नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-1

  • 2016-10-18 11:00:06.0
  • राकेश कुमार आर्य

नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-1

जिन लोगों का ऐसा मानना है कि राज्यशक्ति के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया अंग्रेजों की देन है और इससे पूर्व भारत में शक्ति का एकमात्र केन्द्र राजा ही होता था-उन्हें भी अपनी भूल सुधार करनी चाहिए। प्राचीन भारत के विषय में ऐसे बहुत से प्रमाण मिलते हैं, जो यह सिद्घ करते हैं कि उस समय हमारी राज्य व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए विभिन्न राज्य कार्यालयों या नियंत्रण केन्द्रों की व्यवस्था की गयी थी।

हमारे देश में प्राचीनकाल में राजा के अभिषेक के अनंतर उसे वस्त्र दिये जाते थे। शतपथ ब्राह्मण (5 /3/5/20) से हमें पता चलता है कि राजा को उष्णीष (पगड़ी) भी इसी समय प्रदान की जाती थी। उसे प्रदान किये जाने वाले वस्त्र उस समय विशेष होते थे। शतपथ ब्राह्मण (5/3/5/27-29) से ही हमें पता चलता है कि वस्त्रों को धारण कर चुकने के उपरांत राजा को एक धनुष और तीन बाण प्रदान किये जाते थे। ये तीन बाण उस राजा की शक्ति का प्रतीक होते थे कि पृथिवी अंतरिक्ष और द्यौ: तीनों लोकों के क्षेत्र में रक्षा करने का तुम्हारा विशेष कत्र्तव्य तुम पर आरोपित कर उसके लिए आज यह पगड़ी बांधी जा रही है।

जिस देश में राज्यारोहण की इतनी उच्च और महान परंपरा हो उसमें स्वाभाविक है कि राज्य केन्द्र (राजधानी) से जोडऩे के लिए राज्य के विभिन्न केन्द्र अर्थात स्थानीय शासन-की भी कल्पना निश्चय ही कर ली गयी होगी। स्थानीय शासन के ये केन्द्र वास्तव में राजा की राज्य-व्यवस्था और उसकी पवित्र भावना के साथ राज्य रूपी शरीर के रोम-रोम को जोड़ देने का ही प्रयास होता था। जिससे कि राजकीय व्यवस्था की पवित्र भावना से कोई अंग-प्रत्यंग अछूता न रह जाए। इस व्यवस्था के लिए महर्षि मनु का कथन है:-
द्वयोस्त्रयाणां पंचानां मध्ये गुल्मयधिष्ठितम्।
तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम्।।
।। 114 ।। (88)

''दो-तीन और पांच ग्रामों के बीच में एक-एक नियंत्रण केन्द्र या उन्नत राज कार्यालय बनाये, इसी प्रकार सौ गांव तक कार्यालयों का निर्माण कराये और इस व्यवस्था के अनुसार राष्ट्र को सुव्यवस्थित सुरक्षित और वशीभूत रखे।''

'इसलिए दो-तीन, पांच और सौ गांव के बीच में एक राज स्थान रखके जिसमें यथायोग्यता भृत्य और कामदार आदि राजपुरूषों को रखकर सब राज्यों के कार्यों को पूर्ण करे।' (स.प्र.135)
स्पष्ट है कि शासन की शक्तियों के ये केन्द्र प्रजा के कष्टों को हरने के उद्देश्य से बनाये जाने की व्यवस्था की गयी थी। शासन प्रजा के द्वार जाए-यह लोकतंत्र की पहली शर्त है। यह प्रसन्नता की बात है कि भारत ही विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जो लोग तंत्र की इस शर्त पर खरा उतरता है। क्योंकि इस देश ने शासन की इस व्यवस्था को लागू करके समाज में समानता की स्थापना की थी। शेष विश्व जब कबीलों के संघर्षों में उलझा पड़ा था तब भारत में कबीलों की असभ्यता सूचक अपसंस्कृति ना होकर समतामूलक समाज की अत्यंत उत्कृष्ट और लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित हो चुकी थी। हमारे आज भी 'प्रशासन चला गांव की ओर' इस अभियान के अंतर्गत तहसील दिवसों का आयोजन किया जाता है, जिनमें किसानों की समस्याएं सुनी जाती हैं, और उनकी निराकरण किया जाता है। इसी बात को मनु अपनी 'मनुस्मृति' में कह रहे हैं।

