आयसु मांगि करहिं पुरकाजा

  • 2016-01-12 01:53:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

राम को स्वतन्त्र भारत में लोकतन्त्र का आधार स्तम्भ बनाना चाहिये था। राम की मर्यादा और राम का आदर्श लोकतन्त्र का सर्वाधिक आवश्यक अंग है। उसे परिवर्तित परिस्थितियों में अपनाकर विश्व के समक्ष हमें अपने मर्यादा पुरूषोत्तम की मर्यादा का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिये था। क्योंकि सब ओर अशान्त मानव के अशान्त हृदय की पुकार आज हमें दीख रही है। अशान्त मानवता चीख रही है। सुमित्रानन्दन पन्त की ये पंक्तियाँ बड़ी सार्थक है :-

राजनीति का प्रश्न नहीं है आज जगत के सम्मुख।
अर्थ साम्य भी मिटा न सकता मानव जीवन का दु:ख।।
आज वृहत सांस्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित।
खण्ड मनुजता को युग-युग की होना है नव निर्मित।।

रामचन्द्र जी के शासन का आदर्श था-
‘‘आयसु मांगि करहिं पुरकाजा।’’ वह अपनी प्रजा के आयुष्य की कामना करते हुये, उसकी सम्पन्नता और प्रसन्नता की कामना करते हुये अपने राज्य-कर्म का सम्पादन करते थे। जबकि आज के लोकतन्त्र के ध्वजवाहक स्वार्थपूर्ण नीतियों से जनता का मूर्ख बनाते हैं और सत्ता सुख का आनन्द उठाते हैं।
राम के अपने प्रति उदार और प्रजावत्सल भाव को समझकर ही प्रजा उन्हें अपना राजा बनाना चाहती थी। महाराजा दशरथ ने राम के राजतिलक से पूर्व प्रजा के प्रतिनिधियों से बुलाकर पूछा था कि आप मेरे पश्चात् अपना राजा किसको चाहते हैं। तब प्रजा के प्रतिनिधियों ने कहा था-ramchandra

‘‘इच्छामोहि महाबाहु रघुवीर महाबलम्’’
हम राम को अपना राजा बनाना चाहते हैं।


प्रजा के प्रतिनिधी राम को अपना राजा बनाना क्यों चाहते थे? क्योंकि वह जानते थे कि राम ही इस आदर्श को पूर्ण कर सकते है :-
‘‘राजा माता पिता चैव राजा हितकरा नृणाम्’’

राजा माता-पिता है, राजा प्रजाओं का हितकारी है। आज के राजा जाति, वर्ग, सम्प्रदाय की राजनीति करते हैं, और उसी में समाज का वर्गीकरण करते हैं। आरक्षण दे देकर, सुविधाएँ दे देकर, किसी वर्ण को प्रसन्न करने का नाटक करते हैं, तो किसी को अप्रसन्न कर देते हैं। एक का अधिकार छीनकर दूसरे को दे देना ये अपनी राजनीति का सर्वाधिक उत्कृष्ट उपाय मानते हैं। पुनश्च उसे जनकल्याणकारी शासन की नीतियों का अंग बताते हैं। देश में सब ओर अमंगल है, अनीति है, अनाचार है, व्यभिचार है। देश के शासक सब बातों से निरपेक्ष बने बैठे हैं। अपने कत्र्तव्य से निरपेक्ष बनने का अर्थात् धर्मनिरपेक्ष होने का लबादा ओढक़र ये देश का मूर्ख बना रहे हैं। फ लस्वरूप दिन प्रतिदिन राष्ट्र में उत्पात, उन्माद और कलह-कटुता बढ़ता जा रहा है। जनता में शासन के प्रति आक्रोश है। लोकतन्त्र का अपहरण हो गया है।
रामराज्य के आदर्श की बात करने वाले भूल गये कि राम राज्य की स्थापना के लिये आवश्यक है कि राज्य शासन की तीन सभाऐं = धर्म सभा, विद्या सभा, राज्य सभा होती है।
धर्मसभा में मानव के इहलोक और परलोक को सुधारने वाले नैतिक सांस्कृतिक और बौद्घिक नियमों का चिंतन, संपादन और निष्पादन होता है। जिससे मानव समाज मनुजता को धारने वाले नियमों और मर्यादाओं का कदापि परित्याग नही कर सके। राष्ट्र के नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान से ही प्रजा पारस्परिक प्रेम, स्नेह और सदभाव को प्राप्त करती है। इस धर्मसभा को साम्प्रदायिकता का प्रतीक मानकर पहले दिन से ही हमारे तथाकथित ‘रामभक्तों’ ने देश के लिए अभिशाप मान लिया। फलस्वरूप राष्ट्र भौतिक उन्नति करके भी सांस्कृतिक क्षेत्र में अवन्नति को प्राप्त हो गया है। इस स्थिति पर रामधारीसिंह दिनकर ने कितना अच्छा लिखा है-

शांति नही जब तक सुख भाग न नर का सम हो।
नही किसी को बहुत अधिक हो, नही किसी को कम हो।।

दूसरी सभा है विद्यासभा। इस सभा से अभिप्राय था कि राज्य की सब प्रकार की उन्नति के लिए ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए विद्यासभा की स्थापना करना। आज का भौतिक विज्ञान यद्यपि पर्याप्त उन्नति कर चुका है किंतु उस पर धर्म की नकेल नही है। इसलिए सारी उन्नति हृदयहीन लग रही है। विद्यासभा विज्ञान की उन्नति की तो समर्थक होती ही है किंतु साथ ही यथार्थ ज्ञान की पोषिका भी होती है। यह यथार्थ ज्ञान मानव को मानव जीवन उद्देश्य समझाता। पंत जी की पीड़ा पर ध्यान दें :-
मानव ने पाई देश काल पर जय निश्चय,
मानव के पास न पर मानव का आज हृदय।
गर्वित उसका विज्ञान ज्ञान वह नही पचित,
भौतिक मद से मानव आत्मा हो गयी विजित।
चाहिए विश्व को आज भाव नवोन्मेष,
मानव उर में फिर मानवता का हो प्रवेश।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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