कर ग्रहण, राष्ट्र निर्माण और विदेश नीति

  • 2016-11-11 12:30:47.0
  • राकेश कुमार आर्य

कर ग्रहण, राष्ट्र निर्माण और विदेश नीति

महर्षि मनु विश्व के प्रथम राजा थे। उनके साथ आर्यावर्त का प्रथम राजा होने का गौरवमयी खिताब लगा होने से उनका और उनकी मनुस्मृति का और भी अधिक महत्व बढ़ जाता है। यह कितनी बड़ी बात है कि सृष्टि का पहला राजा मनु और पहला राजा होकर भी स्वयं अपने लिए संविधान बना रहा है कि मुझे शासन कैसे करना है और यदि मैं भी कहीं चूक करता हूं तो प्रजा को मुझसे भी निपटने का कैसे अधिकार होगा? हमारे लिए यह सचमुच गर्व और गौरव का विषय है कि जिस समय संविधान के विषय में कोई नहीं जानता था कि यह क्या होता है-उस समय आर्यावर्त के इस महान मनीषी ने अपनी 'मनुस्मृति' की रचना कर शेष विश्व के सामने आदर्श स्थापित किया कि हे संसार के लोगों! आप आज या कभी भविष्य में जब भी अपना संविधान बनाओ तो उसमें ऐसी व्यवस्था करना कि राजा भी अपराध करने पर बिना दण्ड के बच न सके। अपने न्याय और विधान को सदा ही न्यायसंगत और धर्मसंगत रखना-जिससे कि कोई भी व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय प्राप्त करने से वंचित ना रह सके।


मनु की कर ग्रहण संबंधी व्यवस्थाएं
महर्षि मनु ने अपनी राज्यव्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए अपनी कर ग्रहण संबंधी व्यवस्थाओं का बड़ा विवेकपूर्ण प्रतिपादन किया था। उनका यह विवेकपूर्ण प्रतिपादन आज के संसार के लिए भी आदर्श हो सकता है। कई मामलों में आज की कर ग्रहण प्रणाली बड़ी ही निर्मम है। बड़ा दुख होता है जब एक किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। कई बार ऐसा होता है कि एक किसान अपनी फसल को (विशेषत: सब्जियों को) अपने घर से बाजार तक ले जाकर पटकता है तो उसे उसका इतना मूल्य भी नहीं मिलता जितना उससे उस फसल को मंडी तक ले जाने का किराया ले लिया जाता है। अब उसका उत्पादन मूल्य या लागत मूल्य अलग रहा। ऐसी परिस्थितियों में हमारा किसान आत्महत्या कर रहा है। क्या ही अच्छा होता कि हमारा संविधान इस दिशा में कोई स्पष्ट प्राविधान करता कि किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य सरकार हर स्थिति में दिलाएगी। संविधान इस विषय पर मौन है। पर आदि व्यवस्थापक महर्षि मनु का संविधान इस पर मौन नहीं है, उसने तो व्यापारी के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था की है :-
''क्रय-विक्रय भोजन तथा मार्ग की दूरी आदि, भरण-पोषण का व्यय और लाभ, वस्तु की प्राप्ति एवं सुरक्षा व जनकल्याण इन सब बातों पर विचार करके राजा को व्यापारी से कर लेना चाहिए।''
जहां तक कृषि करने वाले किसानों की बात है तो किसान से उसकी उपज का छठा भाग लेने की व्यवस्था विवस्वान के पुत्र मनु को अपना राजा बनाते समय ही किसानों ने निश्चित कर दी थी। पर यह निर्धारित धनराशि किसान ही देगा। यह भी कितनी बड़ी ईमानदारी का प्रमाण है कि किसान ही अपने ऊपर लगने वाला कर का निर्धारण करें और अपने आप ही उसका फिर भुगतान करें। यदि फसल मर जाए या ओलावृष्टि से क्षतिग्रस्त हो जाए तो कोई कर देना नही पड़ता था। आज भी ऐसी स्थिति में सरकार किसानों को मुआवजा (नाम मात्र का) देने की घोषणा करती है।
मनु आगे कहते हैं -''जैसे राजा तथा कर्मों का कत्र्ता राजपुरूष व प्रजाजन सुखरूप फल से युक्त होवे वैसे विचार करके राजा तथा राज्यसभा राज्य में कर स्थापन करे।'' ।। 128 ।। (स.प्र. 156)
''जैसे जोंक, बछड़ा और भंवरा थोड़े-थोड़े भोग्य पदार्थ को ग्रहण करते हैं, वैसे राजा प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर लेवे।''
।। 129 ।। (स.प्र. 156)
राजा के कर लेने की मनु प्रतिपादित राज्यव्यवस्था पर हम पूर्व में ही प्रकाश डाल चुके हैं इसलिए यहां उस पर पुन: प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं है। महर्षि दयानंद जी महाराज ने 'सत्यार्थप्रकाश' में तत्संबंधी श्लोकों की जो व्याख्या की है हम पाठकों की सेवा में केवल उन्हें ही उल्लेखित कर रहे हैं।
मनु महाराज का कथन है :-''जो व्यापार करने वाले वा शिल्पी को सुवर्ण और चांदी का जितना लाभ हो सके उसमें से पचासवां भाग, चावल आदि अन्नों में छठा आठवां वा बारहवां भाग लिया करें और जो धन लेवे तो भी उसी प्रकार से लेवे कि जिससे किसान खाने पीने और धन से रहित होकर दुख न पावें ।''
।। 130 ।। (स.प्र. 165)
'गोंद, मधु, घी और गंध, औषधि रस तथा फूल, मूल और फल, इनका छठा भाग कर में लेवे।' ।
(स.प्र. 131)
''और वृक्षपत्र, शाक, तृण, चमड़ा, बांस निर्मित वस्तुएं, मिट्टी के बने बर्तन और सब प्रकार के पत्थर से निर्मित पदार्थ इनका भी छठा भाग कर के रूप में लेवे।'' (स.प्र. 132) क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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