हम यहां पर प्राचीनकाल में जनपद की स्थिति पर विचार करते हैं। जनपद प्राचीनकाल से ही शक्ति का एक नियंत्रण केन्द्र रहा है, अर्थात वहां से शासक वर्ग बड़ी सरलता से जनता पर अपना शासन चलाने की स्थिति में रहते थे। जनपद की यह स्थिति कैसी थी क्या थी, और क्या उसकी अनिवार्यता थी? अब यह विचारणीय है।

जनपद की स्थिति पर विचार करते हुए महामति चाणक्य ने कहा है कि उसे स्थानवान अर्थात पर्याप्त स्थान वाला होना चाहिए। जनपद के मध्य और सीमांतों पर पुर (नगर) होने चाहिएं। उसका क्षेत्रफल इतना अधिक हो कि अपनी जनता का और आपत्ति के समय बाह्य लोगों का भी पालन उसकी पैदावार से हो सके, जिसमें आत्मरक्षा के सभी साधन उपलब्ध हों, जो आत्मनिर्भर हों जो शत्रुओं का पराभव कर सके। जिससे सामंतों व पड़ोसी राजाओं को वश में रखने की क्षमता हो, जिसमें दलदलों, पत्थरों वाली, ऊसर, ऊंची-नीची और कांटों से भरी जमीन ना हो, जिसमें सांपों तथा जंगली पशुओं की प्रचुरता न हो, जो देखने में सुंदर हो, जिसमें कृषि योग्यभूमि, खानों और हाथियों और इमारती लकड़ी से पूर्ण जंगलों की प्रचुरता हो, जिसमें चरागाह हो जो सिंचाई के लिए केवल वर्षा पर निर्भर न करे, जिसमें स्थल और जलमार्गों की सत्ता हो जहां विविध प्रकार के पण्य पदार्थ उपलब्ध हों, जिसमें सेना और करों का बोझ उठाने की क्षमता हो, जिसके किसान कर्मशील हों, जिसके स्वामी और अवर वर्णों के लोग बुद्घिमान हों और जिसकी जनता राज्य के प्रति भक्ति रखने वाली और पवित्र आचरण रखने वाली हो।''

अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारत की शासन पद्घति और राजशास्त्र' में सत्यकेतु विद्यालंकार जी कौटिल्य की उपरोक्त व्यवस्था के विषय में लिखते हैं-''कौटिल्य ने यहां जनपद के जो गुण प्रतिपादित किये हैं, वे बड़े महत्व के हैं। उनमें जनपद की भूमि और वहां निवास करने वाली जनता दोनों के गुण आ गये हैं। जनपद की भूमिविस्तार में इतनी पर्याप्त होनी चाहिए कि जनता का पालन कर सके। विपत्ति के समय शरण लेने वाले विदेशी लोग भी उससे अपना निर्वाह कर सकें, शत्रुओं से रक्षा के भी साधन उसमें हों। खेत, चरागाह, जंगलखाने, जल और स्थल मार्ग, सिंचाई के लिए नहरें तथा कुएं आदि सब उसमें हों, और उसकी जलवायु भी उत्तम हो। जनता के गुणों में किसानों की कर्मशीलता उच्च और अधम सब वर्णों के लोगों में बुद्घि का होना, राजसंस्था के प्रति भक्ति और शुचिता-ये गुण कौटिल्य के अनुसार आवश्यक हैं।''
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.