‘बरखा’ ई-रानी जरा जमके बरसो

  • 2016-02-26 03:30:34.0
  • राकेश कुमार आर्य

संसद में कई चेहरे बेनकाब हो गये हैं। जे.एन.यू. में 9 फरवरी 2016 को देशविरोधी नारे लगाने वाले छात्र कन्हैया, उमर खालिद और उनके साथियों के साथ जितने लोग देशभक्ति का वेश धारण किये खड़े थे, उन सबकी वास्तविकता सामने आती चली गयी है कि ये किस प्रकार सफेद वस्त्रों में रहकर काले ‘कारनामों’ में लिप्त रहते हैं। देश यह देखकर हतप्रभ है कि जिन्हें वह अपना जन प्रतिनिधि बनाकर भेजता है उनके हृदय में राष्ट्रद्रोह की इतनी कुत्सित भावनाएं हैं।

जिन चेहरों के नकाब उतरे हैं उनके लिए आज देश को इस बात को बड़ी गंभीरता से समझना होगा कि ये वही चेहरे हैं जिन्होंने इस देश के इतिहास के साथ गंभीर और अक्षम्य छेड़छाड़ की है और स्वतंत्रता के पश्चात इन लोगों ने भारत के इतिहास को पूर्णत: कायरतावादी कलेवर में प्रस्तुत करके बहुत बड़ा राष्ट्रद्रोह किया है। मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने अपने क्रांतिकारी और ओजस्वी उद्बोधन में इन कायर और राष्ट्रद्रोही चेहरों को संसद में ललकारते और लताड़ते हुए ठीक ही कहा है कि बच्चों को जैसा विद्यालयों में पढ़ाओगे वे वैसे ही बनेंगे। इन छद्म राष्ट्रवादियों ने देश के बच्चों को देश का ऐसा इतिहास पढ़ाना आरंभ किया जिसमें ‘कन्हैया और खालिद’ विद्यालयों में पलने लगे।
स्मृति ईरानी


इन बेनकाव चेहरों के विषय में देश को समझना होगा कि ये वही राष्ट्रद्रोही हैं जिन्होंने सुभाषचंद्र बोस को कभी स्वतंत्रता संग्राम के काल में ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था। ये नही चाहते कि हमें भारतीय और हिंदू होने पर गर्व की अनुभूति हो क्योंकि इनके हृदय में भारतीयता नही है, इन्हें भारतीयता से घृणा है। इसलिए विद्यालयों में जानबूझकर ऐसा पाठ्यक्रम डाला गया है जिससे बाल सुलभ मन में भारत के प्रति और भारतीयता के प्रति घृणा का विकास हो सके। आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर भारतीयता की हत्या करते जाना इनकी प्रवृत्ति बन चुकी थी और पिछले सात दशकों के काल में ये अपनी इस प्रवृत्ति के कारण देश को बड़ी चोट पहुंचा चुके थे। आज यह असहिष्णु हो उठे हैं, क्योंकि इनके पापों की पोल खुलने लगी है। जे.एन.यू. में जो कुछ हुआ उसके पीछे इन्हीं का हाथ रहा है।

श्रीमती ईरानी संसद में जमकर बरसीं हैं। सारा देश नारी शक्ति की वास्तविक पहचान के रूप में उभरी इस नायिका को जब ‘शत्रु’ को ललकारते सुन रहा था तो ऐसा लग रहा था जैसे रानी लक्ष्मीबाई लेफ्टिनेंट वॉकर को ललकार रही हो। मैदान छोडक़र छद्म धर्मनिरपेक्षी भाग खड़े हुए। ‘रानी’ सिंहनी बन चुकी थी। देश ने देख लिया कि इस देश की नारी जब सिंहनी बनती है तो वह कैसे ‘मर्दों’ के होश ठिकाने लगा देती है? हर देशवासी अपनी इस नायिका के हर शब्दवाण पर ताली बजा रहा था, और कह रहा था-(बरखा) ईरानी जरा जमके बरसो। वास्तव में नायक वही होता है जो देश की आत्मा पर हाथ रखकर बोलता है-और जिसके सामने छद्मी, पाखण्डी, छलिये, बृहन्नले सब दुम दबाकर भागने लगते हैं। श्रीमती ईरानी एक-एक छद्मी, पाखण्डी छलिये और बृहन्नले से पूछ रही थीं :-

‘‘तुझसे उम्मीदे वफा जिसे होगी उसे होगी
हमें तो देखना ये है कि तू जालिम कहां तक है?’’

