भाजपा में यू.पी. का दावेदार कौन?

  • 2016-01-23 03:30:58.0
  • राकेश कुमार आर्य

उत्तर प्रदेश के लिए आगामी एक वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। 2017 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। जिनके लिए तैयारियां अभी से चल गयी हैं। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस चारों बड़े दल उत्तर प्रदेश पर अपना कब्जा करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं। इसलिए अब हम उत्तर प्रदेश में आने वाले समय में कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक कशमकश को देखेंगे। भाजपा ने राममंदिर के विषय को डा. सुब्रमण्यम स्वामी के माध्यम से उठवाया है। डा. स्वामी इस समय एक निर्विभागीय मंत्री हैं, और वह सबसे सक्रिय रहने वाले ऐसे चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं, जो देश में हिंदुत्व के मुद्दों को सही ढंग से उठाने का साहस रखते हैं। उनके पास शब्द भी हैं, संस्कार भी हैं और संतुलन भी है। जबकि ये तीनों चीजें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह के पास नही है, इसलिए उनके मुंह से निकले शब्द से कई बार विवाद हो जाता है।
यू.पी. का दावेदार bjp


भाजपा आगामी चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी को स्टार प्रचारक रखकर भी उन्हें पीछे रखना चाहेगी। दिल्ली और बिहार की जनता ने भाजपा को कुछ सीख दी है। इसलिए अब वह यूपी के लिए कोई चेहरा तलाश रही है। सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह में इस समय ‘शीतयुद्घ’ है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह की नजरें पीएम की कुर्सी पर है इसलिए उन्हें सीएम के लिए यूपी भेजना चाहते हैं पर श्री सिंह भी राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं, उन्होंने जितनी सावधानी से मोदी ने उन्हें यूपी की ओर जाने के लिए कहा है उन्होंने उतनी ही सावधानी से दिल्ली में डटे रहने की बात कह दी है।

अब भाजपा ने कुछ नये चेहरे भी तलाशने  आरंभ कर दिये हैं। सूत्र बताते हैं कि नये चेहरों में वरूण गांधी का नाम भी आगे बढ़ा है, उनके नाम पर एक गुप्त सर्वे भी सामने आया है जिसमें स्पष्ट हुआ है कि यदि वरूण गांधी उत्तर प्रदेश संभालते हैं तो भाजपा को कुल 402 विधानसभा सीटों में से 225 से 250 तक सीटें मिल सकती हैं। इसका कारण यह है कि प्रदेश का बहुसंख्यक वर्ग आजम और मौलाना गुलाम की नीतियों से इस समय दुखी है और उसे एक ऐसा सक्षम नेता चाहिए जो प्रदेश में बहुसंख्यकों की आवाज को भी अपना ‘राजधर्म’ मानकर सुन सके और बिना किसी पक्षपात के कोई अच्छा निर्णय ले सके। यह सारी विशेषताएं वरूण गांधी के भीतर हैं। पर भाजपा उन्हें अपना नेता बनाना नही चाहती है। कारण कि एक तो वह गांधी नेहरू परिवार से है इसलिए भाजपा यह नही चाहती कि उसके विषय में वह चर्चा चले कि यूपी में उसका बेड़ा पार लगाने में भी गांधी नेहरू परिवार का योगदान ही महत्वपूर्ण रहा है। दूसरे वरूण गांधी आत्म स्वाभिमानी नेता हैं समय आने पर वह प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी एक समस्या बन सकते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी उन्हें दूर से ही ‘हैलो’ करना उचित मानते हैं। वरूण गांधी इस प्रकार की सब परिस्थितियों और मानसिकताओं से परिचित हैं, पर वह अपनी मां मेनका गांधी के लिए किसी प्रकार की समस्या बनना नही चाहते। वह संस्कारित हैं और मर्यादित रहकर स्वयं भी प्रतीक्षा करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। पर भाजपा को कौन समझाये कि वह वरूण गांधी को आगे न करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है।

