भारत-रूस मैत्री और खु्रश्चेव

  • 2015-12-26 01:30:57.0
  • राकेश कुमार आर्य

जुलाई 1947 की बात है। देश तेजी से आजादी की ओर बढ़ रहा था, कांग्रेस के बहुत से नेताओं को तब नेहरू और गांधी के पास केवल इस बात के लिए आते-जाते देखा जा सकता था कि इन दोनों के पास से ही कोई न कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय या स्वतंत्र भारत में शासन का कोई महत्वपूर्ण दायित्व उन्हें मिल सकता था। तब नेहरूजी के पास अपनी नई टीम तैयार करने, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के अन्य देशों के साथ संबंध स्थापित करने और वहां अपने लोगों को राजदूत या उच्चायुक्त बनाकर भेजने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। उस समय रूस के लिए नेहरू जी ने अपनी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को राजदूत के रूप में चुना।

विजय लक्ष्मी पंडित बहुत ही सुलझी हुई राजनयिक थीं, राजनीति के गुणा-भाग को और बड़े व्यक्तित्वों से बातचीत करने के ढंग को उन्होंने निकट से देखा और समझा था। इसलिए उनसे अपेक्षा थी कि वह रूस के तानाशाह स्टॉलिन और उनके देश के साथ बेहतर संबंध बना लेने में सफल रहेंगी। श्रीमति पंडित स्वयं भी इसी आशा और विश्वास के साथ रूस गयी थीं कि सारी परिस्थितियों से वह आराम से निपट लेंगी और रूस को भारत के निकट लाने में सफल होंगी। परंतु रूस में उस समय स्टॉलिन जैसे तानाशाह की तूती बोल रही थी, जिसके देश में पहुंचने पर विजयलक्ष्मी पंडित  को शीघ्र ही पता चल गया कि वह जिन उच्चाकांक्षाओं को लेकर रूस आईं हैं, उनमें वह सफल नही हो पाएंगी। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि भारत में महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात रूस की सरकार ने कोई शोक संदेश भी नही भेजा था। भारत के राजदूतावास में रखी शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर करने के लिए रूसी सरकार ने किसी अधिकारी स्तर के अधिकारी को भी नही भेजा था, इस पर भारतीय राजदूतावास के एक अधिकारी ने रूसी विदेश कार्यालय के दक्षिण एशिया विभाग में जाकर उनके प्रमुख को अनौपचारिक रूप से बताया कि यह एक वह भयंकर भूल हो गयी है और इसे भारत के लोग अपने लिए अच्छा नही समझेंगे। ‘‘तब हमारे दूतावास के उस अधिकारी से वहां के अधिकारियों ने बड़ी लापरवाही से कह दिया था कि गांधाजी कहते थे कि रूस उनके लिए  एक पहेली है। वह भी हमारे लिए एक पहेली हैं।’’ इस वार्ता के अगले दिन दिल्ली के रूसी राजदूत शोक व्यक्त करने गये।
india and Russia


हमने यह प्रसंग यहां पर इसलिए उद्घृत किया है कि आज से 68 वर्ष पूर्व का रूस हमारे लिए उतना विश्वसनीय नही था, जितना आज का रूस है। भारत रूस मित्रता में कई प्रकार के उतार-चढ़ाव देखे गये हैं। यह तानाशाह स्टॉलिन के समय में जहां बहुत खराब दौर से गुजर रहे थे, वहीं  आगे चलकर ख्रुश्चेव के शासन काल में इस मित्रता ने नये आयामों को छूना आरंभ किया। स्टॉलिन के समय में रूसी प्रेस भारत की खुलेआम निंदा किया करता था और भारत को ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पिछलग्गू कहकर उसके पीछे भागने वाला कुत्ता’ कहकर पुकारता था।  एक बार रूस के विशिंस्की ने अपने हिंदी दुभाषिया के माध्यम से विजयलक्ष्मी पंडित  से यहां तक कह दिया था कि ‘पराधीनता का बोझ धीरे-धीरे ही उतरता है’ ऐसे शब्दों को सुनकर और रूसी प्रेस के आलोचनाओं से भरे लेखों को पढक़र श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित  को निराशा ने आ घेरा था।

इसके पश्चात परिस्थितियों में कुछ परिवर्तन आया, स्टालिन दुनिया में नही रहा। 1956 में तब खु्रश्चेव भारत आए तो रूसी नेताओं को भारत की वास्तविकताओं का पता चला। उनकी आंखों पर से मताग्रही स्टॉलिनवाद का पर्दा हट गया था। ड्याकोव जैसे रूसी विद्वान जो भारत को ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पीछे भागने वाला पिछलग्गू और कुत्ता’ कहा करते थे, अब उनके स्वर बदलने लगे और उन्होंने भारत को ‘महान, शांतिपूर्ण, प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और गुटनिरपेक्ष’ के रूप में महिमामंडित करना आरंभ कर दिया। इतना ही नही रूस के एनसाक्लोपीडिया  ने भी गांधी और नेहरू के विषय में अपनी धारणाएं परिवर्तित कर दीं और भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता दी। खु्रश्चेव के रूस ने इस प्रकार भारत के विषय में अपनी सारी मान्यताओं में परिवर्तन कर दिया।

खु्रश्चेव ने रूस में लोकतंत्रीय और शांतिपूर्ण साम्यवाद के लिए मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने रूस में खुलेपन की हवा को बहाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जब स्टॉलिन संसार से विदा हुआ था, तो रूस के लोगों ने आशा और राहत के साथ उसकी मृत्यु का मौन रहकर स्वागत किया था, परंतु जब 24 अक्टूबर 1964 को खु्रश्चेव का पतन हुआ तो रूस के जनसाधारण को बहुत दुख हुआ था।

1962 में जब भारत और चीन दोनों का युद्घ चल रहा था तब रूस में भारत के राजदूत टी.एन. कॉल थे। जब खु्रश्चेव के साथ भारत के इस नये राजदूत की पहली बैठक हुई तो खु्रश्चेव उस बैठक में भडक़ उठे। उन्हें वैचारिक रूप से चीन अपने अधिक निकट लग रहा था और वह उस समय भारत को अपने आप से कुछ दूर समझ रहे थे। इसलिए उन्होंने श्री कॉल से कह दिया था-‘‘मैं भारत और चीन के इस निरर्थक युद्घ का उद्देश्य समझ नही पा रहा हूं। मेरे सहायकों ने सूचित किया है कि भारत ऐसी जगह के लिए और ऐसी जगहों पर लड़ रहा है जहां ऐसी कड़ाके की ठंड पड़ती है कि जो भी वहां मूलमूत्र त्यागने के लिए बैठता है उसके शरीर का पिछला भाग बर्फ की तरह जम जाता है।’’ क्रमश: