भारतीय पर्वों का वैज्ञानिक स्वरूप

  • 2015-11-11 14:30:06.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत पर्वों का देश है। यहां का प्रत्येक पर्व किसी न किसी वैज्ञानिक धारणा पर या मान्यता पर आधारित होता है, यदि हम अपने पर्वों की वैज्ञानिकता पर विचार करें तो अपने ऋषि पूर्वजों के समक्ष हमारा मस्तक अपने आप ही झुक जाएगा। क्योंकि प्रत्येक पर्व के पीछे कोई न कोई ऐसी विशेष घटना जुड़ी होती है जो हमें अपने गौरवपूर्ण अतीत की झांकी भी प्रस्तुत करा देती है।

दीपावली से पूर्व धनतेरस का पर्व आता है और उससे अगले दिन नरक चतुर्दशी का पर्व आता है। धनतेरस के दिन लोग नये पात्र क्रय करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि सुरासुर संग्राम में जब तेरह रत्न निकल चुके थे तब 14वां अमृत कलश लेकर स्वयं धनवंतरि प्रकट हुए थे। इसलिए इसे धनवंतरि त्रयोदशी भी कहा जाता है।

इस कहानी में कितना सत्य है यह तो ज्ञात नही, किंतु इसमें यदि कुछ सत्य है और धनवंतरि जैसे आयुर्वेदाचार्य का प्रसंग इससे जुड़ा है तो वह उनकी विद्वत्ता और आयुर्वेद में महान प्रवीणता के आधार पर ही जुड़ा है। नीरोगी और स्वस्थ रहना हर व्यक्ति की हार्दिक इच्छा होती है, जिसे अमृत कलश ही पूर्ण कराता है, संभवत: इसलिए यह मिथक इस प्रकरण के साथ आ जुड़ा होगा। ऐसी भी मान्यता है कि इस त्रयोदशी के दिन ऋषि धन्वंतरि अपने जन्मदिवस पर जब लोगों को मुफ्त औषधियां वितरित करते थे तो अक्सर लोग अपने औषधियों के नये पात्र लेकर आते थे, इसी से इस पावन पर्व पर नये पात्र (बर्तन) खरीदने की परंपरा विकसित हो गयी। जो आज तक हमें समाज में देखने को मिलती है।


इसी प्रकार का मिथक नरक चतुर्दशी के साथ है। इसे यम का नाम भी दिया गया है। यम मृत्यु का देवता है। दीपावली के पर्व पर हम सर्वत्र साफ-सफाई पर ध्यान देते हैं। अत: सर्वत्र स्वच्छता रहे, कीड़े मकौड़ों का प्रकोप समाप्त हो और सब ओर से हमें स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वायु प्राप्त हो। इसी कारण इस चतुर्दशी का नाम नरक चतुर्दशी पड़ गया। क्योंकि हम जिस नरक में पड़े होते हैं उसे समाप्त कर यम की भेंट चढ़ाकर नवजीवन का सूत्रपात करते हैं।

गोवर्धन पूजन : दीपावली से अगले दिन अन्नकूट पर्व अथवा गोवर्धन पूजा का पर्व आता है। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर उसके नीचे ब्रजवासियों को शरण देकर इंद्र के प्रकोप से उनकी रक्षा की थी। राजा इंद्र ने श्रीकृष्ण द्वारा अपनी अवहेलना ब्रज वालों से कराये जाने पर घनघोर वर्षा ब्रज पर जब की तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पर उठाकर उसके नीचे ब्रजवालों को बिल्कुल उसी प्रकार बचाया था जिस प्रकार हम छतरी के नीचे आकर भीगने से बच जाया करते हैं।

पौराणिक लोग देव पुरूषों को पहले तो जन साधारण की भांति लड़ाते हैं फिर एक को नीचा दिखाते हैं और एक को उच्चासन पर बिठा देते हैं। गोवर्धन के उक्त प्रकरण के प्रसंग में प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि वर्षा से बचकर ही ब्रजवालों ने कृष्ण की शरण ली थी और कृष्ण ने गोवर्धन को छतरी की भांति तानकर उनकी रक्षा की थी तो उस समय चूंकि घनघोर वर्षा हुई थी और मूल कथानक के अनुसार ब्रजवासी अपने घर बार को पानी में डूबता देख तब कृष्ण के पास आये थे, तो गोवर्धन पर्वत को ऊपर उठाते ही चारों तरफ का पानी उसके नीचे आ भरा होगा। जिससे ब्रजवासियों की सुरक्षा वहां भी संभव नही हुई होगी।

दूसरे, दीपावली पर्व अत्यंत प्राचीन है इसके साथ श्रीकृष्ण के वृतांत का इस प्रकार क्या मेल? फिर भी यदि ऐसा हो तो सत्य यही हो सकता है कि कृष्ण के काल में कभी भयंकर वर्षा ब्रज में हुई होगी। जिसमें ब्रजवासी अत्यंत पीडि़त हुए होंगे। कृष्ण जैसे लोकोपकारी और परमार्थ में तुरंत कूद पडऩे वाले  आप्त पुरूष ने तब इनकी प्राण पण से रक्षा की होगी और गोवर्धन पर्वत पर उनके लिए आश्रय स्थल बनाये होंगे। संभव है कि आगे चलकर यही महान कृत्य गोवर्धन पूजन के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर गया। रूढिय़ों से जंग लगे भारतीय समाज को इन बातों की प्रामाणिकता पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस पर्व को गोधन संर्वधन के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।

भैया दूज : गोवर्धन पूजन के अगले ही दिन भैया दूज का पर्व आता है। इस पर्व ने पिछले 15-20 वर्ष से अधिक प्रसार और विस्तार प्राप्त किया है। इसके विषय में मान्यता है कि इस दिन यमुना अपने भाई यम से मिलने गयी थी। विचार करना चाहिए कि यमुना एक नदी है जो कि ‘जड़’ है, जड़ के द्वारा चलकर कहीं जाना संभव है? वैज्ञानिक युग में ये तर्क पुराण कुरनन की सी अवैज्ञानिक बातों के पिटारे से अधिक कुछ जान नही पड़ते। अब इन बातों पर पूर्ण विराम लगना चाहिए। बहुत संभव है कि इस दिन कभी किसी समय में यमुना नदी में भयंकर बाढ़ आयी हो। जिसने कितने ही लोगों के जीवन को लील लिया हो। जीवन लीला समाप्त करना यम का कार्य है। इसीलिए यमुना का भाई यम को मान लिया गया हो। कुछ भी हो आज के वैज्ञानिक युग में ऐसी मिथ्या बातें उचित और तार्किक जान नही पड़ती।

भैया दूज को फिर भी हमें बहन भाई के प्रेम को सुदृढ़ करने वाले पर्व के रूप में मान्यता प्रदान कर उसे भारतीय समाज में और भी अधिक प्रचारित प्रसारित करने में सहयोग करना चाहिए। आज जब सामाजिक संबंधों के प्रति व्यक्ति पूर्णत: उदासीन है तब यह पर्व बहन भाई के प्रेम को और भी अधिक स्थायित्व और समरसता प्रदान करने में सहायक हो सकता है। हमें इसी भाव से इस पर्व को महत्ता प्रदान करनी चाहिए।

इस प्रकार इन पर्वों की वैज्ञानिकता और ऐतिहासिकता पर चिंतन करते हुए हमें इन्हें इनके वैज्ञानिक स्वरूप में मानने और अपनाने की आवश्यकता है।