भगवान विष्णु के दशावतारों में बुद्ध नहीं

  • 2016-05-23 12:30:56.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

buddh

वैदिक मतानुसार परमात्मा का तेज विशेष रूप में जब किसी पदार्थ अथवा प्राणी में आता है तो वह अवतार कहाता है द्य अवतार चेतन तत्व भी होते हैं और अचेतन तत्व भी  चेतन-अचेतन का अन्तर है ईक्षण करने की शक्ति में ईक्षण से अभिप्राय है कार्य करने का स्थान,  काल और दिशा का निश्चय करना जो ऐसा करने की सामथ्र्य रखता है उसे चेतन कहते हैं और जो नहीं रखता वह अचेतन कहाता है। कुछ प्राकृतिक पदार्थ भी विशेष ओजयुक्त, ऐश्वर्यवान और सामथ्र्यवान देखे जाते हैं। उन्हें भी अवतार माना जाता है। यही पुराणों की पद्धति है। दोनों में अन्तर भी स्पष्ट है। अचेतन अवतार एक कार्य के लिए ही होते हैं और उस कार्य के उपरान्त उनका अस्तित्व नहीं रहता। अचेतन अवतार इच्छानुसार अनेक कार्य करता है। इस कथन का प्रमाण भी श्रीमद्भगवदगीता में ही उपस्थित है। परमात्मा की विशेष विभूति से युक्त पदार्थों की गणना गीता में की गई है । उस गणना में जहां राम और कार्तिकेय का कथन है , वहाँ उसमे वज्र और हिमालय का नाम भी है । जहां बृहस्पति , भृगु को परमात्मा की विशेष विभूति वाला माना है , वहाँ अक्षरों में ओं (ओउम) और समासों में द्वन्द्व को भी बताया है। इस प्रकार किसी भी पदार्थ को, जिसमें परमात्मा के तेज का अंश है, उसे परमात्मा का अवतार माना है। इस प्रकार यह सिद्धप्राय है कि अवतार परमात्मा स्वयं नहीं हो सकता। कृष्ण स्वयं परमात्मा नहीं थे। राम भी परमात्मा नहीं थे। इसी भान्ति बुद्ध तथा अन्य अवतार परमात्मा नहीं कहे जा सकते। वे केवल परमात्मा के तेज अर्थात प्राण की विशेष मात्र को रखने वाले होते हैं । इसके बावजूद परमात्मा के अवतार होने की समर्थन करने तथा उनके आठ अथवा दस अथवा चौबीस  अवतार होने की पौराणिक बात मानने वाले ही आज बहुतायत में हैं । और इसके समर्थन में अनेकानेक कथाएँ पौराणिक ग्रंथों में भरे पड़े हैं ।

पौराणिक ग्रंथों में इस सम्बन्ध में प्राप्य संन्दर्भों के अनुशीलन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि अवतार के दसवें सिंद्धांत के आधार पर भूतकाल में नौ अवतार मत्स्य, कूर्म (कच्छप), वराह, नृसिंह (नरसिम्हा), वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध अवतार हो चुके हैं और दसवाँ अवतार भविष्य में कल्कि अवतार कलियुग के समाप्ति पर होगीद्य श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार विष्णु के पाँच प्रारूप यथा, परमात्मा, सर्वोच्च आत्मा, परमेश्वर, सर्वोच्च शक्ति, ब्राह्मण अर्थात विद्वान के संरक्षक, विश्व रूप माने जाते हैं द्य पौराणिक मान्यतानुसार जिस प्रकार विगत सभी अवतारों में विष्णु के द्वारा पापों और पापियों का नाश किया गया है उसी प्रकार कलियुग में पापियों के संहारक के रूप में कल्कि अवतार अवतरित होंगे। पौराणिक ग्रंथों में अंकित विष्णु के अवतार की स्तुतियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वेदादि वैदिक ग्रंथों में वृतासुर और शंबरासुर के संहारक के रूप में जो इन्द्र की स्तुति की गई है, वस्तुत: वे विष्णु की ही स्तुति हैं द्य वैदिक ग्रंथों के अनुसार अनेक दिव्य गुणों के कारण एक ही परमात्मा के अनेक नाम यथा, ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, इन्द्र, शिव, वरुण, अग्नि, सूर्य आदि असंख्य नाम होते हैं। वस्तुत: ये सभी देवतावाचक नाम एकमात्र परमात्मा के ही असंख्य दिव्य गुण होने के कारण उसके अनन्त नाम हैं द्य इसलिए वेद में इन्द्र को भी विष्णु के रूप में उद्धृत करते हुए कहा गया है-

विभूम्या इन्द्र सानू अर्थात इन्द्र धरा से लेकर ऊँचे-ऊँचे पर्वतों तक फैला हुआ है। विश अर्थात स्थापित करनाद्य लैटिन भाषा का एक शब्द है विकूस, जो अंग्रेजी में विच-विलेज है। वेद-अंतरांचल तक प्रवेश करना अर्थात् कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ विष्णु नहीं है। यद् विशिटो भवति तद विष्णुर्भवति।

