कर ग्रहण, राष्ट्र निर्माण और विदेश नीति-3

  • 2016-11-26 06:00:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

महर्षि मनु ने संघर्ष करके या खून बहाकर बहुत से कबीलों को अपने साथ लेने का कोई कार्य नहीं किया, उन्होंने जो कुछ भी किया सात्विक परिवेश में सात्विक भावना के साथ किया और एक सात्विक शांतिप्रिय राष्ट्र का निर्माण किया। जिन लोगों ने खून बहाकर राष्ट्रों के निर्माण किये हैं-उनके राष्ट्र मानवता का लाभ नहीं कर पाए, पर भारत ने पहले दिन से मानवता का भला करने का बीड़ा उठाया और आज तक कर रहा है, इसमें मनु की राष्ट्र साधना का बहुत बड़ा योगदान है। जिसे हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा। यदि हम किसी पूर्वाग्रह से इस सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो अलग बात है अन्यथा भारत को एक राष्ट्र की परिकल्पना में बांधने में मनु का सहयोग अविस्मरणीय है।

अपने राष्ट्रनिर्माण के महान कार्य को पूर्ण करने के लिए मनु ने वर्णव्यवस्था की स्थापना की। जिसमें 'सबका साथ और सबका विकास' होना संभव था। डा. अंबेडकर भी वर्णव्यवस्था को बुरा नहीं मानते थे। उन्होंने कहा है-''जाति का आधार मूल सिद्घांत वर्ण के आधार पर मूल सिद्घांत के मूलरूप से भिन्न है न केवल मूल रूप से भिन्न है बल्कि मूलरूप से परस्पर विरोधी है। पहला सिद्घांत गुण पर आधारित है।....वर्णव्यवस्था की स्थापना के लिए पहले जाति प्रथा को समाप्त करना होगा।'' ('जाति प्रथा उन्मूलन' संपूर्ण वांग्मय, खण्ड 1 पृष्ठ 81)।
डा. अंबेडकर इस बात से भी सहमत थे कि स्वामी दयानंद जी महाराज ने वर्ण की जैसी परिभाषा की है वह बुद्घिमत्तापूर्ण है। इस पर उनका कथन है कि-''मैं मानता हूं कि स्वामी दयानंद व कुछ अन्य लोगों ने वर्ण के वैदिक सिद्घांत की जो व्याख्या की है वह बुद्घिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। मैं यह व्याख्या नहीं मानता कि जन्म किसी व्यक्ति का समाज में स्थान निश्चित करने का निर्धारक तत्व है। वह केवल योग्यता को मान्यता देता है।''
(जाति प्रथा उन्मूलन पृष्ठ 119)
प्रधान आमात्य को राजसभा का कार्य सौंपना
मनु महाराज ने बड़ी सूक्ष्मता से शासन प्रशासन की बारीकियों का उल्लेख किया है, यदि राजा रूग्ण हो जाए तो ऐसी स्थिति में राजकार्य कौन संभालेगा? इस व्यावहारिक समस्या का समाधान भी उन्होंने अपने विधान में किया है। वह कहते हैं-
अमात्यमुख्यं धर्मज्ञंप्रज्ञंदान्तं कुलोद्गतम्।
स्थापयेदासने तस्मिन्खिन्न: कार्येक्षणेनृणाम्।।
।। 141।। (108)
अर्थात ''प्रजा के कार्यों की देखभाल करने में रूग्णता आदि के कारण अशक्त होने पर उस अपने आसन पर न्यायकारी धर्मज्ञाता बुद्घिमान, जितेन्द्रिय, कुलीन सबसे प्रधान अमात्य=मंत्री को बिठा देवे अर्थात रूग्णावस्था में प्रधान अमात्य को अपने स्थान पर राजकार्य संपादन के लिए नियुक्त करे।''
प्रधानमंत्री यदि विदेश दौरे पर है या रूग्णावस्था के कारण कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता करने में असमर्थ है तो ऐसी स्थिति में कैबिनेट की बैठक उनके मंत्रिमंडल का वरिष्ठतम सदस्य या मंत्री ही करता है। स्पष्टत: यह व्यवस्था विश्व को मनु की ही देन है।
राजा प्रजा के कष्टों को सुने
मनु का विधान है कि राजा जब अपनी सभा में पहुंचे तो वहां सर्वप्रथम अपनी प्रजा के कष्टों को सुने और उनका निवारण करे। सप्तम अध्याय के श्लोक संख्या 146 में इस व्यवस्था का प्राविधान करते हुए मनु कहते हैं कि राजा को सभा में जाकर अपनी प्रजा के कष्ट निवारण हेतु बैठकर या खड़े होकर वहां आयी हुई सब प्रजाओं की समस्याओं, कष्टों का संतुष्टिकरण समाधान कर उन्हें प्रसन्न करके भेज देना चाहिए।
आजकल भी हमारे जनप्रतिनिधि और मंत्री जनसमस्याओं का समाधान करने के लिए 'दरबार' लगाते हैं। निश्चित रूप से वे ऐसा करते हुए मनुवादी व्यवस्था का ही पालन करते हैं, परंतु आज लोकतंत्र होते हुए भी दरबार लगाने की यह परंपरा केवल औपचारिकता सी बनकर रह गयी है। दलगत राजनीति के चलते जनप्रतिनिधि या मंत्री सर्वप्रथम अपने दल के कार्यकत्र्ताओं की बात को ही सुनते हैं। उसके पश्चात अपने मतदाता या समर्थक की बात को सुनते हैं और तीसरे स्थान पर ऐसे दलों के कार्यकत्र्ता या नेता की बात को सुनते हैं जो पिछले चुनाव में उनके साथ थे और जिनसे उन्हें लाभ मिला था, चौथे स्थान पर जनता के सामाजिक संगठनों की बात को सुना जाता है, जिनके नाराज होने से किसी वर्ग या समुदाय के हाथ से निकल जाने का भय हमारे जनप्रतिनिधियों या मंत्रीजी को होता है। तब कहीं पांचवें स्थान पर प्रजा की बात सुनने का नंबर आता है। इस प्रक्रिया के कारण लोकतंत्र के इन 'राजतंत्रीय दरबारों' से लोग अपनी समस्याओं का समाधान लेकर या संतुष्ट होकर वापस नहीं आते, अपितु वह कष्ट अनुभव करते हुए और इस कष्टदायी व्यवस्था को कोसते हुए वापस आते हैं। इसे व्यवस्थाओं में घुन की स्थिति कहा जाता है। जिस पर सरकारों को विचार करना ही चाहिए। क्योंकि इस व्यवस्था ने सात्विक और पक्षपातशून्य बुद्घि का सर्वथा अभाव होता जा रहा है।
क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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