भारत माता की जय नही बोलूंगा

  • 2016-03-16 03:30:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों जे.एन.यू. की घटना पर दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘‘अब बच्चों को भी ‘भारतमाता की जय’ बोलना सिखाना पड़ता है।’’ आर.एस.एस. प्रमुख  की इस टिप्पणी का अर्थ था कि पिछले 68 वर्षों में हम इस स्थिति में आ खड़े हुए हैं कि अब हमारे भीतर से देशभक्ति की वह भावना इतनी धूमिल सी हो गयी है कि बच्चों को भी अब ‘भारतमाता की जय’ बोलना  सिखाना पड़ रहा है, जबकि यह प्रक्रिया तो इतनी सहज और सरल होनी चाहिए थी कि इसे सिखाने की आवश्यकता ही नही पडऩी चाहिए थी।

मोहन भागवत के इस बयान पर असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर अपना पुराना चेहरा लोगों के सामने करते हुए कह दिया है कि-‘मैं ‘भारतमाता की जय’  नही बोलूंगा।’ ओवैसी का तर्क है कि भारत के संविधान में कहीं नही लिखा कि आप भारतमाता की जय बोलें।

भारत माता की जय नही बोलूंगा

वास्तव में भारत में ओवैसी जैसे लोग भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग दीर्घकाल से करते आये हैं। इसका कारण यही है कि हमने ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द को भ्रामक रूप में व्याख्यायित किया है। पंथनिरपेक्ष शब्द को संदिग्धार्थी या भ्रामक बना देने से इस शब्द को लोगों ने अंग्रेजी के ‘सैकुलर’ शब्द का पर्यायवाची बना दिया है। ‘सैकुलर’ का अभिप्राय ‘लौकिक बातों से संपृक्त’ है अर्थात ‘धार्मिक क्रियाकलाप से भिन्न’ है। इससे भारत में राजनीति शास्त्र तथा विधि के शिक्षकों में भ्रम उत्पन्न हुआ है और हितबद्घ लोगों ने और पक्षपाती दलों ने इसका लाभ उठाया है। इस भ्रम को पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय के नौ  न्यायाधीशों की एक पीठ द्वारा दूर भी किया गया है। न्यायालय ने आधिकारिक रूप से यह घोषित किया है कि पंथनिरपेक्ष का यह अर्थ नही कि राज्य का धर्म के प्रति शत्रुभाव है (जैसा कि राज्य ने हिंदू समाज के लोगों के साथ पग-पग पर करके दिखाया है) इसका अर्थ यह है कि राज्य को विभिन्न धर्मों के बीच तटस्थ रहना चाहिए। ‘तटस्थ’ शब्द का अर्थ है कि देश में किसी भी संप्रदाय का निजी कानून नही चलेगा और देश की विधायिका का अपना कानून सर्वोपरि होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने और उस पर आचरण करने की स्वतंत्रता है। यह तर्क मान्य नही कि यदि कोई व्यक्ति निष्ठावान हिंदू या निष्ठावान मुस्लिम है तो वह पंथ निरपेक्ष नही रह जाता।

ओवैसी जैसे लोग निष्ठावान मुस्लिम रह सकते हैं पर उन्हें मुस्लिम मजहब के प्रति निष्ठावान रहने देने के अधिकार का यह अर्थ नही कि वह निष्ठावान मुस्लिम हैं तो इसलिए वह ‘भारतमाता की जय’ नही बोलेंगे-क्योंकि यह उनकी मजहबी शिक्षा है और उनका मजहब ‘भारत माता की जय’ बोलने की अनुमति नही देता है। प्रत्येक भारतीय ने जब स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था तो उनके द्वारा  ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष करते हुए अंग्रेजों को यहां से भगाया गया था। जिन लोगों ने ‘भारतमाता की जय’ बोलने से उस समय परहेज किया था उन्होंने अपना अलग देश पाकिस्तान बना लिया। भारत में शेष रहे मुसलमानों ने देश के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए अपने लिए यह अनिवार्य माना कि वह ‘भारतमाता की जय’ बोलेंगे और देश के विकास में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह करेंगे। इस प्रकार ‘भारतमाता की जय’ बोलना हमारी देशभक्ति का प्रमाणपत्र मान लिया गया। देश के संविधान के अनुच्छेद 51(क) में ‘मूल कत्र्तव्यों’ का निरूपण किया गया है। जिसके अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कत्र्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं तथा राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे। दूसरे, स्वतंत्रता के लिए हमारे आंदोलन को प्रभावित करने वाले उच्चादर्शों को हृदय में संजोये रखे तथा उनका पालन करे। इन मूलकत्र्तव्यों की कुल संख्या 10 है। इसमें पांचवां मूल कत्र्तव्य है कि हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे।

