भारत में मनुस्मृति का प्रभाव एवं महत्व

  • 2016-05-08 13:40:33.0
  • पं. बाबा नंदकिशोार मिश्र

बौद्घ महाकवि अश्वघोष ने जो राजा कनिष्क का समकालीन था, जिसका कि समय प्रथम शताब्दी माना जाता है, अपनी वज्रकोपनिषद कृति में अपने पक्ष के समर्थन में मनु के श्लोकों को उदृत किया है। विश्वरूप ने अपने यजुर्वेदमाष्य और याज्ञवल्क्य स्मृति भाष्य में मनु के अनेक श्लोकों को उद्घृत किया है। शंकराचार्य ने वेदांतसूत्रमाध्य में मनुस्मृति के पर्याप्त उद्घरण दिये हैं। 500 ई. में जैमिनि सूत्रों के भाष्यकर शबरस्वामी ने अपने भाष्य में मनु के अनेक वचनों का उल्लेख किया है याज्ञवल्क्य स्मृति के एक अन्य भाष्यकर विज्ञानेश्वर ने याज्ञ. स्मृति के श्लोकों की पुष्टि के लिए मनु के श्लोकों को पर्याप्त संख्या में उद्घृत किया है। गौतम वशिष्ठ, आपस्तम्ब आश्वलायन, जैमिन बौधायन आदि सूत्रग्रंथों में भी मनु का आदर के साथ उल्लेख है। आचार्य कौटिल ने अपने अर्थशास्त्र में बहुत से स्थलों पर मनुस्मृति को आधार बनाया है, और कई स्थलों पर मनु के मतों का उल्लेख किया है। इनके अतिरिक्त भी बहुत सारे ऐसे ग्रंथ हैं, जिन्होंने अपनी प्रमाणिकता और गौरव बढ़ाने के लिए अथवा मनु के मत को मान्य मानकर उद्घृत किया है।
अठाहरवीं शताब्दी में मनुस्मृति को सर्वाधिक महत्व आर्यसमाज के प्रवत्र्तक महर्षि दयानंद ने दिया। उन्होंने केवल मनुस्मृति को ही आर्ष एवं प्रामाणिक घोषित किया और अपने मंतव्यों का आधार बनाया। उन्होंने अपने ग्रंथों में मनुस्मृति के लगभग 514 श्लोकों या श्लोकखण्डों को प्रमाणरूप में उद्घृत किया है।
इनके अतिरिक्त ऐसे भी बहुत सारे ग्रंथ मिलते हैं जिनमें किसी अन्य ग्रंथ के ऐसे वचन उद्घृत हैं जिनमें कि मनु के मत का उल्लेख है या मनु के नाम से कोई मान्यता निर्दिष्ट है। यद्यपि इनमें बहुत से श्लोक ऐसे भी हैं जो न तो वर्तमान मनुस्मृति में मिलते हैं और न अन्य किसी स्मृति में। यह भी संभव है कि अपने पक्ष की पुष्टि के लिए लोगों ने मनु के नाम से स्वयं ही श्लोक रच लिये हों। यहां इस विवाद में न पडक़र केवल इतना कहना भी प्रासंगिक होगा कि इन सब बातों से मनु के एकछत्र प्रभाव का संकेत अवश्य मिलता है।
प्राचीनकाल से मनुस्मृति के अनुकूल आचरण को भी प्रतिष्ठा सूचक माना जाता रहा है। वलमी के राजा धारसेन का एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है जो 571 ई. का है। उसमें उस राजा को मनु के धर्मनियमों का पालनकर्ता कहकर उसकी विशेषता बतलायी गयी है।
सभी स्मृति ग्रंथों एवं धर्मशास्त्रों में प्राचीनकाल से लेकर अब तक सर्वाधिक टीकाएं एवं भाष्य मनुस्मृति पर ही लिखे गये हैं और अब भी लिखे जा रहे हैं। यह भी मनुस्मृति की सर्वोच्चता एवं सर्वाधिक प्रभविष्णता का द्योतक है।
आजकल भी पठन-पाठन अध्ययन मनन में मनुस्मृति का ही सर्वाधिक प्रचलन है। हिंदू कोड बिल एवं संविधान का प्रमुख आधार मनुस्मृति को माना जाता है। आजकल भी न्यायालयों में न्याय दिलाने में मनुस्मृति का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं के प्रसंग में मनुस्मृति का उल्लेख अनिवार्यरूप से होता है और इससे मार्गदर्शन भी ्रप्राप्त किया जाता है।
विदेशों में मनुस्मृति का प्रभाव
भारत ही नही अपितु विदेशों में भी मनुस्मृति का प्रभाव रहा है और इसे महत्व मिला है। क्रमश: