भारत के इतिहास पर हो ठोस अनुसंधान

  • 2016-03-22 03:30:22.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत का इतिहास लिखा जाना मानो फिर से गंगा को धरती पर लाने के समान है। ‘भागीरथ प्रयास’ करना होगा इस महान कार्य के निष्पादन के लिए। मैं यह इसलिए कह रहा हूं कि भारत का इतिहास भारत का ही इतिहास नही है, यदि वह सही रूप में लिखा जाए तो ज्ञात होगा कि भारत का इतिहास संपूर्ण मानव जाति का इतिहास है। वैसे इस भूमंडल पर केवल एक भारत ही ऐसा देश है जो यह कहता है कि इस विश्व को बने लगभग दो अरब वर्ष हो गये हैं। विश्व का सर्वाधिक प्राचीन संवत यदि किसी जाति का है तो वह आर्यजाति या हिंदुओं का है। इनका लगभग दो अरब वर्ष (1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार 114 वर्ष) प्राचीन संवत इस बात का प्रमाण है कि भारत का इतिहास भी इतना ही पुराना होगा।

जब मैंने अपनी ‘भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास’ नामक श्रंखला लिखनी आरंभ की तो उसे लिखते-लिखते छह खण्ड तैयार हो गये। तब मैं स्वयं आश्चर्यचकित था कि यदि भारत के इतिहास को लिखते समय 1235 वर्ष के कालखण्ड की थोड़ी बहुत चर्चा करने से ही छह खण्डों की पुस्तकें बन सकती हैं, तो दो अरब वर्ष का इतिहास लिखने में कितने खण्ड बनेंगे? तनिक कल्पना कीजिए। दो अरब वर्ष के विस्तृत कालखण्ड के सामने 1235 वर्ष का कालखण्ड तो कुछ भी नही है।

भारत के इतिहास

मैं यह भी मानता हूं कि मैंने जिन 1235 वर्षों के इस कालखण्ड के इतिहास को एक साथ-एक स्थान पर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें मेरी तो मात्र प्रस्तुति है, परिश्रम तो मुझसे पूर्व कितने ही विद्वानों ने किया है, जिनके तथ्यों के मोतियों को मैंने इस श्रंखला की माला में लाकर मात्र पिरोने का कार्य किया है। यह कार्य भी अपूर्ण है। क्योंकि इसमें अभी भी बहुत सारे संशोधनों की और ऐसे तथ्यों को समाहित करने की आवश्यकता है जो मेरी ना जानकारी में रहे हो सकते हैं। मैं यह बात इसलिए भी कह रहा हूं कि जिन 1235 वर्षों के इतिहास पर इस ग्रंथमाला में हम प्रकाश डाल रहे हैं उसमें भारत का एक चुना हुआ क्षेत्र और उसकी घटनाएं ही अधिक सम्मिलित हैं। जैसे उत्तर भारत और कुछ मध्य भारत का ही वर्णन अधिक है, उनकी अपेक्षा पश्चिमी भारत, पूर्वी भारत और दक्षिणी भारत का उल्लेख अपेक्षित रूप में उल्लेखित नही किया जा सका है। यह ठीक है कि संपूर्ण भारत के कुछ घटनाक्रमों को इस ग्रंथमाला में पिरोने का प्रयास हमारी ओर से किया गया है, पर फिर भी देश के बहुत से आंचल और क्षेत्र ऐसे हैं जिन पर और भी शोध की आवश्यकता है। जैसे बीते 1300 वर्षों में भारत में ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, तिब्बत, भूटान, बर्मा, श्रीलंका, मालदीप, जावा, सुमात्रा आदि भी सम्मिलित थे। हमारा स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास तभी पूर्ण होगा, जब इस विशाल क्षेत्र के इन्हीं वर्षों का इतिहास भी समीक्षित किया जाएगा। उसे भी देखा जाएगा कि इन देशों में उस समय क्या घटनाएं घटित हो रही थीं? क्या वे शांत थे या वे भी हिंदुत्व अथवा वैदिक संस्कृति की रक्षार्थ किसी प्रकार आंदोलित थे? निश्चय ही वहां भी आंदोलन हुए होंगे। पर हम आज उन्हें ढूंढ़ नही पा रहे हैं। जितना भारत हमें दिखाई दे रहा है-हम उसके विषय में ही तथ्य जुटा सकते हैं और उसी पर प्रकाश डाल सकते हैं। यह भी तो इतिहास की एक विडंबना ही है कि इतिहास का इतिहास ही विलुप्त है। प्रश्न अपने आप में प्रश्न तो है ही उसका उत्तर भी प्रश्न ही बन गया है। ‘सारी विच नारी है कि नारी विच सारी है’ यह भेद ही समझ नही आ रहा।