यह भारतदेश नारी सशक्तिकरण का पुरोधा समर्थक देश रहा है। इसने जहां अनुसूया, गार्गी, मैत्रेयी जैसी अनेकों ऋषिकाएं उत्पन्न की हैं वही रानी पदमिनी, रानी झांसी, गुजरात की रानी नायिका, पन्नाधाय, कश्मीर की कोटा रानी, जैसी अनेकों वीरांगनाएं भी उत्पन्न की हैं। जिन्होंने समय आने पर तलवार उठायी या ऐसे बलिदान दिये जिनसे इतिहास भी गदगद हो उठा। सचमुच ईरानी ने बसपा की प्रमुख मायावती के सामने सर कलम करके रखने की बात कही तो भारत की उक्त वीरांगनाओं का इतिहास सजीव हो उठा उनकी स्मृति ने आज की स्मृति में प्रवेश किया और ईरानी केवल रानी बनकर जौहर के लिए तैयार हो गयी। बसपा की मायावती निरूत्तर होकर वैसे ही अपना हाथी आगे बढ़ा ले गयीं जैसे किसी वीर योद्घा राजपूत के सामने से युद्घ में कोई मुगल सेनानायक पीठ दिखाकर भाग उठता था।

जब स्मृति ईरानी अपना रौद्ररूप दिखा रही थीं तभी अनुराग ठाकुर भी यह अनुभव करा रहे थे कि आज का मैदान इस महारथी के सामने भी नतमस्तक है। जे.एन.यू. के राष्ट्रद्रोहियों के साथ जाकर बैठने वाले कांग्रेस के राहुल गांधी अपने साथियों के साथ मैदान छोडक़र भाग लिये। अनुराग ठाकुर ने भी देश को अनुभव कराया कि उसकी आत्मा की आवाज को सुनने वाला पौरूष अभी जीवित है और उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि-

‘‘छोडऩे पर मौन को वाचाल होते देखा है,
तोडऩे पर आइने को काल होते देखा है
मत करो ज्यादा हवन तुम आदमी के खून से
जलने पर कोयले को लाल होते देखा है।’’

राष्ट्रद्रोहियों का साथ देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी पार्टी की ओर से बोलते हुए कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करके राष्ट्रविरोधी नारे लगाने का अर्थ राष्ट्रद्रोही हो जाना नही है-उनके भाषण पर लोग हंस रहे थे, पर यह भी कह रहे थे कि सिंधिया जी! देश के साथ गद्दारी आपके खून में है-उसका परिचय देकर आपने सिद्घ कर दिया है :-

तू इधर-उधर की बात न कर यह बता कि काफिला क्यों लुटा?
मुझे रहजनों से नही गरज तेरी रहबरी का सवाल है?’’

रहजनी और रहबरी साथ साथ नही चल सकते। अब देश की जनता रहजनी के काम में लगे काले लोगों को अच्छी प्रकार समझने लगी है और देश को रहबरी के नायक लोगों को अपनाने के लिए ही तैयार हैं। पिछले 70 वर्षों में देश में धर्मांतकरण की प्रक्रिया को बलवती करके, देश के बहुसंख्यक समाज के साथ जितने पाप किये गये हैं और इस देश की संस्कृति और धर्म को जितना चोटिल किया गया है अब उनका हिसाब देने का समय आ गया है। राहुल गांधी को इन सबका उत्तर देना ही पड़ेगा, वह चाहे जहां छिप लें, और चाहे जितने ‘कन्हैया और खालिदों’ का साथ दे लें, पर अब इस देश का युवक समझ गया है कि यह देश ‘जयचंदों के छलछंदों’ का देश नही है, यह उन देशभक्तों का देश है जिनके लिए कवि की हुंकार भरती लेखनी लिख गयी है:-

‘‘कलम आज उनकी जय बोल
जो चढ़ गये बलिवेदी पर
बिना लिए गर्दन का मोल।’’

संसद में यह कितने गौरवपूर्ण क्षण थे जब श्रीमती ईरानी गर्दन कटाने की बात कह रही थीं और कुछ लोग उस समय या तो गर्दन नीची किये बैठे थे या गर्दन झुकाकर बाहर निकल रहे थे। हम आशा करते हैं कि इस देश के ‘जयचंदों’ के विरूद्घ श्रीमती ईरानी और अनुराग ठाकुर की यह जोड़ी आगे भी इसी प्रकार आक्रामक, संतुलित और तार्किक संघर्ष जारी रखेगी। इनसे घबरायें नही-देश आपके साथ है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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