कर ग्रहण, राष्ट्र निर्माण और विदेश नीति-2

  • 2016-11-18 06:00:45.0
  • राकेश कुमार आर्य

''राज्य में व्यापार से जीविका करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से राजा जो कुछ भी वार्षिक कर के रूप में निर्धारित होता है, वह भाग राज्य के लिए दिलवाये अर्थात ग्रहण करे।''
।। 137 ।।
''अतिलोभ से अपने और दूसरों के सुख के मूल को उच्छिन्न अर्थात नष्ट कभी न करे, क्योंकि जो व्यवहार और सुख के मूल का छेदन करता है, वह अपने और उनको पीड़ा ही देता है।''
।। 139 ।। (स.प्र. 156)
जो महीपति कार्य को देखकर तीक्ष्ण और कोमल भी होवे, वह दुष्टों पर तीक्ष्ण और श्रेष्ठों पर कोमल रहने से अतिमाननीय होता है।
।। 140 ।। (स.प्र. 156)
आदि राष्ट्र निर्माता मनु
कुछ अज्ञानी जन मनु को जाति-व्यवस्था का जनक मानकर भारत में एक राष्ट्रात्मा को ही स्वीकार नहीं करते हैं। उन्होंने जातियों की दीवारों को इतना ऊंचा कर लिया है कि वे एक जाति से दूसरी जाति में झांकने तक को भी तैयार नहीं हैं। वास्तव में वे लोग स्वयं तंग दीवारों में कैद हंै जिससे निकलना भी चाहते हैं, पर अपनी स्थिति के लिए मनु को कोसते हैं। ऐसे लोगों को ठंडे दिमाग से मनु को समझने का प्रयास करना चाहिए। इस देश में मनु आदि राष्ट्र निर्माता रहे हैं और उन्हें इसी रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
कहा गया है-
''मात्स्यन्यायाभिभूता: प्रजा: मनुंवैवस्वतं राजानं चक्रिरे। धान्य षडभागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्रकल्पयामासु:। तेन भृता: राजान: प्रजानां योगक्षमवहा। तेषां किल्विषं दण्डकरा हरिन्त, योगक्षेमवहाश्च प्रजानाम्।।''
(प्रक. 8/अ. 12)
अर्थात-''जैसे बड़ी मछली छोटी और निर्बल मछली को खा जाती है, इसी प्रकार बलवान लोगों ने निर्बलों का जीना मुश्किल कर दिया। इस अन्याय (अराजकता पूर्ण अराष्ट्रीय भावना की स्थिति) से पीडि़त हुई प्रजाओं ने अपनी सुरक्षा और कल्याण के लिए विवस्वान के पुत्र मनु को अपना राजा नियुक्त किया (राष्ट्र निर्माण का उत्तर दायित्व उन्हें सौंपा गया) और तभी से प्रजाओं ने अपनी खेती की उपज का छठा भाग, व्यापार की आय का दसवां भाग तथा कुछ स्वर्ण राजा को कर के रूप में देना निश्चित किया। इस कर को पाकर राजाओं ने प्रजाओं की सुरक्षा और कल्याण की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इस प्रकार ये निर्धारित 'कर' और 'दण्ड' व्यवस्थाएं प्रजाओं के कष्टों को निवारण करने और उनका कल्याण करने में सहायक सिद्घ होती है।''
(विशुद्घ मनुस्मृति, पृ. 335)
तनिक ध्यान करें कि जब न तो राज्य था और ना राजा था तब केवल धर्म का शासन चलता था। लोग स्वाभाविक रूप से नीति और न्याय की विधि का, मर्यादाओं का, नैतिकता की व्यवस्था का स्वेच्छा से पालन करते थे, अर्थात धर्मानुसार आचरण करते थे। तब कुछ दुष्ट प्रजोत्पीडक़ लोगों ने अपनी राक्षसवृत्ति से भले लोगों का जीना कठिन कर दिया।
ऐसी स्थिति में कितनी देर विवेकशील ऋषि लोगों में यह चिंतन चला होगा कि इस अन्यायपूर्ण अराजक स्थिति से पार पाने के लिए किसी 'राजा' का चयन किया जाए और उस राजा को अपने धर्म का पालन करने के लिए एक व्यवस्था विकसित की जाए। उस व्यवस्था की स्थापना के लिए इन सभी बातों पर चिंतन चला कि राष्ट्र की दुर्दशा को सुधारने के लिए न्यायव्यवस्था, दण्डव्यवस्था, राज्यव्यवस्था, समाज व्यवस्था आदि को किस प्रकार संचालित किया जाए? तब इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए मनु को चयनित किया गया। उनके साथ उस अराजक राष्ट्र के बहुसंख्यक विद्वानों, ऋषियों, महामनीषियों का आशीर्वाद और सहयोग प्राप्त था। जनता उनके साथ थी और जनता भी चाहती थी कि सार्वजनिक कार्य यथा-सडक़, गुरूकुल स्वास्थ्य आदि के लिए कुछ ऐसे व्यक्ति चयनित हों जो स्वेच्छा से अपना जीवन समर्पित करने को उद्यत हों और जिन्हें कर के रूप में ऐसी स्थायी आर्थिक सहायता दी जाए जिससे कि वह अपना स्थायी कोष बनाकर उससे अपना राजकार्य प्रारंभ करें। तब मनु ने उस समय राष्ट्र निर्माण का महती दायित्व संभाला और राक्षस वृत्ति के लोगों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अपना विधि-विधान तैयार किया। मनु के पास पूर्ववर्ती किसी राजा का संविधान नहीं था, ना ही किन्हीं अन्य देशों के संविधान थे, जिन्हें पढक़र वे उनकी बातों का या प्राविधानों का अध्ययन कर उसे अपने लिए ग्रहण कर लेते और उधारी मनीषा से एक संविधान तैयार कर लेते। उन्होंने जो कुछ भी किया वह अपनी सोच से किया और अपने विवेक से किया। इतने उत्तम ढंग से किया कि यह देश उनकी व्यवस्था से युग-युगों तक शासित एवं अनुशासित रहा। क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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