जब भारत के दो अरब पुराने इतिहास को इस दृष्टिकोण से देखता हूं कि इसका तो अभी हजारवां लाखवां भाग भी नही लिखा गया है तो अपने प्रयास को अति लघु मानने को स्वयं ही तैयार हो जाता है। तब गर्व का तो प्रश्न ही नही उठता।

भारत सरकार को चाहिए कि भारत का वास्तविक इतिहास खोजने की दिशा में ठोस कार्य किया जाए। मानव जाति के इतिहास को खोजने के लिए भारत के इतिहास के शोधार्थियों की एक विशाल टीम खड़ी की जाए जो तथ्यों के आधार पर भारत का लगभग दो अरब वर्ष का इतिहास तैयार करे।

हमें यह मानना चाहिए कि भारत का इतिहास भौतिकपरक विजयों का इतिहास नही है। इसका इतिहास रक्तरंजित कहानियों से बना इतिहास भी नही है। इसका इतिहास तो घावों पर मरहम लगाने वालों का इतिहास है। ऋषियों के उत्कृष्टतम चिंतन, उत्कृष्टतम अनुसंधानों आविष्कारों और शोधों का इतिहास है। भारत को उसी ओर कार्य करने के लिए जागना होगा। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी  की सरकार जिस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समर्थक सरकार है, उसके लिए इस दिशा में कार्य करने की अपार संभावनाएं हैं।

भारत का इतिहास धर्म का इतिहास है। संसार के शेष मजहब धर्म की परिभाषा में नही आते। यद्यपि वे भी कह सकते हैं कि उनका इतिहास भी मजहबी इतिहास है। पर भारत के धर्म के इतिहास और उनके मजहबी इतिहास में आकाश-पाताल का अंतर है। भारत का धर्म अभ्युदय की प्राप्ति अर्थात इस संसार में रहकर संपूर्ण ऐश्वर्य की प्राप्ति करना और नि:श्रेयस की सिद्घि अर्थात मोक्ष की प्राप्ति करने पर आधारित है। यही ‘भद्र’ की उपासना है। भद्र का अर्थ भी इहलोक और परलोक को सुधारना है। इस प्रकार भारत का धर्म मौलिक रूप में व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता का समर्थक है। इसी आधार पर भारत ने विश्व को एक ‘मर्यादा पथ’ अर्थात जीवनशैली प्रदान की, लोगों को उस मर्यादा पथ पर चलने की प्रेरणा दी और युग-युगों तक इस संसार को उस पथ पर चलाया भी, परंतु संसार के अन्य मजहबों ने ऐसा नही किया। उन्होंने संसार के मर्यादा पथ को छिन्न-भिन्न किया उसे तार-तार किया। जिन लोगों ने उसके इस अनैतिक कार्यों का विरोध किया उन्हें उन लोगों ने ‘काफिर’ घोषित किया और काफिरों के जनसंहार को अपना सबसे पवित्र ‘दीनी करतब’ घोषित किया।

स्पष्ट है कि विदेशी मजहबों के मर्यादा पथ को छिन्न-भिन्न करने के कार्य का विश्व में सबसे प्रबल विरोध केवल भारतवासियों ने ही किया। इसलिए इन विदेशी मजहबों के आक्रांताओं के सबसे बड़े शत्रु भी भारतवासी हिंदू ही बने। ये आक्रांता रूके नही और हम अपने मर्यादा पथ पर झुके नही। संघर्ष चला, ‘घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े और तलवार लड़ी तलवारों से। बिना मनुष्य के तलवार से तलवारों की लड़ाई देखकर विदेशी आश्चर्यचकित रह गये थे। यह केवल भारत ही था, जिसके महाराणा संग्राम सिंह ने जब अपने योद्घाओं से बाबर की तोपों के सामने सामूहिक रूप से टूट पडऩे का आवाह्न किया तो उसके योद्घाओं ने बड़ी संख्या में तोपों के सामने सामूहिक रूप से टूटकर अपना बलिदान दिया और अंत में तोपची को ही गिरफ्तार करने में सफल हो गये थे। वीरता, देशभक्ति और देश के मूल्यों के लिए समर्पण का यह उत्कृष्टतम उदाहरण है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिन्हें देखकर या पढक़र हमारा हृदय अपने देशभक्त पूर्वजों के प्रति अनायास ही श्रद्घा से भर जाता है। भारत जीवित रहे और भारत की आर्य संस्कृति अर्थात हिंदुत्व के रूप में संसार के लिए पुन: मर्यादित पथ का निर्माण करे, इसके लिए भारत के संपूर्ण इतिहास को लिखा जाना और इसके एक-एक मोती को बच्चों के हृदय मंदिर में सजाना हमारा राष्ट्रीय कत्र्तव्य है। हमारे देश की संस्कृति और धर्म का मर्यादा-पथ सनातन है वह कभी पुरातन नही होता, उसमें सदा नवीनता बनी रहती है। यही उसकी सनातनता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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