भारत-रूस मैत्री और खु्रश्चेव (2)

  • 2015-12-28 02:29:52.0
  • राकेश कुमार आर्य

तब हमारे राजदूत ने उन्हें समझाया कि हमारी रूचि भी शांति और अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधानों में है। इसीलिए हमने 1954 में चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर करने में पहल की थी। चाऊ-एन-लाई ने सदा हमें आश्वासन दिया कि हमारी सारी वर्तमान समस्याओं का समाधान शांति के साथ सामान्य राजनयिक ढंग से किया जा सकता है। हमने इस पर विश्वास किया था और अपनी सुरक्षा का कोई विशेष प्रबंध नही किया था। वही संभवत: एक भूल थी क्योंकि चीन अपना सैन्य बल निरंतर बढ़ा रहा था और उसने हमारी दुर्बलता का लाभ उठाना  चाहा। हम आक्रमण का सामना करने के लिए दृढ़संकल्प थे और बल के आगे घुटने टेकने वाले नही थे। हम गुटनिरपेक्ष रहना चाहते थे। हम मित्र देशों से नैतिक, राजनैतिक और उपकरणों के रूप में समर्थन मांगेंगे, लेकिन अपनी लड़ाई हम स्वयं लड़ेंगे। क्या रूस हमें इस प्रकार का समर्थन देगा?’’

खु्रश्चेव एक सरल हृदयी राजनीतिज्ञ थे, उनके पास जितनी भड़ास थी उसे वह हमारे राजदूत से पहले झटके में ही निकाल चुके थे। अब उनके पास अधिक शब्द नही थे, इसलिए वह सहज होकर बोले-‘‘आप हमारे मित्र हैं और चीन हमारा भाई है। हम किसी का पक्ष कैसे ले सकते हैं?’’ इस पर श्री कॉल ने जब देखा कि खु्रश्चेव  पहले की अपेक्षा अब बहुत नरम हो चुके हैं तो उन्होंने तुरंत कहा-‘‘यदि मेरा भाई मेरे मित्र पर प्रहार करता है तो मैं खड़ा-खड़ा देखता नही रहूंगा, अपितु कुछ न कुछ करूंगा’’ इस पर खु्रश्चेव और नरम होकर बोले-‘‘हमें तो इसका पता पहले ही चल गया था। हमने अपने 9 सितंबर 1956 के तास के बयान में दोनों पक्षों को चेतावनी दी थी कि वे समस्याओं को शांति से सुलझाएं। आप याद रखिए चीन हमारा भाई है, लेकिन छोटा भाई नही, हम उसे बड़ा भाई समझकर उस पर हाथ नही उठा सकते।’’ इस पर श्री कॉल ने राष्ट्रपति खु्रश्चेव  से कहा-‘‘हम यह नही चाहते कि रूस चीन पर प्रहार करे।
modi and putin
उसने चीन को बहुत से शस्त्र टैंक विमान आदि भारत से युद्घ करने के लिए नही, अपितु साम्राज्यवादी हमलों का सामना करने के लिए दिये हैं। पश्चिमी देश पाकिस्तान को हथियार दे रहे हैं, जिसका प्रयोग भारत के विरूद्घ किया जा रहा है। हमें कहीं से तो हथियारों का प्रबंध करना होगा और आशा है कि रूस हमारी आवश्यकताओं पर तत्काल ध्यान देगा।’’ तब खु्रश्चेव  ने हमारे राजदूत से कह दिया था कि इसके लिए वह रूस के रक्षामंत्री मालिनोवश्की से संपर्क करें। जब हमारे राजदूत महोदय ने राष्ट्रपति से यह कहकर विदा ली कि वह शीघ्र ही उनसे मिल सकते हैं तो सरल हृदयी खु्रश्चेव ने कह दिया था कि ‘हर समय उनका स्वागत’ है। 15 दिसंबर 1962 तक खु्रश्चेव भारत को अच्छी तरह समझ गये थे, उन्होंने चीनी नेतृत्व और उनकी साम्राज्यवादी तथा विस्तारवादी नीतियों के विरूद्घ पहली बार उसे जो फटकार लगाई थी, वह बहुत निष्कपट और दिलचस्प थी। खु्रश्चेव ने चीन को ‘हंसता हुआ बुद्घ’ करार दिया। उन्होंने भारत से भी कहा कि लड़ाईयां बहुत महंगी पड़ती हैं, लोगों पर इसका भार पड़ता है, इसलिए युद्घ को अब नही खींचा जाए। इस प्रकार रूस के रूख में परिवर्तन आया और उसने भारत के प्रति अपनी सहानुभूति का स्पष्ट रूप से सार्वजनिक प्रदर्शन करना आरंभ कर दिया। खु्रश्चेव  ने एक बार एक गोष्ठी में कहा था-‘‘भारत मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा। मैं पंद्रह वर्ष की अवस्था में घर से भाग गया और सुदूर रहस्यों से भरे भारत में पहुंचना चाहता था। मेरे पिता मुझे वापिस ले आये।  वह चाहते थे कि मैं रूसी राजनयिक सेवा में योग देने की तैयारी करूं।’’ खु्रश्चेव जब 1956 में भारत आए तब उन्होंने कहा था-‘जब भी आपको हमारी आवश्यकता हो तो आप अपनी कश्मीर की पहाडिय़ों पर से हमें आवाज दे दिया करना।’ उनके ऐसे प्रयासों से ही भारत और रूस एक दूसरे के निकट आए।

1965 में जब भारत-पाक युद्घ हुआ तो रूस के ऊपर भारत को और देशों की अपेक्षा कुछ अधिक भरोसा था, इसीलिए रूस के कोसीगिन के कहने पर हमारे प्रधानमंत्री शास्त्री ताशकंद वार्ता के लिए रूस पहुंच गये थे। पर चाहे ताशकंद समझौता हो या उसके बाद की परिस्थितियां हों, और चाहे अब रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ मित्रता की नई इबारत लिखती प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा हो, सबके मूल में खु्ररश्चेव की सदाशयता को भूला नही जा सकता। हमें रूस के साथ अपनी मित्रता को नई ऊंचाईयां देने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि रूस ही हमारा एक ऐसा मित्र है, जिसने समय पर हमारा सहयोग किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के महत्व को समझकर उसके साथ जिस सदाशयता से हाथ बढ़ाया है उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में मोदी कितने कुशल हो गये हैं, उनकी हाल की रूस यात्रा इसका एक प्रमाण है।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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