भारत के जांबाजों का अभिनंदन

  • 2016-01-04 02:30:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

पिछले दिनों अंग्रेजी नववर्ष के प्रारंभ होने के अवसर पर मेरे पास किसी ने वाट्सअप किया जिसमें देश के किसानों और जवानों के चित्र लगे थे। किसान को अपनी खेतों में हल चलाते और कृषि कार्य करते हुए दिखाया गया था, जबकि जवान को हिमालय की गलाने वाली बर्फ पर खड़े होकर सीमा की सुरक्षा करते हुए दिखाया गया था। इस चित्र के नीचे लिखा था कि नववर्ष के समारोहों में डूबने के स्थान पर कुछ अपने सुरक्षाकर्मियों और किसानों के विषय में भी सोचिए, जिनमें से एक हमारी सुरक्षा के लिए अपना जीवन खपा रहा है तो दूसरा हमारी भूख को मिटाने के लिए चौबीसों घंटे अन्न उत्पादन के कार्यों में लगा हुआ है। चित्र भी मार्मिक था और उसके नीचे लिखे गये ये शब्द भी मार्मिक थे।

पूरे देश ने ईसाई नववर्ष को ऐसे मनाया जैसे अपनी दीपावली को मना रहे हों। परंतु इसी समय देश के सुरक्षाकर्मियों और देश की सीमा पर तैनात हमारे जांबाजों को किसी समारोह के मनाने की शीघ्रता नही थी, अपितु वह देश के सीमा के उस पार शत्रु की चालों को समझने और उन्हें असफल करने के अपने पुनीत राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह कर रहे थे। शत्रु उन्हें प्रमाद और आलस्य में समझ रहा था और यह मानकर चल रहा था कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ हुई मुलाकात के पश्चात बने परिवेश के कारण भारत के सुरक्षा प्रहरी इस समय निश्चित ही असावधान होंगे, इसलिए उनकी असावधानी का लाभ उठाया जाए और भारत को जितनी अधिक हो सकती है उतनी क्षति पहुंचाई जाए। हमारे सुरक्षा प्रहरियों ने अपने देशधर्म को पहचानते हुए शत्रु की चालों का पूरी मुस्तैदी से नजर रखी और जब शत्रु पाकिस्तान से भारत की ओर चला तो उसकी सारी चालों का पता लगा लिया। यह ठीक है कि पठानकोट स्थित भारत के ऐयरबेस में शत्रु प्रवेश करने में सफल रहा, परंतु वह अपने उद्देश्य में सफल नही हो सकता और इतना ही नही वह जीवित भी अपने देश नही लौट सका। ऐसे समय पर देश के सुरक्षा प्रहरियों का अभिनंदन करने के लिए हर देशवासी उनके समक्ष झुक गया है। सारे देश को पता चल गया है कि हमने चाहे प्रमाद किया है और हम चाहे किसी विदेशी पर्व के मनाने में लग गये हों परंतु हमारे वीर सैनिक उस समय भी हमारी रक्षा के लिए पूरी मुस्तैदी से कार्य कर रहे थे।
Indian Army


पठानकोट पर हुए आतंकी हमले में हमारे जिन जवानों को अथवा सुरक्षा प्रहरियों को अपने प्राण गंवाने पड़े हैं, उनके उस बलिदान को सारा देश नमन कर रहा है और नम आंखों से अपने शहीदों को श्रद्घांजलि अर्पित कर रहा है। एक प्रश्न इस समय उठ रहा है कि शत्रु हमारे घर में प्रवेश करने में सफल कैसे हो गया और यदि सफल हुआ तो मानना पड़ेगा कि मोदी और मनमोहन की सरकार में कोई अंतर नही है। यह प्रश्न प्रासंगिक हो सकता है परंतु युक्तियुक्त नही हो सकता। देखना यह पड़ेगा कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के समय हमारे देश के सुरक्षाप्रहरियों का मनोबल कैसा था और आज कैसा है? मनमोहन सरकार के किसी मंत्री या एनएसए या स्वयं प्रधानमंत्री के द्वारा उस समय होने वाले आतंकी हमलों से निपटने की रणनीति कैसी होती थी और उन आतंकी हमलों की आलोचना करने के लिए उनके पास शब्द कैसे होते थे? आज जब इस विषय में विचार किया जाता है तो ज्ञात होता है कि परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। अब शत्रु से शिकायत नही की जाती, कि तूने हमारी इतनी क्षति की है, यदि आगे की तो हम ऐसा कर देंगे या वैसा कर देंगे। इसके विपरीत अब शत्रु को मिटाने की तैयारी की जाती है और उसे अपनी आक्रामक क्षमता से यह समझाया जाता है कि भारत की ओर आने का या आंखें उठाकर देखने का परिणाम क्या होता है? सारा देश इस समय उत्साहित होकर आतंकी हमलों के प्रति एक अद्भुत और अलौकिक ऊर्जा से भरा हुआ है। किसी सक्षम और समर्थ सरकार का  यही दायित्व होता है कि वह अपने देशवासियों को शत्रु के प्रति सदा सावधान और ऊर्जान्वित रखे।

