नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-5

  • 2016-10-22 09:30:51.0
  • राकेश कुमार आर्य

नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-5

राबर्ट्सन ने रही सही कसर पूरी कर दी है। उनका कथन है-''हिन्दू विधि के विचार बिंदुओं की संख्या एवं विविधता के विचार से, इसकी तुलना जस्टिनियन के विश्व प्रसिद्घ विधि संग्रह अथवा विश्व के सर्वाधिक सभ्य देशों की न्याय व्यवस्थाओं से की जा सकती है। हिन्दू विधि की धाराओं को अत्यंत स्वाभाविक एवं प्राञ्जल क्रम में व्यवस्थित किया गया है। वे बहुसंख्यक तथा सुबोध हैं तथा उनका अनुसंधान ऐसे सूक्ष्म अवधान एवं समझ के साथ हुआ है जो उन व्यक्तियों के लिए ही संभव है-जो अपने ज्ञान की तीक्ष्णता एवं प्रखरता के लिए प्रसिद्घ हैं, जिन्हें न्यायिक प्रक्रियाओं की विशुद्घता का दीर्घ अनुभव है, तथा जो विधि के अभ्यास की बारीकियों से भली प्रकार परिचित हैं। प्रत्येक बिंदु पर दिया गया निर्णय न्याय के अपरिवर्तनीय निर्विकार सिद्घांतों पर आधारित है, जिसे मानव मस्तिष्क ने प्रत्येक काल एवं विश्व के प्रत्येक भाग में आदर दिया गया है। जो कोई भी इसे परखेगा उसे न्याय के कार्य में रत लोगों के विधिशास्त्र के ज्ञान के विषय में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं रहेगा। जो कोई भी किसी भी शीर्षक के अंतर्गत दिये गये विवरण की गहराई में जाएगा, वह उसकी सूक्ष्मता एवं सुंदरता को देखकर सोचेगा कि इतनी गहराई तक तो यूरोप की विधायिका ने भी विचार नहीं किया है, और यह बात सराहनीय है कि कितने ही प्राविधान तो इतने महान हैं कि आश्चर्य होता है कि इतने प्राचीन काल में भी ऐसी सुंदर व्यवस्था थी।''


वैदिक संस्कृति की ओर झुकता पश्चिम
राबटर््सन ने स्पष्ट कर दिया है कि हमारे आदि संविधान अर्थात मनुस्मृति के कई प्राविधान तो इतने उत्तम हैं कि उन जैसी व्यवस्था पर पश्चिम की किसी विधायिका ने कल्पना तक नहीं की है। उन्हें इस बात पर भी आश्चर्य है कि भारत में इतने प्राचीन काल में भी इतनी सुंदर व्यवस्था कार्यरत थी? हमारा मानना है कि यूरोप राबर्ट्सन की बात पर जैसे-जैसे विचार करेगा वैसे-वैसे ही हिंदुत्व के प्रति श्रद्घानत होकर ईसाइयत से अपना मुंह मोड़ता जाएगा। ईसाइयत की असलियत जैसे-जैसे पश्चिमी जगत के मन मस्तिष्क में आती जा रही है वैसे-वैसे ही लोग चर्च से दूर होते जा रहे हैं-यह निष्कर्ष अभी कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में छपा है। जिसमें कहा गया है कि यूरोप के अधिकांश चर्चों में अब लोग बहुत कम संख्या में जाने लगे हैं, इतना ही नहीं कितने ही चर्च तो ऐसे हो गये हैं जो बेच दिये गये हैं या जिनमें अब केवल दुकानदारी चल रही है। इसके स्थान पर लोगों का झुकाव हिंदू वैदिक धर्म की ओर बढ़ा है। ऐसे में कितना उत्तम रहेगा कि हम भारतीय अपने मनु को, अपने मनुवाद को और अपनी मनुस्मृति को वास्तविक अर्थों में समझें। जब विदेशों का झुकाव हमारी संस्कृति की ओर हो रहा हो, तब तो यह और भी उचित है कि हम अपने आपको समझें और जानें।

