा।
विशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च।।
।। 115 ।। (89)

अर्थात ''एक-एक ग्राम में एक-एक 'प्रधान' पुरूष को रखे, उन्हीं दश के द्वारा ऊपर दूसरा, उन्हीं बीस ग्राम के ऊपर तीसरा, उन्हीं सौ ग्रामों के ऊपर चौथा और उन्हीं सहस्रग्रामों के ऊपर पांचवां पुरूष रखे। ''
अर्थात ''जैसे आजकल एक ग्राम में एक पटवारी उन्ही दशग्रामों में एक थाना और दो थानों पर एक बड़ा थाना और उन पांच थानों पर एक तहसील और दस तहसीलों पर एक जिला नियत किया गया है।''
।। 115 ।। (स.प्र.89)

महर्षि दयानंद जी महाराज ने अपने काल में इस श्लोक की जैसी व्याख्या की है कि इतने ग्रामों से एक थाना और फिर अंत में एक जिला बनता है, वह अंग्रेजों के शासनकाल की बातें हैं। आज जनसंख्या के बढऩे से जनसमस्याएं बढ़ी हैं। इसलिए स्वतंत्र भारत में इस व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन आ जाना स्वाभाविक है। कुल मिलाकर एक बात देखने की है कि स्थानीय शासन की रीति में भारत ने और इससे पूर्व अंग्रेजों ने और उनसे पूर्व मुगलों, तुर्कों आदि ने भी मनु महाराज की दी हुई व्यवस्था का ही अनुकरण किया है। मनु स्पष्ट कहते हैं कि यदि किसी ग्राम में कोई घटना या दुर्घटना होती है तो उसकी सूचना ऊपर तक निश्चित रूप से जानी चाहिए। जिससे कि किसी भी अप्रिय या अवांछित घटना के होने से पूर्व ही उस पर उचित कार्यवाही की जा सके। लोकतंत्र इसी प्रकार की शासकीय संवेदनशीलता से चला करता है। यदि शासन प्रशासन में ऐसी संवेदनशीलता का अभाव है तो लोकतंत्र की प्रक्रिया बाधित हो जाती है, या लोकतंत्र ऐसे समाज या देश में दम तोड़ जाता है।
मनु की व्यवस्था है :-
ग्राम दोषान्समुत्पन्नान्ग्रामिक शनकै स्वयम्।
शंसेद् ग्रामदशेशाय दशेश्मे विंशतीशिने।।
।। 116 ।। (90)
अर्थात ''इसी प्रकार प्रबंध करे और आज्ञा देवे कि वह एक-एक ग्रामों के पति, ग्रामों में नित्यप्रति जो जो दोष उत्पन्न हों, उन उनको गुप्तता से दश ग्राम के पति को विदित कर दे और वह दश ग्रामधिपति उसी प्रकार बीस ग्राम के स्वामी को, दशग्रामों का वर्तमान नित्यप्रति जना देवे।'' (स.प्र.153)

शासन को सुचारू रूप से चलाने की यह सहज और सरल प्रक्रिया है। इतनी पुरानी हमारी यह व्यवस्था विश्व के सभी देशों में फेेली और आज हम लगभग थोड़े बहुत परिवर्तन या परिवद्र्घन के साथ अपनी इसी शासन प्रणाली को विश्व में लागू हुआ देखते हैं। यह अलग बात है कि विश्व के देश हमारी व्यवस्था को अपनाकर भी उसे हमारी ना कहते हों। या हमें ऐसा आभास देते हों कि आपका आपके पास कुछ भी नहीं है। पर हमारी 'मनुस्मृति' और ऐसा ही अन्य उत्कृष्ट साहित्य हमें बता रहा है कि हमारे पास आज भी अपना इतना कुछ है कि उस पर हमें गर्व होना ही चाहिए। जो लोग 'मनुस्मृति', मनुवाद और मनुवादी व्यवस्था की आंख मूदकर आलोचना करते रहते हैं, वे तनिक यह भी विचार करें कि मनु को वे कहां-कहां से निकालेंगे? विशेषत: तब जब मनु सारे विश्व की राजकीय व्यवस्था के प्राण बनकर उसमें रचे बसे हों।

मनु महाराज की व्यवस्था है कि शासन की नीचे की कड़ी ऊपर की कड़ी से अपने आपको जुड़ी हुई अनुभव करे। इस व्यवस्था में इतनी पारदर्शिता हो कि ऊपर वाले को नीचे की अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति साफ दिखाई दे। मनु का कथन है :-
विशंतीस्तु तत्सर्व शतेशाय निवेदयत्।
शंसेद् ग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम्।।
।। 117 ।। (91)

''और बीस ग्रामों का अधिपति बीस ग्रामों के वर्तमान को अर्थात बीस ग्रामों की वर्तमान स्थिति की जानकारी शतग्रामधिपति को नित्यप्रति निवेदन करे, वैसे सौ सौ ग्रामों के पति आप अर्थात हजार ग्रामों के अधिपति को सौ-सौ ग्रामों के वर्तमान को प्रतिदिन जनाया करें।''
(स.प्र. 153)

प्राचीनकाल में सूचना के उतने त्वरित साधन नहीं थे, जितने आज हैं। परंतु सूचना को अतितीव्रता से ऊपर तक पहुंचाने के लिए मनु ने अपनी राज्य व्यवस्था में अच्छी प्रकार समाविष्ट किया है। इससे उत्तम कोई विधि या व्यवस्था कोई हो ही नहीं सकती थी कि एक ग्राम का प्रधान अपनी बात को दश ग्राम के स्वामी तक और दश ग्राम वाला उसे सौ ग्रामों के स्वामी तक पहुंचाए। इस प्रक्रिया को अपनाकर शासन प्रशासन के लोग अतितीव्रता से अथवा शीघ्रता से एक दूसरे के संपर्क में आ जाते थे। जिससे प्रशासनिक और शासकीय सामंजस्य को स्थापित करने में सुविधा हो जाती थी। हमारी प्राचीन राज्य व्यवस्था की सफलता का कारण यही था कि उसमें प्रशासनिक समन्वय था। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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