जहां तक आतंकी हमलों के निरंतर होते रहने का प्रश्न है तो जिन लोगों ने मोदी के आने से यह आशा लगाई थी कि अब आतंकी हमले नही होंगे हमारा मानना है कि वह गलत थे। इसके साथ-साथ यदि भाजपा ने भी अपनी ओर से किसी अतिरेक में या वोटों के लालच के भावावेश में देशवासियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि अब आतंकी हमलों के होने का समय लद गया है तो उसके बारे में भी हमारा यही मानना है कि वह भी गलत थी। हमें स्मरण रखना होगा कि इस समय पूरा विश्व आतंकी हमलों के साये में जी रहा है और किसी भी देश को या किसी भी देश के किसी भी शासनाध्यक्ष या राष्ट्राध्यक्ष को अपने देश के विषय में यह पूर्ण विश्वास नही है और वह नही विश्वास दिलाने की स्थिति में है कि उसके देश पर आतंकी हमलों के साये का कोई संकट नही है। एक प्रकार से पूरा विश्व इस समय तीसरे विश्वयुद्घ की अघोषित स्थिति में जी रहा है जिसके कारण निकट भविष्य में भी आतंकी हमले होते रहेंगे, जिनसे भारत भी अछूता नही रह सकता। आवश्यकता इस समय अपनी सरकार के साथ और सुरक्षाप्रहरियों के साथ मिलकर खड़े होने की है। सरकार चाहे मोदी की हो और चाहे केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की हो, आतंकी हमलों को लेकर कोई राजनीति नही होनी चाहिए। पूरे देश को एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक भाषण में कहा भी है। प्रधानमंत्री मोदी भी अतिरेक की भाषा का प्रयोग न करें जैसा कि उन्होंने पूर्व में शत्रु के प्रति की भी है। अतिरेक की भाषा और आग लगाती है, अतिरेक के साथ-साथ विवेक भी जुड़ा रहना चाहिए। हम मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के पास विवेक की कमी नही है, परंतु शब्दों के चयन में उनसे कई बार चूक होती है। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ उनके देश में जाकर मित्रता का हाथ बढ़ाया, इस पर सारा देश उनके साथ है। उन्होंने अपने सुरक्षाकर्मियों को शत्रु से निपटने के लिए पूरी छूट दी और उन्हें यह भी सावधान किया कि मेरी पाकिस्तान यात्रा के पश्चात किसी प्रकार के प्रमाद के प्रदर्शन की आवश्यकता नही है, यह कार्य भी उनका विवेकपूर्ण रहा है। अब हमारा मानना है कि पाकिस्तान के आतंकवादियों और वहां की सेना को भारत अलग करके देखे और वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को कुछ अलग ढंग से देखे तो अच्छा रहेगा।  नवाज शरीफ की सदाशयता को प्रशंसा मिलनी चाहिए और वहां के आतंकियों, कठमुल्लाओं और सेना की उग्रता को अलग ढंग से देखा जाना चाहिए। सरकार अपना काम करे और हमारे अभिनंदनीय सुरक्षा प्रहरी अपना काम करें तो ही अच्छा है। पूरा देश इस नीति का समर्थन करेगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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