ओवैसी जैसे लोगों को इन मौलिक कत्र्तव्यों को भी पढऩा होगा। इनमें किया गया यह प्राविधान कि स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्चादर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे-महत्वपूर्ण है। हमारे स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्चादर्शों में निस्संदेह ‘भारतमाता की जय’ और ‘वंदेमातरम्’ बोलना भी था। ये वे आदर्श थे जिन्होंने देश के लोगों में राष्ट्रीय एकता को बलवती किया था। देश के संविधान में इस मौलिक कत्र्तव्य के रखने का अर्थ था कि जिन लोगों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उच्चादर्शों से घृणा थी वे तो पाकिस्तान चले गये पर जो बचे हैं वे इन उच्चादर्शों से किसी प्रकार की घृणा नही करेंगे। इसलिए ओवैसी जैसे लोगों को भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता को चुनौती देने का कोई अधिकार नही है। देश की रक्षा करना और देश के नागरिकों के मध्य समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करना उनका और प्रत्येक भारतीय का मौलिक कत्र्तव्य है। यह हम इसलिए लिख रहे हैं कि ओवैसी ने अपने बचाव में बार-बार संविधान का ही सहारा लिया है कि इस संविधान में कहीं नही लिखा है कि हर व्यक्ति को ‘भारतमाता की जय’ अनिवार्यत: बोलनी ही पड़ेगी।

ओवैसी जैसे लोगों को सहन करने का अभिप्राय होगा कि देश की एकता और अखण्डता के लिए पुन: एक संकट खड़ा कर लेना। कांग्रेस ऐसे लोगों को सहन करती रही और जिससे इनके नखरे व उच्छ्रंखलता बढ़ती चली गयी। जिसका परिणाम यह निकला है कि ओवैसी जैसा व्यक्ति खुल्लम-खुल्ला यह घोषणा कर देता है कि भारत  की आर्मी और पुलिस को यदि 15 मिनट के लिए हटा लिया जाए तो मुस्लिमों के हाथ देख लें। इसका अभिप्राय क्या यह माना जाए कि देश में अवैध हथियारों के बल पर एक समानांतर सेना उनके जैसे लोगों ने खड़ी कर ली है जो इस देश के बहुसंख्यक समाज को काटकर समाप्त करने की धमकी दे रही है या उस स्थिति में आ चुकी है।

आजादी के बाद से ही भारत में तुष्टिकरण का खेल चलता रहा है और कांग्रेस ने तुष्टिकरण के खेल में बाजी मारते हुए देश को ही दांव पर लगा दिया। इसलिए हमारी संसद से और ‘बिकाऊ मीडिया’ से ‘सामासिक संस्कृति’ जैसा शब्द चर्चाओं या लेखों से भी ‘डायनासोर’ की तरह विलुप्त कर दिया गया। इस शब्द को विलुप्त करके हमने देश की बहुत बड़ी क्षति की है। देश के अधिकांश लोगों को ही नही पता कि ‘सामासिक संस्कृति’ का अर्थ क्या है? इस पर भी संतोष बनाम मानव संसाधन मंत्रालय 1994 के वाद में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि-‘यद्यपि इस देश के लोगों में अनेक भिन्नताएं हैं। वे इस बात पर गर्व करते हैं कि वे एक सामान्य विरासत के सहभागी हैं और वह विरासत और कोई नही संस्कृत की विरासत हैं।’

कांग्रेसी सरकारों की मूर्खता और हिंदू विरोधी भावना के कारण सर्वोच्च न्यायाल की सामासिक संस्कृति की इस व्याख्या के उपरांत भी सामासिक संस्कृति को संस्कृत की विरासत ना कहकर सांझा-विरासत (गंगा, जमुनी संस्कृति) कहा गया। जिसे मुगलकाल से आरंभ किया गया, इस प्रकार देश को अपने पुराने इतिहास से काटकर यह दिखाया गया कि हमारा देश तो ‘अकबर’ के आने पर बना है। इसी सोच का परिणाम है ‘ओवैसी’। अपनी जड़ों को भूलोगे और स्वयं उन्हें काटोगे तो ऐसे ही परिणाम मिलेंगे। जिन्ना के किसी भी ‘अवतार’ से बचने के लिए अपने ही विषय में व्याप्त भ्रांतियों का हमें समूल विच्छेदन करना ही होगा।