नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-4

  • 2016-10-21 09:30:56.0
  • राकेश कुमार आर्य

नियंत्रण केन्द्रों का निर्माण, भाग-4

सुशासन के लक्षण
पुराने समय में लोग वैद्य के पास नही जाते थे -अपितु वैद्य ही रोगियों के पास जाता था। जिससे बड़े अस्पतालों की आवश्यकता नही पड़ती थी। यही स्थिति गुरूकुलों की थी। आचार्य लोग भी स्वयं चलकर गांवों में जाकर गुरूकुलों की स्थापना कर लेते थे। जिससे ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति की सुविधा लोगों को मिलती थी। गांव का पानी गांव के तालाबों में भरा रहता था। कुएं कम ही खोदे जाते थे, तालाबों से ही लोग खेती को पानी देते थे। कुएं अधिक न होने के कारण भूगर्भीय जल संरक्षण बना रहता था। जिससे लोगों को पानी या भोजन के लिए भी दूसरों पर निर्भर नहीं होना पड़ता था। कंदमूल, सब्जी, दूध, फलादि सब एक गांव में उपलब्ध रहते थे। किसी भी शासन की सबसे छोटी ईकाई की समृद्घि का पता इसी बात से लगा करता है कि वइ ईकाई अपनी किसी आवश्यकता के लिए परमुखापेक्षी तो नहीं है।

अंग्रेजों ने उजाड़ दी व्यवस्था
अंग्रेजों ने मनु प्रतिपादित इस राज्य व्यवस्था को उजाडऩे के लिए गांवों की न्याय प्रणाली को छेडऩा आरंभ किया और उन्होंने यह अनिवार्य शर्त लगा दी कि भारतवासियों को अपने वादों का निस्तारण हमसे ही कराना होगा। हमारी शिक्षा प्रणाली को अपनाना होगा, हमारी चिकित्सा प्रणाली को अपनाना होगा इत्यादि। भारत के लोगों ने हर विदेशी संस्थान या शासनादेश का उल्लंघन किया। बदले में अंग्रेज उन्हें मूर्ख, अशिक्षित (हमारे गुरूकुलों में पढ़े लिखों को तो अंग्रेज पढ़ा लिखा ही नही मानते थे, और गुरूकुलों या सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों को पढ़ा-लिखा न मानने की यह प्रवृत्ति हमारे भीतर आज भी देखी जा सकती है), आदि कहते थे। पर उन कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मनु की व्यवस्था देश के देहात में न्याय करती रही, शिक्षा देती रही व स्वास्थ्य लाभ देती रही। इस काल में कुछ निहित स्वार्थी लोगों ने मनुस्मृति में मनमाने संशोधन परिवर्तन भी किये, और उसे विकृति व मिलावट का अड्डा बनाकर रख दिया।

मनु की महानता और विदेशी विद्वान
इसके उपरांत भी मनु की महानता की विदेशी विद्वानों तक ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। सर डब्ल्यू जोंस का कहना है-''मनु के विधान संभवत: सोलन, बल्कि यहां तक कि लाइकर्गस से भी अधिक प्राचीन हैं, यद्यपि उनकी घोषणा की तिथि, जबकि वे लिपिबद्घ भी नहीं हुए थे शायद मिस्र और भारत में प्रथम राज्यतंत्र की स्थापना के समकालीन वर्षों में रही होगी।''
सर डब्ल्यू जोंस मनु की राज्यतंत्र प्रणाली को विश्व की प्राचीनतम प्रणाली मान रहे हैं। जिससे स्पष्ट है कि संपूर्ण विश्व को मनु का ऋणी माना जाना चाहिए। क्योंकि जब संपूर्ण विश्व अज्ञानांधकार में भटक रहा था और वह राजनीति का क, ख, ग भी नहीं जानता था, तब भारत में एक अच्छी राज्य व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। भारत से राजनीति का ज्ञान ग्रीस ने और ग्रीस से रोमन ने लिया। कालांतर में रोमन वालों से यह ज्ञान अंग्रेजों ने लिया और हम हैं कि आज बड़े गर्व से कह देते हैं कि हमें यह ज्ञान अंग्रेजों से मिला। हम भूल जाते हैं कि ज्ञानार्जन के विषय में यदि ग्रीस हमारा पुत्र है और रोमन पौत्र है तो अंग्रेज जाति हमारी प्रपौत्र है।

सर डब्ल्यू जोंस का कहना है-''यद्यपि मनु कभी भी क्रींट में नहीं रहे, फिर भी उनकी अनेक बातें उस द्वीप में (आज भी) स्वीकार्य हैं, जहां से एक या दो शताब्दी बाद लाइकर्गस उन्हें स्पार्टा में लाये।
'द बाईबिल इन इंडिया' की स्पष्ट घोषणा है कि मिस्री, फारसी, ग्रीक एवं रोमन विधियों का आधार मनुस्मृति ही थी और आज भी यूरोप में प्रतिदिन मनुस्मृति के प्रभाव को अनुभव किया जा रहा है।''
कहना ना होगा कि यूरोप के पास आज भी जितना राजनीतिक अनुभव है, वह सारा का सारा मनुस्मृति की देन है। जिसको हम जितना ही समझेंगे उतना ही उसमें से हमें मनुवाद झांकता दिखाई दे जाएगा। पश्चिम के विद्वानों ने मनुस्मृति की व्यवस्थाओं की या धाराओं की या श्लोकों की मुक्तमण्ठ से प्रशंसा की है। उन्होंने मनुस्मृति की वैज्ञानिक भाषा को भी सराहा है और उसकी वैयाकरणिक उच्चता का लोहा माना है। कोलमैन का कहना है:-
''मनु की पद्घति में एक आडंबर हीन तेजस्विता है, जिसकी भाषा विधिसम्मत है, और उसके प्रति एक आदर का भाव स्वत: ही उत्पन्न होता है। ईश्वर के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियों की स्वतंत्रता का भाव तथा राजा सहित सभी के लिए कठोर कानूनों की व्यवस्था वास्तव में श्रेष्ठ है।''

मनु की व्यवस्था बनाती है-विश्व मानस का धनी
व्यक्ति को राष्ट्रीय चरित्र से ओतप्रोत कर विश्व मानस का धनी बनाने वाली है, जिससे संपूर्ण मानवता लाभान्वित हो, व्यक्ति तो क्या जिससे संपूर्ण मानवता लाभान्वित हो, व्यक्ति का अपना चरित्र और चिंतन किसी प्रकार के प्रदूषण से ग्रस्त ना हो, उसके चिंतन में उच्चता हो, पवित्रता हो और संपूर्ण मानवता का कल्याण करने की उत्कृष्ट भावना हो। कदाचित मनुस्मृति का यह भाव ही रहा जिसने विदेशियों को भी इस महामानव के सामने नतमस्तक किया। जिस तथ्य को हमने इस लेख माला के प्रारंभ में ही उठाया था कि विश्व का प्रत्येक संविधान अपने शासक वर्ग को सजा देने में उदार है, या अपने शासक वर्ग को सजा देता ही नहीं है, जबकि मनु अपने राजा के प्रति भी कठोर हंै। मनु की इस उत्कृष्ट बात को कोलमैन ने समझा और उसे (उक्त उद्घरण में) यह कहकर महिमामंडित किया कि-''राजा सहित सभी के लिए कठोर कानूनों की व्यवस्था वास्तव में श्रेष्ठ है।'' क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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