मि. मिल को मिला करारा उत्तर
एक विदेशी विद्वान मि. मिल हुए हैं, जिन्होंने कह दिया कि ''हिंदू विधि का वर्गीकरण तथा अनुक्रम अभद्र है, और इस राष्ट्र की बर्बरता को प्रदर्शित करता है।'' मि. मिल की यह अशोभनीय टिप्पणी प्रो. विल्सन को सहन नहीं हुई तो उन्होंने कह दिया कि-''इस परीक्षण में वर्गीकरण का जो प्रयत्न किया गया है उसके फलस्वरूप भारतीय सभ्यता अंग्रेजों की अपेक्षा उच्चतर स्तर पर पहुंच जाएगी।''
मि. मिल हिंदूधर्म और विधि की समीक्षा करते हुए उसे घोर उद्दण्डता अज्ञान एवं मूर्खता का पुलिंदा बताते हैं। प्रो. विल्सन जो कि मिल के 'भारत का इतिहास' नामक ग्रंथ के संपादक हैं, इस विषय में भी स्पष्ट कर देते हैं-''हिन्दू धर्म तथा विधि की सह समीक्षा गंभीर दोषों से पूर्ण है तथा चिरकालीन पूर्वाग्रहों तथा अधूरे ज्ञान का परिणाम है।''

इसका अभिप्राय था कि मि. मिल ने भारत की संस्कृति का गंभीरता से अध्ययन नहीं किया और ऊपरी तौर से भारत को समझकर उसके विषय में उन्होंने लिख दिया। इस पर प्रो. विल्सन ने उन्हें स्पष्ट किया कि भारत को गहराई से समझे बिना भारत पर कुछ लिखना पाप होगा। भारत का आर्ष साहित्य और प्राचीन वांग्मय व भारत की आर्य भाषा-संस्कृत जब तक न समझी जाएगी तब तक भारत को समझना कठिन है। इतना ही नहीं भारत की मूल वैदिक संस्कृति के उत्कृष्टतम साहित्य में जो मिलावट की गयी है-जब तक उस मिलावट को नीर-क्षीर विवेक शक्ति के आधार पर अलग-अलग नहीं कर दिया जाएगा -तब तक भी भारत को समझना असंभव होगा।

मि. मिल ने भारतीय संस्कृति की आलोचना को अपना लक्ष्य बनाया तो प्रो. विल्सन ने मि. मिल को ही धो डाला। उन्होंने मिल की अनिष्टकारी पुस्तक के विषय में लिखा-''सर विलियम जोंस द्वारा भारतीयों की उत्कृष्टता और उनकी सभ्यता की प्रगति, उनके ज्ञान एवं विज्ञान, उनकी प्रतिभा एवं उत्तम चारित्र्य के अत्यंत स्नेह एवं उत्साहपूर्वक किये गये वर्णन से चिढक़र मिल ने भी उतने ही उत्साहपूर्वक किंंतु एक दुष्टतापूर्ण उद्देश्य से उनकी चुनौती को स्वीकार करते हुए उन्हें उनके स्तर से उतना ही नीचे गिराने का यत्न किया है जितना उनके प्रशंसकों ने पहले उन्हें ऊंचाई पर पहुंचाया था। विषयवस्तु के अपूर्ण एवं दोषपूर्ण ज्ञान के आधार पर उसने हिंदुओं के विरूद्घ विषवमन करते हुए उनका चरित्र चित्रण इस प्रकार किया है-जिसका हिंदू चरित्र से तनिक भी साम्य नहीं है और जो मानवता के लिए अत्यंत अपमानजनक है।''

डा. जी. बुहलर ने 'पूर्व की पवित्र पुस्तकें' श्रंखला के 25वें खण्ड का अनुवाद किया। इस श्रंखला का संपादन प्रो. मैक्समूलर ने किया था। 'द सैकरेड बुक्स ऑफ द ईस्ट' की इस श्रंखला में मनुस्मृति को भी सम्मिलित किया गया है। जिससे इस पवित्र विधान की उत्तमता और उत्कृष्टता का पता चलता है। कैलूका के मनु पर किये गये भाष्य के विषय में सर डब्ल्यू सर्वाधिक सुबोध, सर्वाधिक आडंबरहीन, फिर भी सर्वाधिक विद्वत्तापूर्ण, सर्वाधिक गहन फिर भी सर्वाधिक स्वीकार्य भाष्य है, जो कभी भी किसी भी लेखक (प्राचीन, आधुनिक, यूरोपियन या एशियाई) के विषय में लिखा गया हो।'' हमें गर्व है कि हम उस मनु की संतानें हैं जिनकी विद्वत्ता का लोहा विश्व मानता है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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