भाजपा अपने लिए तीसरा चेहरा केन्द्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाल रही स्मृति ईरानी को मानती है। श्रीमती ईरानी जहां इस मंत्रालय को बड़ी सावधानी से संभाल रही हैं, वहीं वह युवा भी हैं और ऊर्जावान भी हैं। उन्होंने सोनिया गांधी और कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी को अपने प्रश्नों की तेज बौछारों से कई बार घेरा भी है। वह प्रदेश में एक अच्छा नेतृत्व दे सकती हैं, और उनके नेतृत्व से प्रधानमंत्री मोदी या भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह के नेतृत्व के लिए भी किसी प्रकार का कोई संकट नही है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व श्रीमती ईरानी के ऊपर भरोसा करके चल रहा है, पर उत्तर प्रदेश की जनता उनके साथ चलने में हिचक रही है। भाजपा श्रीमती ईरानी को प्रदेश में महिला मुख्यमंत्री मायावती की एक कारगर कार भी मान रही हैं। जहां प्रदेश का दलित वर्ग मायावती के साथ जा सकता है वहीं अगड़ा-पिछड़ा वर्ग मिलकर श्रीमती ईरानी के साथ आ सकता है।

भाजपा मानकर चल रही है कि नरेन्द्र मोदी के चेहरे को वह लोकसभा चुनावों के लिए ही रखे तो ही उचित है। उनके चेहरे को लेकर हर स्थान पर चुनाव लड़ा जाना उचित नही है। वैसे भी प्रांतों में लोग अपना नेता चाहते हैं। लोगों को केन्द्र के लिए मोदी अभी भी उचित जान पड़ते हैं पर अपने प्रांतीय शासन के लिए वे किसी नीतीश या केजरीवाल को ही उपयुक्त मानते हैं। ऐसी परिस्थितियों में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के लिए भी पार्टी को किसी अन्य चेहरे की तलाश है। उसके लिए पार्टी के वर्तमान प्रदेशाध्यक्ष श्री लक्ष्मीकांत वाजपेयी पार्टी को उचित नही लग रहे हैं। वह प्रदेश में पार्टी को ऊर्जावान करने में असफल रहे हैं, और पार्टी की केन्द्र में सरकार होने के बावजूद प्रदेश की नौकरशाही पर अपना दबदबा स्थापित करने में पूर्णत: असफल रहे हैं। ऐसे में भाजपा के लिए स्थितियां बड़ी टेढ़ी मेढ़ी हैं। चर्चा यह भी है कि भाजपा और बसपा एक साथ चुनाव लड़ सकती है। इन दोनों का गठबंधन हो सकता है। भाजपा दिल्ली और बिहार को उत्तर प्रदेश में दोहराने से बच रही है। इसलिए आगामी चुनाव को वह बसपा के साथ लडक़र आगे बढऩा चाहती है। पर बसपा के साथ भाजपा के जाने से दो बातें हैं एक तो यूपी को मायावती के नाम करना होगा, दूसरे भाजपा को राममंदिर जैसे मुद्दों को ठंडे बस्ते में डालना होगा। पार्टी की आम राय इन दोनों मुद्दों के विपरीत है। क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव भी कहीं दूर नही होंगे। पार्टी उन चुनावों के लिए अभी से तैयारी करके चलना चाहेगी। साथ ही उन चुनावों की परिस्थितियों पर भी अभी से विचार करके चलना चाहेगी। यद्यपि बसपा केन्द्र के लिए भाजपा को अपना समर्थन दे सकती है, बशर्ते कि यूपी उसे स्थायी रूप से मिल जाए। पर मायावती का अतीत कोई विश्वसनीय साथी का नही रहा है। इसलिए पार्टी का उनके साथ जाना अधिक संभव जान नही पड़ता।

अब फिर से एक बार स्मृति ईरानी की ओर आते हैं। वह अमेठी बार-बार जा रही हैं और कांग्रेस की सोनिया गांधी व राहुल गांधी पर बार-बार कड़ा प्रहार कर रही हैं तो इसका कोई न कोई कारण है। लगता है कि उन्हें पीछे से उचित सपोर्ट मिल चुकी है। पार्टी ने इस समय योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम, उमा भारती के मुंह पर ताले डाल दिये हैं, और वे जुबान बंद किये घर में बैठे हैं। जिससे स्पष्ट होता है कि पार्टी आलाकमान उन्हें किसी भी प्रकार से पार्टी की जुबान बनने से रोकने के पक्ष में है। वैसे भी संगीत सोम और योगी आदित्यनाथ को पार्टी का हर वर्ग मानने को तैयार नही है। ऐसे में यदि पार्टी आगामी चुनावों से पूर्व यूपी को स्मृति ईरानी के नाम कर दे, तो कोई आश्चर्य नही होगा। इसके उपरांत भी यूपी को जीतना श्रीमती ईरानी के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। वह चुनौतियों से जूझना जानती हैं और उनका यह गुण भी उन्हें दिल्ली से लखनऊ की सैर करा सकता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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