सर्वोच्च सत्ता के रूप में विष्णु में अनंत गुण हैं, उनमे से प्रमुख छ: गुण सर्व ज्ञाता, संप्रभूता, शक्ति, बल, वीर्य, वैभवता हैं द्य आदिग्रंथ ऋग्वेद में विष्णु को 93 बार उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य मन्त्रों में दूसरे देवता के साथ भी विष्णु स्वतंत्र रूप से याद किये गये हैं । ऋग्वेद का मण्डल सप्तम पूर्णत: विष्णु के लिए है, जिसके दो स्तोत्र के पूर्ण मंडल विष्णु को समर्पित है । विष्णु के लिए समर्पित स्तोत्र 7 के 7 / 99 में विष्णु को ईश्वर के रूप में संबोधित किया गया है, जो पृथ्वी और स्वर्ग को पृथक करते हैं। यह चरित्र इन्द्र के रूप द्रष्टव्य है। इसी प्रकार स्तोत्र 7/100 में विष्णु के तीन कदमों का वर्णन है, जो ब्रह्माण्ड तक फैले हुए हैं और तीनों ही जगह उनके कदम है। विष्णु सूक्त के अनुसार प्रथम और द्वितीय फैलाव पृथ्वी और आकाश है, जिसे मनुष्य देखते है । तीसरी जगह स्वर्ग (आकाश) है। यही अंतिम जगह विष्णु से सम्बन्धित हैद्य ऋग्वेद के आठवे मंडल में विष्णु इन्द्र से शक्ति प्राप्त करते हैं। कुछ विद्वान् श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार अवतारवाद को प्रतिपादित करते हुए श्रीकृष्ण को विष्णु का एक अवतार सिद्ध करते हैं। जबकि गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के सर्वोच्च शक्ति तथा योग के विभिन्न प्रक्रिया के बारे में उपदेशित करते दिखलाई देते हैं। भागवत पुराण में विष्णु उद्घोषित करते हुए हैं किमैं ही लक्ष्य हूँ, बाधक हूँ, जगत गुरु हूँ , सबसे प्यारा दोस्त हूँ, मैं ही रचनाकर और उन्मूलनाकार हूँ द्यइसको मत्स्य अवतार व अन्य अवतार की कथा से भली - भांति समझा जा सकता हैद्य पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सतयुग के अंत में विष्णु मत्स्य अवतार रूप में अवतरित हुए हैंद्य जब पृथ्वी जल मग्न हो चुकी थी, तब मत्स्य रूप में उन्होंने बाढ़ से वेद और मानवता की रक्षा की थी। कूर्म अवतार में असुरों से अमृत का कलश और देवताओं की रक्षा की है। इसमें पीछे से सृष्टि की रचना में सहयोग भी की है। वराह (सूअर) अवतार में सतयुग के अंत में बाढ़ में भूमि देवी (पृथ्वी माता) जब समुद्र के नीचे जाने लगी तो समुद्र में गोता लगा कर इस धरती को अपने दो दाँतों से जल से ऊपर उठा कर रक्षा की। त्रेता युग में राजा बलि के पतन के लिए वामन अवतार में अवतरित हुए। नृसिंह अर्थात नरसिंह अवतार अर्थात आधे आदमी और आधे शेर के रूप में अवतरित होकर हिरण्यकशिपु जैसे आततायी राक्षसों का नाश किया। त्रेता युग में जब हैह्यवंशी दुष्ट क्षत्रिय राजा संतो और मनुष्यों को कष्ट पहुँचाने लगे तब उन दुष्ट क्षत्रियों के नाश के लिए परशुराम अवतार के रूप में अवतरित हुए । त्रेता युग में ही राक्षस राज रावण का वध के लिये राम के रूप अवतरित हुए। कंस के नाश के लिए कृष्ण के रूप में बलराम के साथ अवतरित हुये। भविष्य पुराणादि ग्रन्थों के विष्णु का अंतिम अवतार कल्कि अवतार सफ़ेद घोड़े पर सवार और हाथ में तलवार लिए हुए होगा। यह भगवान विष्णु का महावतार होगा और इसी के साथ कलयुग जैसे अन्धकार और नाशवान युग का अवसान होगा। कल्कि का संस्कृत कालका है और इसका अर्थ होता है अन्धकार को समाप्त करना। संस्कृत के दूसरे अर्थो में कालकी (कल्कि) का अर्थ सफ़ेद घोड़ा होता है ।

ध्यातव्य है कि कलयुग का प्रारम्भ भगवान कृष्ण के इस धरा से अवसान अर्थात गायब होने के बाद हुई माना जाता है। लगभग 3012 ईसा पूर्व जब यह युग समीप आया तो संत ने धरा को छोड़ दिया। अंत में 432000 के बाद यह युग शुरू होगा।

-अशोक प्रवृद्ध