भारत का सनातन इतिहास और राज्यपाल राम नाईक

  • 2015-11-26 02:05:00.0
  • राकेश कुमार आर्य

Ram Naikउत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक भारतीय सनातन संस्कृति के प्रति समर्पित व्यक्तित्व के धनी हैं। वाराणसी के महात्मा गांधी  काशी विद्यापीठ के 37वें दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करते हुए राज्यपाल एवं कुलाधिपति राम नाईक ने पते की बात कही है, कि जिसे आज के आज के राजनीतिज्ञ कहने से बचते हैं। कुलाधिपति का मानना है कि भारत का इतिहास अंग्रेजों व मुगलों द्वारा लिखा गया है, जिनके भारतीय इतिहास, धर्म और संस्कृति को समझने के अपने-अपने पूर्वाग्रह रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि अंग्रेज और मुगल कभी यह नही समझ पाये कि भारत में इतिहास लिखने की परंपरा के मानक क्या हैं और भारत में इतिहास को लिखना क्यों आवश्यक माना जाता है?

एक बात से हम अपने मत को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे। बात उस समय की है जब कलियुग के आगमन पर धर्मराज युधिष्ठिर अपने चारों भाईयों और द्रोपदी के साथ ‘स्वर्गारोहण’ के लिए प्रस्थान करते हैं। हिमालय पर जाते पांडवों में से सबसे पहले द्रोपदी का पतन (फिसलन) होता है, तब भीम युधिष्ठिर से कहते हैं कि भैया! देखो तो तनिक पांचाली का पतन हो गया है। पर युधिष्ठिर उधर नही देखते, तब भीम उनसे पुन: कहता है कि आप उधर देख नही रहे हैं, ऐसा क्यों? इस पर युधिष्ठिर  कहते हैं कि भीम यह समय देखने का नही है, अपितु यह समय कर्मफल प्राप्त करने का है, द्रोपदी ने अपने किये का फल प्राप्त कर लिया है। उसका सर्वप्रथम पतन इसलिए हुआ है कि वह पक्षपात करती थी और सदैव अर्जुन को लेकर उसका न्याय पक्षपाती हो उठता था।

इसी प्रकार युधिष्ठिर ने अपने अन्य भाईयों के पतन का कारण बताते हुए भीम से अपना संवाद निरंतर जारी रखा। द्रोपदी के पतन को प्राप्त हुए सहदेव के बारे में उन्होंने कहा कि उसे अपनी विद्वत्ता का अहंकार था, नकुल को अपने सौंदर्य पर गर्व था और अर्जुन सदैव लोगों का तिरस्कार करता रहा। इसलिए इन सबका पतन हो गया है। अपने-अपने कर्म के अनुसार सब अपना-अपना फल प्राप्त कर रहे हैं। इसके पश्चात जब स्वयं भीम पतन को प्राप्त हुए तो भीम ने अपने पतन का भी कारण पूछा। इस पर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा-हे भीम! तुम्हारे पतन के दो कारण हैं एक तो तुम खाते बहुत थे, और दूसरे तुम डींगें बहुत मारते थे। अधिक खाने से तुम ईश्वर की भक्ति नही कर पाते थे और डींगें मारने से तुम अक्सर मिथ्याकथनों को बोल जाते थे। इसलिए तुम्हारा भी शीघ्र ही पतन हो गया है।

कहने के लिए तो यह भीम और धर्मराज युधिष्ठिर  का एक ंसंवाद मात्र है। परंतु इसमें भारत के मनीषियों द्वारा इतिहास लेखन की सनातन परंपरा के दर्शन होते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर यहां इतिहास की सनातन परंपरा को जीवित रखते हुए इतिहास को अनंतकाल के लिए एक संदेश दे रहे हैं कि व्यक्ति को अपने न्याय में कभी पक्षपाती नही होना चाहिए, कभी अहंकारी नही होना चाहिए, कभी गर्वीला नही होना चाहिए, कभी किसी का तिरस्कार नही करना चाहिए, कभी अधिक नही खाना चाहिए और कभी मिथ्याभाषण का प्रलाप नही करना चाहिए। यदि व्यक्ति इन सब चीजों का आश्रय लेगा या कोई समाज इन दुर्गुणों को अपनाएगा, या कोई राष्ट्र इन दुर्गुणों को अपने लिए उपयुक्त मानेगा तो उसका पतन निश्चित है।

भारतीय इतिहास हमें यही बताता है कि मानवता के सनातन गुणों के उपासक बनो। इतिहास को इस प्रकार लिखो, समझो, पढ़ो और पढ़ाओ कि उसके गुण युग-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करते रहें।

आज मानवता का पतन केवल इसलिए हो रहा है कि हमने इतिहास को गुणहीन और गंधहीन मानवों की चाटुकारिता में लिखा गया, कीर्तिगान बनाकर रख दिया है। इसमें मानवता के विरूद्घ किये गये अपराधों की एक लंबी श्रंखला है, और अपराध करने वाले लोगों को अच्छा समझने की और अच्छा स्थापित करने की एक मूर्खतापूर्ण सोच है। जिसे उचित नही कहा जा सकता। प्रचलित इतिहास में अपराधी का गुणगान होता है और हम देखते हैं कि पूरा इतिहास हमारे लिए नीरस होकर रह जाता है। मानवता के हित में और सर्वमानव समाज के कल्याणार्थ किये गये कार्यों का या मानवता को भयमुक्त परिवेश प्रदान करने वाले या ऐसे परिवेश के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले महानायकों को इतिहास उपेक्षित करता है, या उन्हें ‘पहाड़ी चूहा’ कहकर अपमानित करता है, तब ऐसे इतिहास से पाठक का मोह भंग भी हो जाता है।

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक जी एक भद्रपुरूष हैं, और उनका चिंतन राष्ट्रहित में कई बार इस प्रकार फूटा है कि उससे बहुत कुछ प्रेरणा ली जा सकती है। उनके द्वारा इतिहास  के पुनर्लेखन को लेकर की गयी टिप्पणी पर उत्तर प्रदेश सरकार ही नही अपितु केन्द्र सरकार को भी ध्यान देना चाहिए। राजभवनों में ऐसे तपे-तपाये राजर्षियों के पहुंचने पर राजभवन तो धन्य हो ही जाते हैं, साथ ही ऐसी सधी-सधायी और तपी-तपायी वाणी से राष्ट्र का भी कल्याण होता है। यह आवश्यक नही है कि राम नाईक के कथन को मानने से किसी संप्रदाय विशेष के लोगों को कष्ट ही दिया जाए, बात केवल इतनी है कि इतिहास को मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित व्यक्तित्वों के कृत्तित्वों से आपूरित किया जाए। जिससे मानवता लाभान्वित हो और नीरस बन गये इतिहास के विषय में लोगों की सोच में परिवर्तन आए।

राज्यपाल किसी भी प्रदेश में स्थापित विद्यापीठों के कुलाधिपति भी होते हैं, तो इसलिए उनकी बात को इस प्रकार लेना और समझना चाहिए कि जैसे शिक्षा जगत का एक संरक्षक अपने ‘मन की बात’ बोल रहा हो। राज्यपाल महोदय की पीड़ा से स्पष्ट है कि वह भारतीय इतिहास के साथ हुए छल-छद्मों और षडय़ंत्रों से आहत हैं, जिनसे अब पर्दा उठना ही चाहिए।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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